Monday, December 19, 2011

आज चंद अंबानियों में बंटा हुआ है हमारा देश  


शायर और फिल्मी गीतकार निदा फाजली से खास बातचीत 

 
इंटरव्यू के दौरान कॉफी हाउस भिलाई में निदा फाजली के साथ मुहम्मद जाकिर हुसैन 10 फरवरी 2010


मुक्तदा हसन यानि निदा फाजली आज किसी तआर्रूफ के मोहताज नहीं हैं। देहली में पैदाइश और ग्वालियर में परवरिश पाने वाले निदा फाजली ने समाज की कड़वी हकीकतों को बेहद करीब से देखा और भोगा है इसलिए सब कुछ उनकी जुबां से किसी नज्म की तरह फूट पड़ता है। 
एक मुशायरे के सिलसिले में निदा फाजली 10 फरवरी 2010 को भिलाई आए थे। मुशायरा रात 11 बजे शुरू होना था लिहाजा सुपेला काफी हाउस में शाम तक मिलने वालों के साथ बैठने के अलावा भी उनके पास काफी वक्त था। ऐसे में उन्होंने पूरे इत्मिनान से बातचीत की।निदा फाजली से हुई बातचीत सवाल-जवाब की शक्ल में बिना ज्यादा काट-छांट के।

हमारे मुल्क में बहुत से तबके तरक्की से कोसों दूर 
है, उनकी इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है...?


दरअसल यह गवर्नमेंट की पालिसी है कि वो कुछ तबके को वोट बैंक बनाती है। जिसके लिए नए-नए तरीके सोचे जाते हैं जिसमें एक तरीका यह है कि लोगों को माइनारिटी और मेज्योरिटी में तकसीम कर दिया जाए। 
जहां तक गरीबी का सवाल है खराब सड़कों का सवाल है, रोशनी के अभाव का सवाल है उसका किसी मजहब से ताल्लुक नहीं है। लेकिन गवर्नमेंट जो होती है यह सब खेल करती है। 
यह खेल चला है जवाहरलाल नेहरू के जमाने से। यह खेल चल रहा है और कुछ तबको को बेवकूफ बना कर उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि लोग इसे समझें और समाज की मुख्य धारा में आएं।

बढ़ती नक्सली हिंसा पर आपका नजरिया.?

नक्सलवाद जो है वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है। यह इस बात की प्रतिक्रिया है कि हमारा पूरा देश चंद अंबानियों में बंटा हुआ है। अब मॉल कल्चर पैदा हो रहा है। उसमें अंडे वाले, भाजी वाले और दूसरे छोटे धंधे करने वाले बेकार हो रहे हैं।
दिक्कत यह है कि कुछ लोग इन विडंबनाओं को भगवान की नाराजगी समझ कर खामोश हो जाते हैं। वहीं जो लोग इनके खि़लाफ़ खड़े हो जाते हैं उनको लोग नए-नए नामों से पुकारते हैं। 
उसे नक्सलवाद भी कहते हैं। नक्सलवाद या और भी किस्म के सामाजिक विद्रोह है उनको खत्म करने के लिए पहले नंदीग्राम को खत्म करो। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ और देश के दूसरे हिस्सों से सांप्रदायिकता खत्म करो, सामाजिक विडंबनाएं खत्म करो।

...लेकिन यह तो सीधा-सीधा आतंकवाद है..?

26/11  का मंजर
आप आतंकवाद की बात कहते हो तो कौन सा आतंकवाद है यह...? एक अंदर का होता है एक बाहर का। आतंक एक बिजनेस है उससे राजनीति जुड़ी है। अंदर का आतंक उड़ीसा और मध्यप्रदेश में होता है 84 में दिल्ली में हुआ और गुजरात होता है।
बाहर का आतंक 26/11 है। आतंक से आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में.... पाकिस्तान खुद आतंक से घिरा हुआ है। वह अपने एक्स प्राइम मिनिस्टर की हिफाजत नहीं कर सका।
 स्वात घाटी के डेढ़ लाख लोग घर से बेघर हो गए। यह सारी विडंबनाएं देश के विभाजन से उपजी हैं। जो कि हमारे नेताओं की सूझबूझ की एतिहासिक गलती थी। इसका खामियाजा कई नस्लें भुगत रही थीं भुगत रही हैं और आगे भुगतेंगी।

इनका हल नहीं है...?

क्यों नहीं है, दिक्कत दरअसल यह है कि हमारे यहां एजुकेशन नहीं है इसलिए जागृति नहीं है। ऐसे में कुछ लोग हथियार उठा लेते हैं सामाजिक अन्याय के खिलाफ। हमें चाहिए बहुत सारे अंबेडकर, खैरनार और अन्ना हज़ारे। 
शिक्षा के लिए आपके पास पैसा नहीं है बम बनाने पैसा है करप्शन के लिए पैसा है। ये पूरी समस्याएं हैं, किसी को एक दूसरे से अलग कर के नहीं देखी जा सकी। आज जरूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा एजुकेशन के अवसर पैदा हों। 
आजादी की रोशनी वहां तक पहुंचे जहां बरसों से गरीबी का, गंदे पानी का, खस्ताहाल सड़कों का, बेरोजगारी का अंधेरा फैला हुआ है। सरकार चाहे किसी की भी हो हमारा संविधान कहता कुछ है और सरकार करती कुछ और हैं। अब हर काम को भगवान के हवाले कर दिया गया है। बच्चे पैदा करना भी भगवान के हवाले हो गया है।
''खुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को, बदलते वक्त पे कुछ अपना अख्तियार भी रख।'' जब तक बदलते वक्त पे अपना अख्तियार नहीं रखेंगे हर काम भगवान करता रहेगा, बच्चे भी भगवान पैदा करता रहेगा और जनसंख्या बढ़ती रहेगी, पतीली का आकार बढ़ेगा नहीं खाने वाले बढ़ते चले जाएंगे। और इस तरह की विडंबनाएं पैदा होती रहेंगी।

... तो इन विडंबनाओं के खिलाफ खड़े होने का एक ही तरीका है...?

मैं सही गलत की बात नहीं कर रहा। दो काम है या तो आप अन्याय को भगवान का नाम लेकर मंदिर-मस्जिद मेें बैठ जाएं, ''चाहे बनें अमीर तू चाहे बनें गरीब, ईश्वर अपने हाथ से लिखता नहीं नसीब '', या फिर अन्याय और विडंबनाओं के खिलाफ खड़े हो जाएं। 
खड़े होने किसका तरीका कौन सा है वो अलग बात है। मैं अपने तौर पर अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले हर एक के साथ हूं। लेकिन सिर्फ भगवान का नाम लेकर कि ''उपर वाला ही अमीर को अमीर और गरीब को गरीब बनाता है'' इसका मैं कायल नहीं हूं। खुदा के और भी काम है उसको अपना काम करने दो। उसके कामों में बढ़ोत्तरी क्यों कर रहे हो।

आज शब्दों का कितना महत्व है...?

साफ-साफ कहूं तो आज के कल्चर में शब्दों का महत्व बिल्कुल नहीं है। ''क्रिकेट नेता एक्टर हर महफिल की शान-दाढ़ी, टोपी बन गया गालिब का दीवान आज किक्रेट नजर आता है एक्टर नजर आता है पालिटिशियन नजर आता है।
गालिब कहीं नजर आता है? एक फैशन बन गया है सिर्फ पार्लियामेंट में कोट करने गालिब, रहीम और कबीर की लाइनें होती हैं। इस गलतफहमी में मत रहिए कि शब्दों का आज महत्व है। यह इसलिए क्योंकि शब्द बाजार की चीज नहीं है। आज आलू और टमाटर ज्यादा बिकते हैं शब्द कम बिकते हैं।

आज मुशायरों में किस तरह का बदलाव देखते हैं...?

आज जिस तरह मुशायरे होते हैं उनमें आने वाले कितने लोग हैं जो कवियों और शायरों की किताबों की वाकिफ हैं। कौन से आयोजक यह कोशिश करते हैं कि अवाम के बीच स्टेज पर बुलाए जाने वालों का साहित्यिक महत्व भी हो।
आज ब्यूटी पारलर से सजी-धजी लड़़कियां स्टेज पर आती हैं और दूसरों का लिखा अपनी आवाज में सुना कर तालियां बजवाती हैं। बुलाने वाले को भी नहीं मालूम कि गधे और घोड़े में क्या फर्क है।

...लेकिन इन्ही स्टेजों पर तो निदा फाजली को भी बुलाया जाता है..?

निदा फाजली को इसलिए बुलाया जाता है क्योंकि उसका थोड़ा सा संबंध फिल्मों और कुछ सीरियलों से हैं। थोड़ा सा मेहंदी हसन और जगजीत सिंह के लिए लिखी गजलों से है। 
निदा फाजली को इसलिए नहीं बुलाया जाता है कि उसने हिंदी, उर्दू, गुजराती मराठी, इंग्लिश में 23 किताबें लिखी हैं। कोई नहीं जानता कि निदा फाजली को साहित्य अकादमी अवार्ड, गालिब अवार्ड, स्क्रीन अवार्ड मिला है। यह पब्लिसिटी का युग है। जिसका भोंपू जितना बड़ा होता है उसकी आवाज उतनी ज्यादा चलती है।

...तो क्या आज का दौर बाजार का है..?

जी हां, यह दौर बाजार का ही है। जिसकी कीमत जितनी ज्यादा होती है उसका नाम उतना ज्यादा होता है। बंबई के कब्रिस्तान में मधुबाला फेस की वैल्यू ज्यादा होने की वजह से उनकी कब्र मार्बल की थी। 
आवाज की कीमत ज्यादा थी तो वजह से रफी साहब की कब्र ग्रेनाइट की थी। वहीं साहिर लुधियानवीं की कब्र लफ्जों से बनी थी इसलिए मार्केट में वैल्यू नहीं होने के कारण एक बरसात में ढह गई।

क्या कलम से इंकलाब मुमकिन है..?

आप इस धोखे में मत रहिए कि कलम से इंकलाब आ सकता है। आज हमारे समाज के बदलावों ने कलम का दायरा बेहद छोटा कर दिया है। हां, यह जरूर है कि कलम से बेदारी (जागृति) पैदा की जा सकती है कि अवाम अपने हक के लिए लडऩा सीखे।

इतिहास को लेकर हमेशा विवाद की स्थिति रहती है, ऐसे में 

साहित्यकारों की लेखनी में झलकता इतिहास कितना प्रमाणिक मानते हैं आप..?

मैं मानता हूं कि हमारे अदीबों (साहित्यकारों) ने जो भी लिखा उसमें प्रमाणित इतिहास है। इस पर मैनें काम भी किया है। मेरी नई किताब 'आदमी की तरफ नाम से आई है।
जब एनडीए गवर्नमेंट में इतिहास को खत्म किया जा रहा था और इतिहास के कैरेक्टर को हिंदू-मुसलमान में तक्सीम किया जा रहा था। तब मैनें अलाउद्दीन खिलजी के पीरियड के अमीर खुसरो से लेकर मौजूदा दौर तक के तमाम क्लासिकल पोएट के छंदों में गजलें लिखीं। 
यह दिखाने के लिए और खुद ये जानने के लिए कि शायरों ने जो इतिहास लिखा है वह बेहद प्रमाणिक है। उसमे आम लोगों की उंगली पकड़ कर साहित्यकार चलता है। उसमें धार्मिक भेदभाव विभाजन नहीं होता। जब औरंगजेब के दौर में वली दक्कनी कहते हैं-''मुफलिसी सब बहार खोती है, मर्द का एतबार खोती है यहां उनका 'मर्द हिंदू है ना मुसलमान है सिक्ख है ना इसाई है। ये 'मर्द वो आदमी है जो गरीबी में जिंदगी बसर कर रहा है। 
जब अलाउद्दीन खिलजी के दौर में अमीर खुसरो कहते हैं कि ''जो यार देखा नैन भर मन की गई चिंता उतर, ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए गर'' तो मालूम पड़ रहा है कि वो सूफी निजामुद्दीन औलिया की खानकाह में बैठ कर आम लोगों की बात कर रहे हैं। 
सिकंदर लोधी के दौर में जब कबीर कहते हैं कि ''आत्मज्ञान बिना जग झूठा, क्या मथुरा क्या काशी''  यानि साहब आप अपने आप को पहचानो।
यही बात बहादुर शाह जफर के दौर में गालिब ने कही थी कि ''बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना'' तो मां के पेट से पैदा होने वाला आदमी होता है लेकिन अपनी कोशिशों से आदमी इंसान बनता है।
 हमारे पोलिटीशियन जो हैं वो आदमी तो हैं लेकिन इंसा बनने का पूरा रास्ता कैद कर रखे हैं। पहली बात तो ये कि हमारे पॉलिटिशियन लोग इतिहास नहीं पढ़ते हैं। अगर पढ़ते भी हैं तो सिर्फ अपने फायदे के लिए।

उर्दू के वजूद पर खतरा देखते हैं..?

 निदा फाजली, राहत इंदौरी और हसन कमाल
आप उर्दू को मजहब से जोडऩा बंद नहीं करेंगे, उसे एक भारत के कल्चर का हिस्सा नहीं मानेंगे और जब तक उसे सियासत के घेरे से आजाद नहीं करेंगे तब तक उर्दू अपने वजूद के लिए जद्दोजहद करती रहेगी।
पहले नारायण प्रकाश मेहर, राजिंद्र सिंह बेदी, दत्तात्रेय कैफी, कृष्णचंदर, प्रेमचंद की जुबान उर्दू थी। इसे एक मजहब से जोडऩे का काम जिन्होंने अपने सियासी फायदे के लिए किया वे भारत का पूरा नक्शा नहीं देखते। काजी नजरूल इस्लाम ने बंगाली, बशीर वाहिद अंबी ने तमिल तो शैदा ने गुजराती में अपनी शायरी की जबकि ये तीनों मुसलमान थे।
दरअसल एक गलतफहमी पैदा हो गई या कर दी गई। जिससे लोगों को लगने लगा उर्दू तो 'मुसलमान है। जबकि यह पूरी तरह गलत है। अगर मजहब के हिसाब से जुबान तय होती तो मुसलमान हर जगह अरबी में बात करता होता।
 हकीकत ये है कि मुसलमान जहां रहता है वहां की बोली बोलता है। दिक्कत ये है कि हमारे रहनुमाओं को इतिहास नहीं मालूम। अलाउद्दीन खिलजी और बलबन के पीरियड की भाषा हिंदुस्तानी है। 
हजरत अमीर खुसरो ने उस दौर में कहा-''खुसरो रैन सुहाग की....'' ये वो भाषा का रूप है जहां से आगे चल कर आज की हिंदी और आज की उर्दू सामने आई।

मजहबी किताबें लोगों को किस हद तक जोड़ती है..?

मजहबी किताबें तो लोगों को जोडऩे के लिए ही होनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही हमारे देश में बदकिस्मती की बात यह है कि लोग बाइबिल, कुरआन और गीता के शब्दों पर लड़ते तो हैं लेकिन जुड़ते नहीं है। 
यह हमारी ट्रेजडी है। हम इन किताबों में लिखी बातों को ज्यादा अहमियत नहीं देते। यह इसलिए हो गया कि हमारे यहां शिक्षा नहीं है। कुरआन में कहा गया है ''अलहम्दो लिल्लाहि रब्बुल आलमीन'' यानि वो तमाम आलमों का खुदा है। 
तमाम आलमों में तो सोनिया का इटली भी है मुजीब का बांग्लादेश भी है और ओबामा का अमेरिका भी है। जब हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि कण-कण में नारायण व्याप्त है तो जर्ऱे-जर्ऱे में जब उस ख़ुदा का ज़हूर है तो वो जर्ऱा इटली भी होगा अमरीका भी होगा बग़दाद भी होगा। 
जब बाइबिल में 2010 साल पहले खुदा ने रौशनी को सारे आलम में फैलने का हुक्म दिया था तो यह नहीं कहा था कि फलां हिस्से में नहीं जाओ या सिर्फ किसी खास मुल्क के चंद घरों में जाओ। 
अब आलम यह है कि क्रिश्चियन ना तो ईसाईयत को मानता है ना हिंदू अपने धर्म को मानता है ना ही मुसलमान अपने इस्लाम को मानता है। सब बिजनेस कर रहे हैं। आज जेहाद भी बिजनेस है और आतंकवाद भी बिजनेस है, हद तो यह है कि राजनीति भी बिजनेस है।

हाल ही में भाजपा ने अपने अधिवेशन में
 फिर एक बार मंदिर का मुद्दा उठाया है..?

जो लोग मंदिर और मस्जिद की बातें करते हैं उनसे मैं यह पूछना चाहता हूं कि पहले वो पटना से दरभंगा तक बेहतर सड़क क्यों नहीं बनाते। झोपडिय़ों में पीने के लिए जो गंदा पानी है उसे हाइजिनिक क्यों नहीं बनाते।
मैं उनसे यह पूछना चाहता हूं इस भूखे-नंगे देश में माल कल्चर की क्या वैल्यू है। जहां तक मंदिर-मस्जिद की बात है, इसका अपना एहतराम है। ''अंदर मूरत पे चढ़े घी-पूरी मिष्ठान्न,मंदिर के बाहर खड़ा ईश्वर मांगे दान'' कहा गया है। 
इसी तरह जहां छोटे-छोटे घरों मे बड़े-बड़े परिवार रहते हैं वहां एक बच्चा खड़े होकर कहता है-''बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान'' दिक्कत यह है कि वे (पालिटिशियन) आम लोगों का ध्यान नहीं रखते। आम लोगों का शोषण सदियों से हो रहा है।

पद्म सम्मानों को लेकर हर साल विवाद की स्थिति 
रहती है, आपको आज तक ये सम्मान नहीं मिले..?

आज हर चीज बिजनेस है। मैं कभी पद्म सम्मानों की दौड़ में नहीं रहा। मिलने पर मैं इन्हें ठुकरा भी सकता हूं। क्योंकि मैं मानता हूं कि कुत्ते के गले में पट्टा डाल दिया जाए तो कुत्ता एक का हो जाता है। 
मुझे चाहिए आम लोगों की दाद। मैं आम लोगों के लिए लिखता हूं और अगर आम लोग मुझे एप्रिशिएट करते हैं तो मेरा काम हो जाता है। पद्म सम्मान आज जिस तरह दिए जा रहे हैं उसकी वजह यह है कि हमारे जिम्मेदार लोगों अवेयरनेस है ही नहीं।
हद तो यह है कि बेकल उत्साही को पद्मश्री मिल जाता है और अली सरदार जाफरी को नहीं मिलता। क्योंकि हमारे जिम्मेदार लोग कुछ जानते नहीं, यह उनकी गलती नहीं है। बाइबिल में भी कहा गया है कि- या खुदा, उन्हें माफ कर दो वो जानते नहीं वो क्या कर रहे हैं।

आपने फिल्मों में बहुत कम गीत लिखे, इसकी कोई खास वजह...?

जगजीत सिंह और निदा फाजली 
मैं शुरू से सलेक्टिव रहा हूं और अपने समय का दुरूपयोग नहीं करता। फिल्में आती हैं तो मैं मना नहीं करता। जहां गुंजाइश होती है वहीं लिखता हूं। मैनें महेश भट्ट की 'सुर में गीत लिखे।
 मैनें 'सरफरोश में 'होशवालों को खबर क्या लिखने के बाद लड़ाई लड़ ली थी। क्योंकि उन्हें गज़ल बनानी भी नहीं आती थी। खैर, मैनें बीते दौर के म्यूजिक डायरेक्टर्स के साथ भी काम किया और मुझे आज के किसी म्यूजिक डायरेक्टर के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती। 
जब वो ये सोचते हैं कि मैं उनके काम के लिए उपयोगी हूं तो वो खुद आते हैं। मैं किसी के पास नहीं जाता हूं।

...यानि फिल्मों के लिए गीत लिखना आपकी जरूरत नहीं है..?

'हरजाई' की रिकार्डिंग के दौरान निदा, आरडी बर्मन और लता
दाग़ के दौर में बिहार के शायर शाद अजीमाबादी की मशहूर लाइन है कि ''मैं खुद आया नहीं लाया गया हूं  आप समझ लीजिए मेरे साथ भी यही हुआ है। घर से बेघर हुआ, सांप्रदायिकता के कारण हर शहर में घर की तलाश की, तो बंबई में ठिकाना मिल गया। 
जिस ने भी बुलाया, जहां रोटी नजर आती थी चले जाते थे। फिल्म वालों ने बुलाया चले गए, अखबार वालों ने बुलाया चले गए। ये फिल्म लाइन कोई मेरी च्वाइस नहीं है। 
अभी भी कोई मेरे घर आ जाता है मैं लिख देता हूं उनके लिए। मैंनें म्यूजिक डायरेक्टर या प्रोड्यूसर के चक्कर लगाने में पहले अपना वक्त ज़ाया किया ना अब करता हूं। हां,यह जरूर है कि जब मेरे लिखे हुए नग्मों को मकबूलियत मिलती है। 
मसलन ''कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता'' या ''तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है''  जैसे फिल्मी गीत और ''दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है , ''अपनी मर्जी से कहां अपने सफर पर हम हैं'' और ''हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी'' जैसे गैर फिल्मी गीत हमारे बोलचाल के मुहावरे बन गए हों तो खुशी मिलती है। 
वैसे फिल्मों से मैं पूरी तरह दूर नहीं हुआ हूं अभी इस्माइल श्राफ की आने वाली फिल्म 'एक नाजुक सा मोड़'' के लिए लिए गीत लिख रहा हूं।

फिल्मों में इंस्पिरेशन (प्रेरणा) के नाम पर 
कॉपी (नकल) का दौर थमता नहीं दिखता..?

यह आज की बात नहीं है ऐसा हमेशा से होता रहा है। तकलीफ इस बात की है कि इसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जाता है। 
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता थी 'इब्न बतूता पहन के जूता। उसका इस्तेमाल आज की फिल्म 'इश्किया' में हुआ। यानि सर्वेश्वर दयाल को पुस्तक से बाहर आने के में 33 साल लगे? 
मैं साहित्य को साहित्य के इतिहास से पहचानता हूं। मुझे मालूम है कि शब्दों का क्या महत्व होता है। अगर मैं राइटर हूं और पोएट हूं तो दूसरों के शब्दों और दूसरों की रचनाओं की हिफाजत करना भी मेरा फर्ज है।
 मिर्जा गालिब का शेर उठा कर 'दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात-दिन गीत अपने नाम से लिखने का काम मैं नहीं करूंगा। मैं खुद नई बात लिखने की कोशिश करूंगा।
 250 साल की उम्र के गालिब को निजामुद्दीन की अपनी कब्रगाह से निकल कर बंबई आने में काफी वक्त लगेगा और अब वह इतने बूढ़े हो चुके हैं कि आएंगे भी नहीं। 
इसलिए आप गालिब को आसानी से एक्सप्लाइट कर सकते हैं। अब छत्तीसगढ़ का लोकगीत ''ससुराल गेंदा फूल'' है। इस पर किसी और को फिल्म फेयर अवार्ड भी मिल जाता है क्योंकि यह पब्लिसिटी का युग है और इसे कुबूल करना चाहिए यही हकीकत है।

फिल्मों में म्यूजिक के नजरिए से किस तरह का बदलाव देखते हैं?

खय्याम-मदन मोहन 
बदलाव तो हर दौर में होता रहा है। असल में अब जो डायरेक्टर-प्रोड्यूसर और म्यूजिक डायरेक्टर का लाट आया है, उसमें ज्यादातर लोगों को लैंग्वेज (हिंदी-उर्दू) का, भाषा का ज्ञान नहीं है। सारे कान्वेंट में पढ़े हुए हैं। 
पहले मदनमोहन,आरडी बर्मन और खय्याम साहब जैसे लोग थे जो लैंग्वेज को अच्छी तरह समझते थे। इसलिए पहले लिखे हुए पर धुन बनाई जाती थी अब बनी हुई धुन पर लिखवा लिया जाता है।
साहिर लुधियानवी और जां निसार अख्तर जैसे लोग पहले से शायर थे फिर कहीं उन्होंने फिल्मों में लिखना शुरू किया। अब ये होने लगा है कि फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को कल्चर का कोई अवेयरनेस नहीं है। इसलिए अब अगर आप शब्दों के थोड़े बहुत इतिहास से परिचित हैं तो भी आप अपना काम कर सकते हैं।

देहली में आपकी पैदाइश हुई और परवरिश ग्वालियर में, अपने 
इस शहर के बारे में और आप के अब तक के सफर पर कुछ..?

मेरे दो आत्मकथात्मक उपन्यास 'दीवारों के बीच
और 'दीवारों के बाहर' नाम से उर्दू, हिंदी, मराठी और गुजराती में हैं। उसमें मैनें सब कुछ तफसील (विस्तार) से लिखा है। उन्हीं बातों को यहां करना दोहराव हो जाएगा। 
जहां तक ग्वालियर की बात है तो यह एक बहुआयामी सांस्कृतिक शहर है। यहां ग़ौस गवालियरी का मजार है। अकबर के नौ रत्नों में से एक तानसेन और अकबर के दौर के ही अबुल फजल फैजी का मजार है।
दाग देहलवी के जांनशीं (उत्तराधिकारी) नारायण प्रसाद मेहर,जां निसार अख्तर के वालिद मुश्तर खैराबादी और हाफिज अली खां (सरोद नवाज उस्ताद अमजद अली खां के वालिद) भी इसी शहर के हैं। कहा तो यह भी जाता है कि गांधी जी को मारने के लिए गोड़से की तैयारी भी ग्वालियर में हुई थी।

अलग तेलंगाना मसले पर आपकी राय..?

आज सवाल किसी एक नए स्टेट का नहीं है। मेरा मानना है कि पावर चंद हाथों में नहीं बहुत से हाथों में होना चाहिए। दिल्ली में बैठकर मेरे घर के सामने जो सड़क खराब है उसमें सुधार नहीं हो सकता।

लंबे अरसे से लिखते हुए आज आपको वो
 मकाम मिल गया जिसकी तलाश थी..?

इसका फैसला मैं नहीं कर सकता। यह मेरे पाठक या श्रोताओं को तय करना है। मैं मानता हूं किसी रचना से रचनाकार का संबंध उसकी रचनात्मकता तक होता है। 
जब रचना कागज पर आ जाती है तो रचनाकार मर जाता है। फिर सारा अख्तियार पाठक या श्रोता पर होता है। एक दौर में कबीर दास को पंडितों ने कहा कि ये कवि नहीं है, इसे भाषा नहीं आती, ये अज्ञानी है। 
लेकिन आज मालूम पड़ता है कि अज्ञानी कहनो वालों को कोई नहीं जानता कबीर दास को सब जानते हैं। जहां तक मेरी बात है तो जैसे शकर के दाने की तरफ चींटी अपना सफर तय करती है बस वैसे ही मैं भी अपने काम में लगा हूं।

कुल मिला कर आप अपनी शख्सियत को कैसे बयां करेंगे?

सफर मुकम्मल 8 फरवरी 2016
सच कहूं तो मैं दरअसल भारतीय रेलवे की सवारी गाड़ी की तरह हूं। जिसमें एसी, सेकंड क्लास और जनरल कंपार्टमेंट भी है। मैं जिस कंपार्टमेंट में जिस वक्त होता हूं वहां के नियमों को निभाता हूं। 
जब मैं किसी अखबार या बीबीसी के लिए अपनी टेबल में बैठकर कालम लिखता हूं तो अलग मूड में होता हूं। जब अपनी किताब के लिए या फिर गजल लिखता हूं तो अलग मिजाज में होता हूं। 
मैनें अपने आप को इन अलग-अलग डिब्बों की तरह ढाल लिया है। मैं किसी एक कंपार्टमेंट में अपना ज्यादा वक्त खराब नहीं करता हूं। हां, यह सच है कि पहले समस्या रोटी और पानी की थी,अब समस्या अपनी कहानी की है।

(निदा फाजली से यह इंटरव्यू लेने वाले लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन भिलाई में रहते हैं। इस्पात नगरी भिलाई के इतिहास पर उनकी बहुचर्चित किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' हाल ही में प्रकाशित है। उनसे 9425558442 या mzhbhilai@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)

Saturday, December 17, 2011

बीएसपी के प्रथम स्‍कूल के पूर्व छात्रों की एलुमनी चैप्टर-888 ने ‘गुरुदक्षिणा’ में सम्मानित किया अपने गुरुजनों को

भिलाई इस्पात संयंत्र के सर्वप्रथम स्‍कूल प्राइमरी स्‍कू ल क्रमांक -1 (पीएस-1) के पूर्व छात्रों की एलुमनी चैप्टर-888 ने अपने गुरूजनों को 4 सितंबर 2011 को स्‍कू ल प्रांगण मे आयोजित एक भव्य समारोह ‘गुरुदक्षिणा’ में सम्मानित किया। 

चैप्टर-888 यानि 88 में 8 वीं पास आउट स्टूडेंट का संगठन। 1 जुलाई 1957 को सेक्टर-1 के ट्यूबलरशेड आवास में बीएसपी का पहला स्‍कूल शुरू हुआ था। यहां से बीएसपी के ज्यादातर स्‍कू ल निक ले। बाद के वर्षों में 1975 में इस स्‍कूल को अपना नया भवन मिला। 1984-85 से यहां मिडिल स्‍कूल भी लगने लगा और अब 2003 से यह इंग्लिश मीडियम मिडिल स्‍कू ल में तब्दील हो गया। बीएसपी के शिक्षा जगत की नींव तैयार करने वाले इस स्‍कूल के 40 से ज्यादा शिक्षकों के सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि बीएसपी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी पंकज गौतम थे।

चैप्टर-888 ने इस भव्य समारोह के लिए तीन माह से युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू क र दी थी। 4 सितंबर की सुबह स्‍कू ल प्रांगण में एक के बाद शिक्षकों के आने का सिलसिला शुरू हुआ। इनमें ज्यादातर शिक्षक तो ऐसे थे, जो 20 से 25 साल बाद एक दूसरे से रूबरू हो रहे थे। सारे शिक्षक एक दूसरे से गले मिलक र बेहद भावुक हो गए थे। सीईओ श्री गौतम कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके लेकिन उन्होंने अपना शुभकामना संदेश भिजवाया। बीएसपी के ईडी इंचार्ज मानस कुमार बिंदु ने अपने उद्बोधन में खास तौर पर इस बात को रेखांकिंत किया कि जो काम वह और उनके साथी आज तक नहीं क र पाए, वह काम चैप्टर-888 ने अपने गुरूजनों का सम्मान करके कर दिखाया। डीजीएम जनसंपर्क एसपीएस जग्गी, सीईओ सचिवालय के डीजीएम कृष्ण कुमार सिंह, एजीएम एजुकेशन डीपी सत्पथी और ईएमएमएस-1 की एचएम श्रीमती शीबा जेम्स ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।

इसके पहले ‘गुरुदक्षिणा’ की शुरूआत अनूठे ढंग से हुई। चैप्टर-888 के स्टूडेंट के साथ तमाम अतिथियों व गुरुजनों से मिलक र इस स्‍कू ल में पूर्व में की जाने वाली प्रार्थना ‘वह शक्ति हमे दो दया निधे’ को समवेत स्वर में गाया। इसके बाद स्वागत की परंपरा शुरू हुई। चैप्टर-888 के प्रवीण जैन, क मलजीत सिंह, केएस सुशील, बालन स्वामी, प्रदीप पात्रो, मुकी त खान, जगेंद्र बिसने, रोहित वरखेड़क र व सुनीता पासी सहित अन्य लोगों ने अतिथियों का स्वागत किया। एलुमनी से जुड़े मोहम्मद जाकिर हुसैन ने स्वागत भाषण मे आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके उपरांत एलुमनी द्वारा निकाले गए विशेषांक ‘गुरूदक्षिणा’ का विमोचन अतिथियों ने किया। फिर शुरू हुई सम्मान की परंपरा। पहला सम्मान स्‍कू ल की संस्थापक प्रधानपाठिका स्व. श्रीमती शिरीन लुसियस पन्नालाल को दिया गया। स्व. लाल की सुपुत्री वनिता लाल यह सम्मान लेते हुए बेहद भावुक हो उठीं, उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि कैसे उनकी मम्मी और उनके दौर के लोगों ने मुश्किल हालात में इस स्‍कूल को शुरूआती दौर में चलाया। इसके उपरांत स्‍कूल में सर्वाधिक समय तक प्रधानपाठिका रही सुश्री प्रेमी शिरीन गैब्रिएल को सम्मानित किया गया। सुश्री गैब्रिएल ने सम्मान के लिए शुक्रिया अदा क रते हुए ट्यूबलर शेड से इस पक्की बिल्डिंग में आने के चुनौतीपूर्ण दौर का खास तौर पर जिक्र किया।

इसी तरह स्‍कूल के रिटायर प्रधानपाठक एसके भटनागर, एसआर शेवलीकर, एसएस पॉल, ए. पीटर, फ्लोरिया मार्टिन, सुनंदा वाटवे, शांता अर्नाल्ड, सुरेखा हंबीर निंबालकर, विमला तिवारी, भगीरथी ठाकुर, सुरेशचंद सेन, रमेश कु मार देशमुख, हरीश प्रसाद निगम, पुष्पादेवी सचदेव, पूर्णिमा हॉफमैन, फिरोज सरवर सुल्तान सिद्दीकी , शहनाज रहमान, चीनू बोस, वीणा कमल रवानी, जंत्री देवांगन, स्वतंत्र कुमार सोनी, ऊषा नंद, शीला पॉल, कमल प्रसाद डोंगरवार, शशिक कांत गिडियन, कविता रामवानी, प्रतिमा मित्तल, प्रकाश डोगरा, मीना अग्रवाल, वीणा अग्रवाल, गीता गोखले, धनलक्ष्मी आचारी और स्वर्णलता दुआ को भी अतिथियों ने ‘गुरुदक्षिणा’ में सम्मानित किया। बरसों बाद मिले शिक्षकों और छात्रों ने सम्मान समारोह के बाद रूबरू बैठक क र एक दूसरे का हाल जाना। आयोजन में एलमुनी के सदस्य प्रवीण चाफले ने ‘है प्रीत जहां की रीत सदा’ गीत सुना क र लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। जैक्सन ब्वायज डांस ग्रुप और ईएमएमएस-1 की ओर से रंगारंग सांस्‍कृतिक कार्यक्ररम भी प्रस्तुत किया गया।

समूचे कार्यक्रम का संचालन सुबोध पांडेय व अभय आनंद मुखरैया ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आनंद साहू ने दिया। चैप्टर-888 के सिल्वर जुबली समारोह में मिलने के वायदे के साथ शिक्षको और स्टूडेंट ने एक दूसरे से विदा ली। चैप्टर-888 से जुड़े स्टूडेंट में आशुतोष अग्रवाल,अवधेश यादव, डॉ. सीवी राजशेखर, धनंजय पांडेय, गिरीराज देशमुख, हनुमंत इंगवले, हर्षदेव नाफड़े,हितेंद्र बोरकर, जितेंद्र कटझरे, कमलेश सेन, मछंदर प्रसाद, मनहरण लाल साहू, मंगल कन्नौजिया, मनीष जैन, मिर्जा जाहिद बेग, मोहम्मद मूसा, मुख्तार खान, नागेंद्र सिंह, नावेद आमिर खान, पवनजीत सिंह, प्रसन्ना टोकेकर, पुष्पक कौशिक , आर. राजेश, राम प्रवेश, शहनाज खान, शौकत अली, शुभराज सिंह, सुधीर खोब्रागढ़े, तुषार रणदिवे, विनय नायडू, जफर जावेद, जाहिद खान, जाकिर अहमद, अजय त्रिपाठी, तलत अफजा, बसंती बोस, प्रतिमा गेडाम, शम्सुन्निसा और अर्चना तिवारी सहित अन्य शामिल हैं।

हम क्यूबा के लोगों की रगों में बहता है हिंदुस्तानी खून


ओसिरिस ओवियडो डी ला तोरे से चर्चा करते जाकिर

वल्र्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस की डिप्टी जनरल सेक्रेट्री से खास बातचीत
उनका चेहरा-मोहरा हिंदुस्तानी है और माथे के उपर झांकती सफेदी कुछ-कुछ इंदिरा गांधी सी भी लगती है। ऐसे में यह शिना त करना मुश्किल है कि अंतरराष्ट्रीय संस्था वल्र्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस की डिप्टी जनरल सेक्रेट्री ओसिरिस ओवियडो डी ला तोरे मूलत: स्पेनिश भाषी क्यूबा की नागरिक है। यहां एक्टू के राष्ट्रीय स मेलन में भाग लेने आई ओसिरिस ने शनिवार को ‘भास्कर’ से खास बातचीत में न सिर्फ हिंदुस्तान से अपने लगाव को बताया बल्कि क्यूबा, अमेरिका और फिदेल कास्त्रो से जुड़े सवालों पर भी वह खुल कर बोलीं।
इंडिया और इंडियन सुन कर बेहद उत्साहित ओसारिस ने कहा-हमारे पूर्वज इंडियन थे, फिर 1495 में जब स्पेनिश जहाज क्यूबा पहुंचे तो उन व्यापारियों ने मजदूरी के लिए बड़ी सं या मे अफ्रीकन लोगों को भी लाया। इस तरह आज के क्यूबा में इंडियन, स्पेनिश और अफ्रीकन लोगों की ही पीढिय़ा रह रही हैं। हमारी रगों में हिंदुस्तानी खून बह रहा है। मैं पूरे दावे के साथ तो नहीं कह सकती कि मेरे पूर्वज दिल्ली, मुंबई या जयपुर से आए थे, बस इतना पता है कि वो इंडियन थे। इंडियन पर्सनालिटी की आप बात करेंगे तो मैं सिर्फ महात्मा गांधी
को जानती हूं, क्योंकि मैनें बचपन में स्कूल की किताबों में उनके बारे में पढ़ा था। अब भी मैं गांधी जी के बारे में ज्यादा जानने की उत्सुक रहती हूं। मैं बार-बार इंडिया आती रहती हूं लेकिन यहां का खाना खाते हुए कई बार मेरे आंसू निकल जाते हैं। हमारे इंडियन लोग इतना तेज मसाला और नमक कैसे खा लेते हैं, मुझे तो बेहद तकलीफ होती है। यहां भिलाई में दो दिन से मैं उबला हुआ भोजन ले रही हूं। बाकी इंडियन ट्रेडिशन और कल्चर की तो बात मत पूछिए। फेडरेशन की गतिविधियों से जब भी मुझे फुरसत मिलती है मैं स्पेनिश सब टाइटिल वाली इंडियन मूवी जरूर देखती हूं। आप मुझे नाम पूछेंगे तो नहीं मालूम लेकिन दो साल पहले एक गरीब बच्चे की मिलेनियर बनने वाली फिल्म और एक विशेष बीमारी से पीडि़त मुस्लिम युवक पर अमेरिका में बीतने वाली कहानी पर बनीं फिल्म मुझे बेहद पसंद आई। (उनका मतलब स्लम डॉग मिलेनियर और माइ नेम इज खान से था)। मुस्लिम युवक वाली फिल्म मैनें दो-तीन मरतबा देखी और मैं बहुत भावुक हो गई। यहां भिलाई में ज्यादा कुछ देखने का मौका नहीं मिला, आते-जाते जो हरियाली दिखी उसने मुझे बहुत ही इंप्रेस किया।

आज भी प्रेरणा दे रहे हैं कास्त्रो

ओसारिस ने क्यूबा और पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो के बारे में सवालों का जवाब देते हुए कहा कि हमारे नेता कास्त्रो आज बढ़ती उम्र की वजह से ज्यादा अस्वस्थ हो गए हैं लेकिन वह लगातार लिख रहे हैं और हम क्यूबा वासियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। जहां तक कास्त्रो के बाद का सवाल है तो अभी उनके भाई राउल कास्त्रो राष्ट्रपति हैं। नीतियां तो बदली नहीं है। आज क्यूबा आर्थिक सुधार के दौर से गुजर रहा है, इसके बावजूद वहां बड़े उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों का निजीकरण नहीं किया गया है। एक सवाल के जवाब में ओसारिस ने कहा कि अमेरिका के खिलाफ दृढ़ता से खड़े रहने की वजह से क्यूबा ने बहुत कुछ भुगता है। लेकिन इसे लेकर हम चिंतित नहीं है। अमेरिका आज भी हमारे देश पर कई प्रतिबंध लगाए हुए है और हमारे नेता फिदेल कास्त्रो पर अब तक 200 से ज्यादा जानलेवा हमले अमेरिका की शह पर हो चुके हैं। इसके बावजूद फिदेल आज हम सब के बीच हैं और हम लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं।

बांग्लादेश में नई बात नहीं है विनिवेश : आलम

महबूबुल आलम से चर्चा करते जाकिर
बांग्लादेश ट्रेड यूनियन सेंटर के नेता अबू कौसर  मोहम्मद महबूबुल आलम ने ‘भास्कर’ से चर्चा करते हुए बताया कि उनके यहां दो दशक से दो दलीय शासन है। अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की अपनी ट्रेड यूनियन है, उसके बाद हमारी ट्रेड यूनियन के सर्वाधिक सदस्य हैं। दोनों प्रमुख दलों के बाद बची ट्रेड यूनियनों का संचालन वहां काफी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि किसी भी संगठित या असंगठित क्षेत्र में मजदूर इन तीसरे पक्ष की यूनियनों से जुडऩा चाहते हैं तो उन्हें रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है।
हमारे यहां विनिवेश या निजीकरण कोई नई बात नहीं है। जूट, शक्कर, टेक्सटाइल और स्टील मिलों मे 1971 के बाद से जबरदस्त विनिवेश हुआ है। ऐसे में आज 10 प्रतिशत से भी कम उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के रह गए हैं। बांग्लादेश की आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है। विश्व बैंक का दबाव हमारी सरकारों पर रहता है कि वो विदेशी निवेश ज्यादा से ज्यादा करें। इसके लिए हम बांग्लादेशी बिल्कुल भी राजी नहीं है। हम लोग चाहते हैं कि विदेशी निवेश हो लेकिन हमारी शर्तों पर। हमारे यहां गैस का प्रचुर भंडार है। हम लोग गैस खोजते हैं और उसे निकालने विदेशी आकर भारी मुनाफा कमाए यह मंजूर नहीं होगा। इसलिए हमारे यहां इंजीनियर शेख मोह मद सइदुल्लाह के नेतृत्व में 10 साल से आंदोलन चल रहा है और कई मोर्चों पर हमें कामयाबी भी मिली है। बांग्लादेश के भविष्य को लेकर मैं इसलिए आशान्वित हूं, क्योंकि अब वहां जनता पहले से ज्यादा जागरुक हो गई है।

Wednesday, June 8, 2011

रशियन खुशबू फिर फैलाने की कोशिश

तत्कालीन सोवियत संघ सरकार की वाणिज्यिक फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) फिर एक बार भिलाई में रूसी हलचल बढ़ाने की तैयारी में। रूसी तकनीशियनों के साथ डॉक्टर व टीचर भी लाना चाहते हैं। उद्योगों से भी हाथ मिलाने का वादा। ब्लास्ट फर्नेस से लेकर प्लेट मिल तक बीएसपी की सारी यूनिट तैयार करने वाली रूसी फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) फिर एक बार सक्रिय हुई है। टीपीई की तैयारी न सिर्फ प्लांट के स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की है बल्कि भिलाई के सामाजिक माहौल में भी अपनी भागीदारी देने आगे आना चाहती है। टीपीई के स्थानीय प्रमुख अलेक्जेंडर एस. करयुकिन ने ‘भास्कर’ से खास मुलाकात में अपनी भविष्य की रणनीतियों का खुलासा किया।
श्री करयुकिन ने बताया कि वर्तमान में टीपीई न सिर्फ स्टील सेक्टर बल्कि एग्रीकल्चर सेक्टर व अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े क्षेत्र में भी सक्रिय है। भिलाई स्टील प्लांट में फिलहाल कोक ओवन और ब्लास्ट फर्नेस के लिए रशियन एक्सपर्ट कंपनी की ओर से भेजे गए हैं। वहीं बहुत ही सीमित मात्रा में इक्विपमेंट सप्लाई का कार्य भी मिला हुआ है। कंपनी कारखाने के स्तर पर विस्तारीकरण और आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट में ज्यादा से ज्यादा काम लेने की इच्छुक है।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा वह भिलाई के सामाजिक माहौल में भी अपना योगदान देना चाहते हैं। श्री करयुकिन ने कहा कि-उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि 1990 तक भिलाई में रशियंस ने काफी योगदान दिया है और हमारे टेक्निकल एक्सपर्ट के अलावा डॉक्टर व टीचर भी हुआ करते थे। इसे ध्यान में रखते हुए हाल ही में उन्होंने बीएसपी के डायरेक्टर इंचार्ज (एमएंडएच) डॉ. सुबोध हिरेन से मुलाकात की थी। जिसमें उन्होंने टीपीई की तरफ बीएसपी अस्पताल में रशियन स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स और नर्स के जॉब के लिए संभावनाओं पर चर्चा की। टीपीई की तरफ से यहां मेडिकल इक्विपमेंट सप्लाई के लिए उन्होंने संभावनाएं तलाशी हैं। उन्होंने बताया कि शिक्षा के क्षेत्र में भी टीपीई योगदान की इच्छुक है। जिसमें बीएसपी स्कूलों और दुर्ग-भिलाई के दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में रूसी भाषा सिखाने टीचर उपलब्ध कराने के भी हम इच्छुक हैं। वहीं रूसी फिजिक्स पढ़ाने भी हम टीचर उपलब्ध कराना चाहते हैं। इस संबंध में उनकी बीएसपी के मुख्य शिक्षा अधिकारी कृष्ण कुमार सिंह से चर्चा हुई थी। वहीं दुर्ग के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में भी उनकी बात हुई है। श्री करयुकिन ने बताया कि डॉ. हिरेन और श्री सिंह से उनकी चर्चा सार्थक रही और उम्मीद है कि जल्द ही कोई नतीजा निकलेगा। श्री करयुकिन ने बताया कि वह स्थानीय सहायक उद्योगों के साथ भी मिल कर काम करने के इच्छुक हैं। यदि कोई एंसीलरी आगे आए तो वह उनके साथ वाणिज्यिक संबंध बनाना चाहेंगे।
भिलाई और रशियन का साथ पुराना
भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना मेें सोवियत संघ का सहयोग किसी से छिपा नहीं है। बहुत कम लोगों को मालू्म है कि बीएसपी मेें सोवियत संघ की तरफ से त्याशप्रोम एक्सपोर्ट की वह एकमात्र कंपनी थी,जिसने 1मिलियन टन की पहली ब्लास्ट फर्नेस से लेकर 4 मिलियन टन की आखिरी यूनिट प्लेट मिल तक की स्थापना की है। 1984 में प्लेट मिल की स्थापना के बाद अंतरर्राष्ट्रीय परिस्थितियां बदली और बीएसपी के विस्तारीकरण व आधुनिकीकरण में अन्य देशों की कंपनियां भी ठेके लेने लगी। इससे टीपीई पिछड़ते गई। फिर 1991 में सोवियत संघ के विखंडन के बाद टीपीई की भिलाई में सक्रियता धीरे-धीरे कम होती गई। अब बदलती परिस्थितियों के मद्देनजर टीपीई फिर एक बार सक्रिय हुई है।

फिर मचेगी धूम ‘888’ के दौर की

सेक्टर-1 मिडिल स्कूल के 1988 बैच स्टूड़ेंट हुए एकजुट
888 यानि 1988 में पास आउट 8 वीं का बैच। सेक्टर-1 का बीएसपी प्रायमरी स्कूल मिडिल में तब्दील हुआ और इंग्लिश मीडियम होने के बाद अब यह स्कूल ईएमएमएस-1 कहलाता है। इस स्कूल का नाम और मीडियम बदला लेकिन इस स्कूल से भावनात्मक लगाव रखने वालों का यहां से आज भी रिश्ता कायम है। इस स्कूल में 1980 से 1988 तक अपनी पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट एकजुट हुए हैं। तैयारी है पुराने दोस्तों को इक_ा कर अपने स्कूल के दिनों की यादों में खो जाने की। आगे और भी कार्यक्रम होने हैं जिसमें एलुमनी का गठन के साथ ही आगामी सालों में 1988 बैच की सिल्वर जुबली मनाना भी शामिल है।
इस्पात नगरी के विभिन्न स्कूलों की एलुमनी की तर्ज पर सेक्टर-1 के इस स्कूल के पुराने स्टूडेंट भी एलुमनी बनाने सक्रिय हुए हैं। इस स्कूल से पास आउट प्रवीण जैन, नवेद आमिर खान और के एस सुशील बताते हैं-1988 के बाद 22 साल का अरसा बीत गया है और इस दौरान कभी ऐसा मौका नहीं आया कि सारे दोस्त एक साथ इक_े हुए हों। दरअसल मिडिल स्कूल के बाद पूरा बैच बिखर गया और सभी साथी अलग-अलग स्कूलों में चले गए। इसके बाद जॉब व अन्य कारणों से बहुत से साथी देश के विभिन्न हिस्सों और विदेश में भी बस गए। इस बैच के सीवी राजशेखर, आनंद साहू और हर्षदेव नाफड़े ने बताया कि हाल ही में भिलाई में रहने वाले सेक्टर-1 के 88 बैच के 10-12 साथी इक_े हुए। इसके बाद तय हुआ कि सभी की तलाश की जाए। ऐसे में बहुतों का पता मिला, कुछ के मोबाइल नंबर मिले और इस तरह धीरे-धीरे 40 से ज्यादा साथियों से संपर्क हो पाया। अभी भी मिर्जा जाहिद बेग, श्रीधर, गोपीनाथ, लालसिंह, गुरदीप सिंह, जगेंद्र बिसने व पीवी राममूर्ति सहित बहुत से ऐसे क्लासमेट हैं, जिनका संपर्क सूत्र मिल नही पाया है।
इस ग्रुप के हितेंद्र बोरकर, कमलजीत सिंह व मनहरण लाल साहू ने बताया कि सेक्टर-1 मिडिल स्कूल से 1988 में 8 वीं पास आउट स्टूडेंट 29 मई रविवार की शाम छह बजे सेक्टर-1 के पार्क में इक_ा हो रहे हैं। जहां आगे के कार्यक्रमों की रणनीति बनाई जाएगी।

आईआईटी जेईई के गिरते परिणाम खतरे की घंटी

आईआईटी की परीक्षा में इस साल दुर्ग भिलाई से बैठे - 3600 स्टूडेंट

25 मई को जारी परिणाम स्कूलवार सफल स्टूडेंट
डीपीएस भिलाई-23
डीपीएस दुर्ग-2
गुरुनानक स्कूल से.6 -2
इंदु आईटी स्कूल-1
कृष्णा पब्लिक स्कूल-6
केंद्रीय विद्यालय दुर्ग-1
मां शारदा पब्लिक स्कूल-1
एमजीएम से.6 -4
शंकराचार्य हुडको- 2
शिवा पब्लिक स्कूल-2
बीएसपी से-10 व से.4-14
स्वामी विवेकानंद से.2-1
विश्वदीप दुर्ग-1
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सफल स्टूडेंट कुल-60
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बीएसपी के स्कूलों से आईआईटी चयनित
वर्ष स्टूडेंट
1984 29
1985 21
1986 23
1987 27
1988 25
1989 17
1990 19
1991 16
1992 17
1993 13
1994 15
1995 25
1996 31
1997 29
1998 28
1999 27
2000 24
2001 23
2002 24
2003 28
2004 18
2005 14
2006 15
2007 19
2008 05
2009 09
2010 08
2011 14
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वास्तविकता कुछ और है
इस साल के आईआईटी जेईई परिणाम को देखकर भले ही कुछ लोग खुश हो सकते हैं कि पहली बार इतने ज्यादा स्कूलों से भिलाई-दुर्ग के स्टूडेंट सफल हुए हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और है। इन आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण करें तो यह एजुकेशन हब कहलाने वाले भिलाई के लिए खतरे की घंटी है। हर सफल स्टूडेंट को सिर्फ अपना बताने वाले कोचिंग और ट्यूशन के बढ़ते जाल के बीच आईआईटी एक्जाम एक फैशन की तरह हो गए हैं। जितने स्टूडेंट परीक्षा देने बैठ रहे हैं उसके मुकाबले सफलता का प्रतिशत बेहद कम है। शिक्षाविद् भी इस गिरावट से चिंतित हैं।
हैरान कर देने वाले आंकड़े
आईआईटी के ज्वाइंट एंट्रेंस एक्जाम (जेईई) में देश भर से इस साल कुल 4 लाख 68 हजार 240 स्टूडेंट शामिल हुए। जिसमें 25 मई को जारी परिणाम अनुसार कुल 13 हजार 602 (2.9 प्रतिशत) को सफलता मिली। एजुकेशन हब या सेंटर ऑफ एक्सीलेंस कहलाने वाले भिलाई में (दुर्ग सहित) इस साल 3600 स्टूडेंट इस परीक्षा में शामिल हुए जिसमें महज 60 (1.6 प्रतिशत) को सफलता मिली। इसके विपरीत दो दशक पुराने रिकार्ड देखें तो 1984 में देश भर के 30 हजार प्रतिभागियों के बीच कोचिंग के जंजाल से मुक्त अकेले भिलाई से ही 29 स्टूडेंट सफल हुए थे। आज के भिलाई के गिरते आईआईटी परिणाम के मुकाबले पुणे जैसे शहर में इस साल 5 हजार स्टूडेंट शामिल हुए जिनमेें से 150 सफल रहे।
परीक्षार्थी बढ़े लेकिन सफलता घटी
आईआईटी की परीक्षा में शामिल होने वाले स्टूडेंट्स की तादाद दिनों दिन बढ़ती जा रही है। जहां 1998 के पहले सिर्फ 4 सेंटरों में यह परीक्षा होती थी और लगभग 2 हजार बच्चे शामिल होते थे वहीं अब दुर्ग-भिलाई के 8 सेंटरों में यह परीक्षा होती है और 3600 स्टूडेंट बैठते हैं। आने वाले सालों में सेंटर और परीक्षार्थियों की तादाद में और इजाफा होने की संभावनाएं जताई जा रही है। स्टूडेंट की बढ़ती तादाद और कोचिंग सेंटरों के बढ़ते दावों के बीच सफल प्रतियोगियों की तादाद भी इसी अनुपात में बढऩी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं रहा है। हालत यह है कि 100 के अंदर सिर्फ एक स्टूडेंट का नाम आया है और 1000 के अंदर सिर्फ 4 स्टूडेंट हैं। इसके विपरीत 90 के दशक में ऑल इंडिया रैंकिंग में टॉप 10 में ज्यादातर स्टूडेंट भिलाई के होते थे।
क्या फैशन हो गया है आईआईटी?
जिस तरह आईआईटी में बैठने वाले स्टूडेंट की तादाद बढ़ी है, उससे साफ है कि समाज में आईआईटी-जेईई को लेकर क्रेज सा बना दिया गया है। इंडस्ट्रियल टाउनशिप मेें रहने वाले हर पालक का सपना होता है उनका बच्चा इंजीनियर बनें। बाजार इसका फायदा उठाना खूब जानता है लिहाजा बेतहाशा कोचिंग खुल गए हैं लेकिन इसके अनुपात में सफलता की दर गिरती जा रही है। पहले जहां राष्ट्रीय स्तर पर सफल 3000 स्टूडेंट की सूची जारी होती थी और उसमें भिलाई (दुर्ग सहित) से 20 से 30 स्टूडेंट सफलता दर्ज करते थे। इसके विपरीत आज 10 हजार का चयन हो रहा है और भिलाई के स्टूडेंट 1000 के अंदर कम और 5 हजार से 10 हजार के बीच बड़ी मुश्किल से रैंकिंग हासिल कर पा रहे हैं। ज्यादातर असफल स्टूडेंट और उनके पालकों की धारणा यह रहती है कि अगर आईआईटी में नहीं लगा तो एआई ट्रिपल ई या फिर पीईटी में अच्छा परफार्म कर लेंगे।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
इतने कंपटीशन के माहौल में 60 बच्चों का चयन होना संतोषजनक तो है लेकिन इसमें और सुधार की जरूरत है। भिलाई के स्टूडेंट अगर सोचें कि उन्हें कोई एजेंसी, कोई संस्था या कोई व्यक्ति ज्यादा बेहतर हेल्प कर सकता है तो इसमें सफलता कम भ्रम ज्यादा है। स्टूडेंट को खुद पर भरोसा रखना चाहिए और पालक अपने बच्चों के साथ खुद तय करें कि क्या उनका बच्चा आईआईटी की परीक्षा में बैठने योग्य है अथवा नहीं? बेहतर रिजल्ट के लिए और अधिक समर्पण की जरूरत है।
कृष्ण कुमार सिंह, मुख्य शिक्षा अधिकारी, बीएसपी
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आज जब नर्सरी प्रवेश को मिशन आईआईटी बोला जा रहा है तो इसमें क्रेज ज्यादा और गंभीरता कम है। हर पालक अपने बच्चे को आईआईटी में भेजने का ख्वाब पाल रहा है इससे परीक्षार्थी बढ़ रहे हैं और कोचिंग भी खूब फल-फूल रहे हैं लेकिन इसके अनुपात में सफलता की दर गिर रही है। स्कूल की पढ़ाई और खुद की तैयारी पर पालक और स्टूडेंट का ध्यान कम हो गया है। अफसोस की बात है कि भिलाई से आईआईटी का परिणाम ढलान की ओर जा रहा है।
आरसी सिंह, सेवानिवृत्त मुख्य शिक्षा अधिकारी बीएसपी
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हम अपने स्कूल के परिणाम से संतुष्ट हैं। स्कूल में जो माहौल दिया जा रहा है उसकी वजह से सकारात्मक परिणाम आ रहा है। आज स्टूडेंट अपना सेल्फ एप्लीकेशन,सेल्फ मोटिवेशन और खुद की रूचि के साथ यह सफलता दर्ज कर रहे है। बाहर के बारे में मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना। हां, कहीं जाने से सफलता मिल जाएगी, यह दौर चल पड़ा है और फैशन सा हो गया। इससे फायदे को लेकर मुझे डाउट है। इसके चलते कई बार स्टूडेंट प्रेशर में भी आ जाते है। जरूरत इस बात की है कि स्टूडेंट अपने स्कूल में रेगुलर, सिलेबस ठीक से कवर करे और खुद पर भरोसा रखे।
एमपी यादव, प्राचार्य डीपीएस, भिलाई
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आनंद के. आईआईटी में देश भर में 47 वां

रिसाली के कल्पतरू अपार्टमेंट में 25 मई की सुबह फिर एक बार खुशियां लेकर आई। पिछले साल यहां टॉप फ्लोर पर रहने वाले विपुल सिंह ने आईआईटी में राष्ट्रीय स्तर पर 5 वां और समूचे खडक़पुर रीजन में पहला स्थान हासिल किया था। तारीख वही है बस साल भर बदला है और विपुल के घर के ठीक नीचे दूसरी मंजिल पर रहने वाले आनंद के. ने इस बार आईआईटी में देश भर में 47 वां और समूचे खडक़पुर रीजन में पहला स्थान हासिल कर फिर यहां खुशियां बिखेर दी है।
इस अपार्टमेंट में ज्यादातर बीएसपी व निजी कंपनियों में कार्यरत अफसरों के घर हैं। एनएमडीसी बचेली में असिस्टेेंट जनरल मैनेजर एन केशवन नंबुदिरी भिलाई में बेहतरीन पढ़ाई का माहौल देखते हुए दो साल पहले परिवार सहित इसी अपार्टमेंट में रहने आ गए थे। उनके दोनों बेटे आनंद के. और अरविंद के. डीपीएस भिलाई में पढ़ रहे हैं। बुधवार की सुबह से देर रात तक इस घर में बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। कोई मोबाइल फोन पर बधाई दे रहा था तो कोई गुलदस्ते लेकर आनंद व उसके परिजनों को बधाई देने पहुंच रहा था। इन बधाइयों के बीच आनंद के पिता के चेहरे पर गंभीरता है। वह कहते हैं आनंद की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है। उसके भविष्य की दिशा तो अब तय होगी। खडक़पुर रीजन के इस साल के टॉपर के घर ‘भास्कर’ ने कुछ पल बिताए।
इंटरनेट नहीं, दोस्त ने दी खबर
श्री नंबुदिरी को मालूम था कि हर साल 25 मई को आईआईटी का परिणाम आ जाता है लिहाजा वह एनएमडीसी से अपनी छुट्टी लेकर 24 मई को ही भिलाई पहुंच गए थे। बुधवार की सुबह रोज की तरह 7 बजे आनंद की नींद खुली। आनंद की मां आशादेवी बताती हैं कि हमें किसी कोचिंग संस्थान से फोन आ चुका था कि परिणाम 8:30 बजे जारी होगा। चूंकि इस घर में हाल ही में शिफ्ट हुए हैं, इसलिए यहां इंटरनेट नहीं है। ऐसे में आनंद के किसी दोस्त ने फोन पर यह खुशखबरी दी। आनंद के मुताबिक उसे 50 के अंदर रैंकिंग की तो पूरी उम्मीद थी, इसलिए कहीं और कन्फर्म करने की कोई जरूरत नहीं पड़ी।
जमकर बजाया की बोर्ड
आनंद पिछले दो साल से आईआईटी की तैयारी में गंभीरता से जुटा हुआ था। आनंद के पिता श्री नंबुदिरी बताते हैं कि वह कभी गिटार बजाया करते थे और उनका बेटा की-बोर्ड बेहद शौक से बजाता है। लेकिन आईआईटी की तैयारी के लिए पिछले दो साल से उसने की-बोर्ड बहुत कम बजाया था। आज जब रिजल्ट आया, उसके बाद उसने सबसे पहले माता-पिता के चरण छूकर आशीर्वाद लिए और फिर भगवान के आगे नतमस्तक हुआ। इसके बाद उसने की-बोर्ड खोला और जम कर बजाया। आनंद ने बताया कि उसे वेस्टर्न म्यूजिक ज्यादा पसंद है और माइकल जैक्सन व लिंकेन पार्क को वह अपना आइडियल मानता है।
इतना मीठा....नहीं..नहीं
सफलता की खबर मिलने के बाद मोबाइल पर दी जाने वाली बधाई तो ठीक है लेकिन घर पहुंचने वाले लोग आनंद को मिठाई खिलाना नहीं भूल रहे। आनंद इससे थोड़ा सा परेशान दिखा। ‘भास्कर’ से आनंद ने कहा-इतनी मिठाई मैनें कभी नहीं खाई। मैनें अपने माता-पिता का मुंह मीठा किया और उन्होंने व भाई ने मुझे मिठाई खिलाई लेकिन इसके बाद अब और मिठाई....इतना मीठा मैं नहीं खा सकूंगा।
भरपूर नींद और भरपूर पढ़ाई
आनंद ने अपनी सफलता का राज साझा करते हुए बताया कि उसे दिन में सोने की आदत नहीं है और रात में वह अनिवार्य रूप से 10:30 से सुबह 7 बजे तक की भरपूर नींद लेता है। उसने कभी इस बात का टेंशन नहीं लिया कि देर रात तक पढऩा है या फिर बिल्कुल सुबह उठ कर याद करना है। पूरे दो साल स्कूल और कोचिंग के अलावा घर में भी उसने पढ़ाई की लेकिन समय का सही नियोजन कर उसने बिना किसी तनाव के अपना कोर्स पूरा किया और रिवीजन भी।
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Monday, June 6, 2011

दिल्ली के भरोसे आंदोलन खत्म, नीचे उतरे युवा

नई दिल्ली में सारे टीए प्रशिक्षितों को नौकरी देने के संबंध में नीति बनाने के आश्वासन के बाद बुधवार की रात 11:30 बजे आंदोलनकारी सेक्टर-9 की पानी टंकी से उतर गए। इसके पहले अस्पताल के कान्फ्रैंस हॉल में 3:30 घंटे तक चली मैराथन बैठक में कई बार गतिरोध की स्थिति आई, अंतत: कार्पोरेट ऑफिस से आए अफसर के आश्वासन के बाद आंदोलनकारी पानी टंकी से नीचे उतरने राजी हो गए।
बीएसपी में ट्रेड अप्रेंटिसशिप (टीए) का प्रशिक्षण पाए 1998 बैच के युवा आंदोलनकारी 12 अप्रैल की शाम से सेक्टर-9 अस्पताल की पानी टंकी पर चढ़े हुए थे इन लोगों की मांग लिखित तौर पर एनएमआर नियुक्ति पत्र देने की थी। आंदोलन को समाप्त करवाने 24 घंटे में मैनेजमेंट और नई दिल्ली स्तर पर कई कोशिशें हुई।
अंतत: बुधवार की शाम 7:30 बजे आंदोलनकारियों से बातचीत की पहल हुई। जिसमें सेल के ईडी पीएंडए बी. ढल, बीएसपी के ईडी पीएंडए एसके शर्मा, जीएम पर्सनल इंचार्ज राजकुमार नरूला, पूर्व विधायक अरुण वोरा, कलेक्टर ठाकुर रामसिंह व अन्य लोग शामिल हुए।
बातचीत के दौरान कई बार गतिरोध की स्थिति आई। अंतत: सेल के ईडी श्री ढल ने आश्वस्त किया कि नई दिल्ली में कार्पोरेट स्तर पर इस संबंध में नीति बनाने पहल की जाएगी जिससे इन टीए प्रशिक्षितों को नौकरी दी जा सके। बैठक में मौजूद पूर्व विधायक अरूण वोरा की सहमति के बाद अंतत: आंदोलनकारी टंकी से नीचे उतरने राजी हो गए। बैठक से बाहर निकले आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कुलदीप सिंह व संतोष सिंह ने साथियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराया।अंतत: 11:30 बजे रात को सारे आंदोलनकारी पानी टंकी से नीचे उतर आए।
इससे पहले दोपहर में आंदोलन को समर्थन देने आए कांग्रेस नेता अमित जोगी ने पानी टंकी के नीचे घोषणा की कि यदि मैनेजमेंट इनकी मांग नहीं मानती है तो भिलाई स्टील प्लांट में काम बंद करवा दिया जाएगा। इस आंदोलन की वजह से बुधवार की दोपहर तीन युवाओं की तबीयत बिगड़ गई। बैकुंठधाम के जितेंद्र नारंग, मोरिद के कृष्ण कुमार और खुर्सीपार के गुलाब कुमार को ऊपर टंकी पर ही छांव कर लिटाया गया और चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई गई।
आंदोलन स्थल पर दिनभर गहमा-गहमी रही। शाम को बीएसपी के जनरल मैनेजर इंचार्ज पर्सनल राजकुमार नरूला ने मीडिया के समक्ष वस्तुस्थिति रखते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की वजह से बीएसपी में सिर्फ खुली भर्ती के माध्यम से ही रोजगार संभव है, वहीं आंदोलनकारियों को बीती रात एमडी विनोद अरोरा की मौजूदगी में तीन विकल्प दिए गए हैं। इसमें बीएसपी की विस्तारीकरण परियोजना में एचएससीएल के माध्यम से डेली रेट में काम दिलाने, को-आपरेटिव सोसाइटी के माध्यम से काम दिलाने और खुली भर्ती के दौरान आवेदन की स्थिति में इंटरव्यू के दौरान प्राथमिकता देने का आश्वासन दिया गया है। श्री नरूला ने स्पष्ट किया कि बीएसपी में टीए प्रशिक्षण ट्रेड अप्रेंटिसशिप अधिनियम 1961 के प्रावधान के तहत दिया जाता है, जिसमें प्रशिक्षण के उपरांत युवाओं को नौकरी पर रखने की बाध्यता कतई नहीं है।
प्रबंधन जुटा था व्यवस्था बनाने में
टीए आंदोलन को देखते हुए बीएसपी नगर सेवाएं विभाग बुधवार को सक्रिय रहा। सेक्टर-9 अस्पताल की सभी पानी टंकियों की एहतियातन जांच की गई और चारों तरफ रोशनी की व्यवस्था की गई। गतिरोध बरकरार रहने की स्थिति में संभावित स्थिति को देखते हुए मैनेजमेंट ने पानी टंकी के चारों ओर रेत बिछाने की योजना भी बना ली थी।
सीएम ने किया हवाई मुआयना
बुधवार की शाम एक कार्यक्रम में शामिल होने आए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का हैलीकॉप्टर भी पानी टंकी के ऊपर से गुजरा। इससे कुछ देर के लिए आंदोलनकारियों में चर्चा थी कि मुख्यमंत्री उनके आंदोलन का हवाई मुआयना कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों को उम्मीद बंधी
टीए आंदोलकारियों को इस बैठक के बाद उम्मीद बंधी है कि नई दिल्ली में इस बार सार्थक हल जरूर निकलेगा। पिछले 32 घंटे तक उपर रहे अपने साथियों के लिए नीचे आंदोलनकारी युवाओं ने हर संभव सहयोग व समर्थन दिया। वक्त-वक्त पर इन युवाओं के लिए खाने की व्यवस्था की गई साथ ही ग्लूकोज व पानी भी भिजवाया गया।
टीओटी लड़ रहे 13 साल से हक की लड़ाई
एक तरफ टीए प्रशिक्षितों की बीएसपी में नौकरी के लिए जद्दोजहद चल रही है तो दूसरी तरफ टेक्नीकल कम ऑपरेटर (टीओटी) की नियुक्ति से वंचित 88 युवा भी 13 साल से नौकरी की बाट जोह रहे हैं। इन प्रभावित युवाओं में 30 भिलाई-दुर्ग के और शेष छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों से हैं। इस वजह से कई बार यह युवा पूरी तरह संगठित भी नहीं हो पाते हैं। आंदोलन इन युवाओं ने भी किया और अभी भी दिल्ली कूच का सिलसिला जारी है। इसके बावजूद अभी तक इन्हें कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाया है।
क्या है टीओटी का मामला
भिलाई स्टील प्लांट में आईआईटी से प्रशिक्षित और बीएसपी पास युवाओं को 1996 तक रोजगार दफ्तर के माध्यम से बुलावा पत्र भेज टीओटी में निश्चित प्रक्रिया के बाद नियुक्त किया जाता था। इसी के तहत अगस्त 1996 मेें टीओटी के लिए रोजगार दफ्तर के माध्यम से नाम मंगाए गए और प्रक्रिया के तहत 18 जनवरी 1997 को लिखित परीक्षा हुई। इनका साक्षात्कार दिसंबर 1997 को हुआ और चयनित युवाओं के 4 समूह बनाए गए। जिनका स्वास्थ्य परीक्षण क्रमश: जनवरी, फरवरी, जून एवं अक्टूबर 1998 को हुआ। इसके बाद पहले समूह के 119 को मार्च 1998, दूसरे समूह के 231 को जुलाई 1998 और तीसरे समूह के 113 की नियुक्ति मार्च 2001 को हुई। चौथे समूह में कुल 138 उम्मीदवार थे। जिनमें से 50 को मार्च 2003 में नियुक्ति दी गई और शेष 88 उम्मीदवार आज तक भटकर रहे हैं।
अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला
टीओटी के युवाओं ने बड़े पैमाने पर आंदोलन अक्टूबर 2000 से शुरू किया था। लगातार आंदोलनों के चलते 2001 और 2003 में टीओटी में भर्तियां हुई। इसके बावजूद 50 युवा नौकरी से वंचित रह गए। इन युवाओं ने 2004 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दस्तक दी। जहां मामला 6 साल तक चलता रहा। इस बीच कथित तौर पर बीएसपी के कुछ अफसरों के कहने पर याचिकाकर्ताओं ने 12 जनवरी 2010 को मामला इस उम्मीद पर वापस ले लिया कि उन्हें नौकरी मिल जाएगी लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। इस बीच सेल-बीएसपी से लेकर इस्पात मंत्रालय तक कई फेरबदल हो गए लेकिन अभी तक इन्हें आश्वासन ही मिलता रहा।
हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद नियुक्तियां कैसे..?
टीओटी बैच के युवा बीएसपी मैनेजमेंट के रवैये से उद्वेलित हैं। इन लोगों का कहना है कि बीएसपी मैनेजेंट जनवरी 2004 के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस निर्देश का हवाला देता है जिसमें नियुक्ति सिर्फ खुली भर्ती और रोजगार कार्यालय के माध्यम से करने कहा गया है। इन युवाओं के मुताबिक इसके बावजूद मार्च 04 में 50 टीओटी और 84 टीए को एसीटी के पद पर नियमित किया गया। वहीं क्रीड़ा एवं मनोरंजन विभाग में 40 लोगों को टीओटी का स्टेटस देकर मार्च 07 में नियमित किया गया। टीओटी युवाओं का सवाल है कि मैनेजमेंट उनके मामले में जब हाईकोर्ट के निर्णय का हवाला देता है तो इन मामलों में कैसे नियुक्ति हो गई। टीओटी युवाओं में अब भी उम्मीद बरकरार है कि नई दिल्ली में उनके साथ इंसाफ होगा।
सीधे इंटरव्यू से नियुक्ति की मांग भी उठी
टीए आंदोलनकारियों में दल्ली राजहरा के युवाओं का समूह भिलाई के कुछ साथियों और संयुक्त खदान मजदूर संघ के महासचिव कमलजीत सिंह मान के साथ 14 अप्रैल की दोपहर इस्पात भवन में एमडी वीके अरोरा से मिला। बैठक में शामिल युवाओं के मुताबिक डेढ़ घंटे की चर्चा के दौरान मैनेजमेंट ने अपनी मजबूरी जाहिर कर दी वहीं यह बात भी निकल कर आई कि विस्तारीकरण परियोजना में 1000 पदों पर खुली भर्ती की जानी है, जिसमें टीए बैच के लिए मैनेजमेंट की ओर से आयुसीमा में छूट का प्रावधान रखा जा सकता है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों में चर्चा हुई,जिसमें आंदोलनकारियों ने यह मांग उठाई की उन्हें आयु सीमा में छूट के साथ सीधे इंटरव्यू के माध्यम से लिया जाए। युवाओं के मुताबिक एमडी श्री अरोरा ने आश्वस्त किया है कि दिल्ली में इस संबंध में चर्चा की जाएगी। युवाओं ने बताया कि श्री मान भी सोमवार 18 अप्रैल को दिल्ली जाकर इस संबंध में प्रस्ताव कार्पोरेट ऑफिस में रखेंगे।

गिरी को बर्दाश्त नहीं हुई उपेक्षा
जिस युवक की वजह से तीन दिन भिलाई में बीएसपी-पुलिस व जिला प्रशासन को हलाकान होना पड़ा, वह युवक पवन गिरी अब पूरी तरह स्वस्थ्य है। सिरसाकलां निवासी पवन गिरी वर्तमान में निगम में सफाई कर्मी के रूप में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर काम करता है। शादी-शुदा पवन गिरी ने जिन हालातों में 10 अप्रैल को जान देने की कोशिश की वह वर्तमान सामाजिक ढांचे की विसंगति को बयान करती है। सिरसाकलां निवासी पवन 1997 के टीए बैच का प्रशिक्षण प्राप्त युवा है। पवन के बैच में 173 लोगों ने एक साथ ट्रेनिंग की लेकिन बीएसपी में नौकरी मिली सिर्फ 127 को। शेष आज भी नौकरी के लिए भटक रहे हैं। पवन की मानें तो उसके बैच का ही एक साथी नौकरी लगने के बाद संपन्नता का जीवन बिता रहा है। यह साथी रविवार 10 अप्रैल की सुबह अपनी कार से गुजर रहा था और उसने साइकिल से जाते गिरी को रोका और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछ दिया कि तुम लोगों की संडे की बैठक में क्या हुआ..? इससे गिरी को बुरा लगा और उसने अपने परिवार को ऐसा सुविधा संपन्न जीवन न दे पाने के मलाल के साथ जान देने का फैसला कर लिया। हालांकि सभी की तत्परता से गिरी की जान बच गई है। सेक्टर-9 अस्पताल से छुट्टी के बाद उसके साथियों ने भरोसा दिलाया है कि हालात जरूर बदलेंगे। इसी भरोसे के सहारे गिरी अब अपने परिवार में लौट गया है।

अन्न साक्षात ईश्वर

शादी हो या कोई पार्टी, हम हिंदुस्तानियों के लिए पूरी थाली भर लेना और थोड़ा खा कर बाकी फेंक देना अब आम बात हो गई है। दावत कैसी भी हो, हम खाना तो खाते ही हैं साथ ही मेजबान द्वारा रखवाई गई सारी डिश को बहुत ज्यादा-ज्यादा लेकर उसमें से थोड़ा सा चखना भी चाहते हैं और आखिर में ठंडा-गरम और पान के साथ विदाई हो तो क्या बात है।

खाने की ऐसी बेकद्री, वह भी ऐसे देश में जहां आज भी कुपोषण और अनाज आखिरी तबके तक नहीं पहुंचने की समस्या बरकरार है। इस बेकद्री के माहौल में हम अपने धर्मग्रंथों को भी भूल गए हैं, जिनमें भोजन को लेकर न सिर्फ आचार संहिता है, बल्कि भोजन के महत्व को भी साफ तौर पर बताया गया है। लोग नहीं चेते, इसलिए केंद्र सरकार पड़ोसी मुल्क की तर्ज पर ‘वन डिश’ कानून बनाने पर विचार कर रही है। जिसमें सामूहिक दावतों में सिर्फ एक तरह की डिश परोसना अनिवार्य किया जाएगा।

इस मौसम मेें अगले दो महीने शादियों की भरमार है। कुछ मुहूर्त तो ऐसे हैं जो दुर्लभ हैं, लिहाजा इस मुहूर्त में हर कोई अपने बेटे-बेटियों की शादियां करना चाह रहा है। स्वाभाविक है कि एक ही दिन में एक ही परिवार को औसतन 5-6 से ज्यादा आमंत्रण मिले। हमारी कोशिश होगी कि हम हर जगह अपनी उपस्थिति दें लेकिन हर जगह भोजन भी करें ऐसा संभव नहीं। फिर भी मेजबान तो अपने मेहमानों के लिहाज से आज के दौर में जरूरत से ज्यादा ही भोजन पकवाएगा। ऐसे में शादियों के इस मौसम में दूसरे दिन सुबह का नजारा जरूर देखिए जहां औसतन 100 से 150 लोगों का खाना बरबाद होकर खुले में पड़ा रहता है। डिस्पोजल ग्लास और कटोरियां भी खुले में पड़ी आपको मिल जाएंगी जो घातक प्लास्टिक की बनीं है। अब किराया भंडार वालों ने भी स्टेनलेस स्टील के ग्लास-कटोरियों को शादी-पार्टी में देना बंद कर दिया है। इन सबका दबाव रहता है कि डिस्पोजल खरीदो और इस्तेमाल के बाद फेंक दो। इस पर अभी तक किसी शासन-प्रशासन ने नियम बनाने और कार्रवाई करने की तरफ ध्यान नहीं दिया है। जरा गौर कीजिए, हम जितने डिस्पोजल ग्लास और कटोरी को इस्तेमाल कर फेंक देते हैं, वह इस धरती पर बोझ नहीं तो और क्या है। आखिर हम कब चेतेंगे...?


वेदों में अन्न को साक्षात ईश्वर मानते हुए ‘अन्नम वै ब्रह्म’ लिखा गया है। वैदिक संस्कृति में भोजन मंत्र का प्रावधान है। जिसका सामूहिक रूप से पाठ कर भोजन ग्रहण किया जाता है। हमारे यहां भोजन के दौरान ‘सहनौ भुनक्तु’ कहा जाता है, इसके पीछे भावना यह है कि मेरे साथ और मेरे बाद वाला भूखा न रहे। वेदों मे ‘अन्नम बहु कुर्वीत’ कहा गया है, यानि अन्न अधिक से अधिक उपजाइए। कृषि और ऋषि प्रधान देश में अगर हम अन्न का महत्व नहीं समझेंगे तो भविष्य में प्रकृति खुद हमें समझा देगी।
आचार्य महेशचंद्र शर्मा, वैदिक संस्कृति के जानकार

कुरआन-हदीस ने चेताया है खाने की बरबादी से
कुरआन शरीफ के 8 वें पारे की रूकू-4 में कहा गया है-‘खाओ उसी में से जो अल्लाह ने तुम्हे रोजी दी है और शैतान के कदमों पर न चलो’। हदीस-22 इब्ने माजह में हजरत आयशा (रदि.) से रिवायत है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद घर के अंदर तशरीफ लाए तो रोटी का एक छोटा सा टुकड़ा पड़ा हुआ देखकर उसे उठाया और पोछ कर खा लिया। उन्होंने अपनी बीवी आयशा से फरमाया कि ये चीज (रोटी)जब किसी कौम से रूठी है तो लौट कर नहीं आई है। इस्लाम में हर हाल में रोटी के एहतराम का हुक्म है। हजरत मोहम्मद ने रोटी खाने के आदाब (तरीके) भी बताए हैं। इसे न मानते हुए अगर हम खाने की बेकद्री करते हैं तो यह हमारी बदकिस्मती होगी।
हाफिज मक्सूद खान, मदरसा रूआबांधा

बाइबिल ने रोका है पेटूपन से
बाइबिल में अन्न के सम्मान का कई जगह उल्लेख है। एक आयत में कहा गया है कि हम खाने का लालच (पेटूपन) बिल्कुल न करें। हमारी जितनी आवश्यकता है, हम उतना ही खाएं। इसी तरह प्रेरितों के काम अध्याय (6-2)में कहा गया है कि हम परमेश्वर का वचन छोडक़र खिलाने-पिलाने की सेवा में रहें, यह ठीक नहीं। इसाई समुदाय मे आय का दसवां भाग परमेश्वर के काम (जनकल्याण) में खर्च करने का विधान है। जिससे दीन-दुखियों की सेवा हो। हम शादी-पार्टियों में अन्न बरबाद करके खुद के साथ-साथ प्रकृति का भी नुकसान कर रहे हैं। इस पर गंभीरता से सोचना होगा।
रेव्ह. राकेश प्रकाश पास्टर मेनोनाइट चर्च, हास्पिटल सेक्टर

गुरुओं ने बताया है सत्कार के साथ खाना
सिक्खों में गुरु अंगद देवजी से लंगर की प्रथा नियमित हुई। जिसमें स्त्री-पुरुष को समान अधिकार है। सिक्खों में पहले पंगत फिर संगत का प्रावधान है। जिसमें पंगत में एक साथ बैठकर (प्रसाद मानते हुए)भोजन करने और झूठन नहीं छोडऩे का निर्देश है। आज के दौर में भोजन बरबाद करने की कुवृत्ति को रोकने जनजागरण जरूरी है।
दलजीत सिंग, गुरू गोविंद सिंग स्टडी सर्किल भिलाई

अन्न का एक दाना तैयार होता है 4 माह में
एक अन्न का दाना तैयार होने मे चार महिने का समय, श्रम और पानी लगता है। इतनी मेहनत से तैयार दानों को हम बेदर्दी से फेंक देते हैं। इस दिशा में सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। हम बफे सिस्टम का दुरूपयोग कर रहे हैं। खाना जरूरत से ज्यादा लेने के बाद उसे फेंक कर हम गरीबों के मुंह का निवाला भी छीन रहे हैं। आज कृषि उत्पादन और जनसंख्या का अनुपात गड़बड़ा रहा है। अगर हम ऐसे ही अन्न फेंकते रहे तो जल संकट की तरह जल्द ही अन्न संकट का सामना करना पड़ेगा।
डॉ. आरती दीवान, गृहविज्ञान विभागाध्यक्ष, शासकीय इंदिरा गांधी कॉलेज वैशाली नगर

बीएसपी की कमान फिर से भिलाइयंस को

भिलाई। पंकज गौतम के रूप में भिलाईवासियों को फिर एक बार अपने ही बीच का एक नेतृत्वकर्ता मिल गया है। तीन दिन पहले ही ईडी वक्र्स के तौर पर जवाबदारी संभालने वाले श्री गौतम को भिलाई स्टील प्लांट का नया ईडी (इंचार्ज) बनाया गया है। पिछले 5 साल में श्री गौतम तीसरे ऐसे भिलाइयंस हैं, जिन्हें अपने ही प्लांट में नेतृत्व का अवसर मिला है।
भिलाई स्टील प्लांट में 90 के दशक में डॉ. ईआरसी शेखर के बाद करीब डेढ़ दशक तक ‘सेल’ की दूसरी ईकाई के एक्जीक्युटिव डायरेक्टरों को पदोन्नत कर भिलाई का मुखिया बनाया जाता रहा। पिछले 5 साल में यह परंपरा टूटी। 31 जुलाई 2006 को राजेंद्र प्रसाद सिंह की सेवानिवृत्ति के बाद राघवचारी रामराजु को बीएसपी की कमान सौंपी गई थी। श्री रामराजु ने अपने कैरियर की शुरूआत भिलाई से ही की थी और वह एमडी के पद से भिलाई से ही रिटायर हुए। 30 मार्च 2010 को श्री रामराजु के रिटायरमेंट के बाद तत्कालीन ईडी वक्र्स अशोक कुमार को प्रभारी एमडी बनाया गया लेकिन वह भी एक माह में रिटायर हो गए। उनके बाद एक माह तक एक्जीक्युटिव डायरेक्टरों की कमेटी ने प्लांट का संचालन किया। फिर भिलाई से ही अपनी सेवा की शुरूआत करने वाले और कार्पोरेट ऑफिस से स्थानांतरित होकर लौटे विनोद कुमार अरोरा को ईडी प्रोजेक्ट के साथ-साथ प्रभारी एमडी का दायित्व सौंपा गया। अब एक और भिलाइयंस पंकज गौतम को नेतृत्व सौंपा गया है।
रायपुर के गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स में बीई और एएमआईआईएम करने के बाद श्री गौतम ने वर्ष 1974 में भिलाई इस्पात संयंत्र की इलेक्ट्रिकल रिपेयर शॉप में बतौर जूनियर इंजीनियर ज्वॉइन किया। विभिन्न विभागों में अपनी क्षमता का लोहा मनवाते हुए श्री गौतम अप्रैल 2009 में महाप्रबंधक (परियोजनाएं) बनें। पांच महीने बाद सितंबर 2009 में वे कार्यपालक निदेशक के पद पर आसीन हुए और सेलम इस्पात संयंत्र विशाखापट्टनम का नेतृत्व उन्हें दिया गया। सेलम में श्री गौतम ने 2000 करोड़ रूपए के परियोजना कार्यों को समय से पूरा करते हुए अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया।

Sunday, May 22, 2011

पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस


कहि देबे संदेस

(यू सर्टिफिकेट)
केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड
35 एमएम, लंबाई – 3500.93 मीटर, रील – 13
प्रमाणपत्र संख्या – 91,725
जारी करने की तारीख – 06/10/1979
जारीकर्ता – अपर्णा मोहिले
(यह प्रमाणपत्र पुर्नप्रदर्शन का है। वास्तव में यह फिल्म 14 अप्रैल 1965 को रिलीज हुई थी)
चित्र संसार के मोनो के साथ पाश्र्व में सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ की पंक्ति निर्माता-निर्देशक मनु नायक की आवाज में गूंजती है -
इस पथ का उद्देश्य नहीं है
श्रांत भवन में टिक रहना
किंतु पहुंचना उस सीमा तक
जिसके आगे राह नहीं है।
इसके बाद टाइटिल इस तरह शुरू होता है।
हम आभारी हैं श्री रामाधार चंद्रवंशी, श्री बृजलाल वर्मा एमएलए, श्री एपी श्रीवास्तव बीडीओ एवं पलारी ग्राम वासियों के जिनका उदार सहयोग प्राप्त हुआ है।
चित्र संसार प्रस्तुत करते हैं
कहि देबे संदेस
पात्र
सुरेखा पारकर, उमा राजु, कानमोहन, कपिल कुमार, दुलारी, वीना, पाशा, सविता, सतीश, टिनटिन और साथ में नई खोज कमला, रसिकराज, विष्णुदत्त वर्मा, फरिश्ता, गोवर्धन, सोहनलाल, आरके शुक्ल, बेबी कुमुद,अरूण, कृष्णकुमार,बेबी केसरी….और रमाकांत बख्शी
संकलन – मधु अड़सुले, सहायक – प्रेमसिंग
वेशभूषा – जग्गू
रंगभूषा – बाबू गणपत, सहायक – किशन,
स्थिर चित्रण – आरवी गाड़ेकर, श्री गुरूदेव स्टूडियो
छाया अंकन – के.रमाकांत, सहायक – बी.के.कदम
रसायन क्रिया – बाम्बे फिल्म लेबोरेटरीज प्रा.लिमिटेड, दादर
प्रोसेसिंग इंचार्ज – रामसिंग
प्रचार सामग्री व परिचय लेखन – काठोटे, भारती चित्र मंदिर रायपुर
निर्माण व्यवस्था – बृजमोहन पुरी
प्रचार अधिकारी – रमण
नृत्य – सतीशचंद्र
ध्वनि आलेखन – त्रिवेदी साऊंड सर्विस
गीत आलेखन – कौशिक व बीएन शर्मा
पार्श्वगायन – मोहम्मद रफी, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, मुबारक बेगम,
मीनू पुरूषोत्तम, सुमन कल्यानपुर
गीत – राजदीप
संगीत – मलय चक्रवर्ती, सहायक – प्रभाकर
सह निर्देशक – बाल शराफ
लेखक, निर्माता, निर्देशक – मनु नायक
(टाइटिल में पार्श्वगायन में मुबारक बेगम का नाम जरूर है लेकिन उनकी आवाज में इस फिल्म में गीत नहीं रखा गया है। इसी तरह फिल्म में प्रमुख भूमिका निभाने वाले शिवकुमार दीपक ने अपना नाम रसिकराज रख लिया था, इसलिए टाइटिल में यही नाम दिया गया है।)

मनु नायक और ‘कहि देबे संदेस’ की पृष्ठभूमि
पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले मनु नायक की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 11 जुलाई 1937 को रायपुर तहसील के कुर्रा गांव (अब तिल्दा तहसील) में जन्मे श्री नायक 1957 में मुंबई चले गए थे कुछ बनने की चाह लेकर। यहां शुरूआती संघर्ष के बाद उन्हें काम मिला निर्माता-निर्देशक महेश कौल के दफ्तर में। आज शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि गोपीनाथ, हम कहां जा रहे हैं, मुक्ति, दीवाना, प्यार की प्यास, सपनों का सौदागर, तलाक और पालकी जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले कश्मीरी मूल के फिल्मकार महेश कौल का रायपुर से भी रिश्ता था। इस छत्तीसगढ़ी रिश्ते पर बात फिर कभी।
खैर, स्व.महेश कौल की सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक पं.मुखराम शर्मा के साथ व्यवसायिक साझेदारी में अनुपम चित्र नाम की कंपनी थी। इसी अनुपम चित्र के दफ्तर में मुलाजिम हो गए मनु नायक। मुलाजिम भी ऐसे कि लगभग ‘ऑल इन वन’ का काम। प्रोडक्शन से लेकर अकाउंट सम्हालने तक का काम और इन सब से बढ़ कर हिंदी में लिखने वाले पं.मुखराम शर्मा की रफ स्क्रिप्ट को फेयर करने कॉपी राइटर जैसी जवाबदारी भी। पं.मुखराम शर्मा की लिखी और महेश कौल की निर्देशित अनुपम चित्र की पहली फिल्म ‘तलाक’ 1958 में रिलीज हुई। राजेंद्र कुमार, कामिनी कदम, राधाकिशन और सज्जन अभिनीत इस फिल्म में गीत पं.प्रदीप और संगीत सी.रामचंद्र का था। फिल्म ‘तलाक’ सुपर-डुपर हिट साबित हुई और इसके साथ ही चल निकली अनुपम चित्र कंपनी। इस कंपनी ने न सिर्फ फिल्में बनाई बल्कि फिल्मों के प्रदर्शन के अधिकार भी खरीदे। इस तरह मनु नायक भी फिल्म निर्माण के हर पहलू से परिचित होते गए। मनु नायक के बारे में कुछ और बातें आगे होंगी लेकिन अभी पहले एक ऐसे घटनाक्रम की बातें जिसने एक छत्तीसगढिय़ा को अपनी मिट्टी की भाषा में पहली फिल्म बनाने प्रेरित किया।
भोजपुरी ने दिखाया छत्तीसगढ़ी को रास्ता
वह 1961-62 का दौर था जब पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’की रिकार्ड तोड़ सफलता ने भोजपुरी सिनेमा का सुखद अध्याय शुरू किया। दादर के रूपतारा स्टूडियो व श्री साउंड स्टूडियो में धड़ल्ले से दूसरी कई भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग चल रही थी। माहौल ऐसा था कि क्षेत्रीय सिनेमा के नाम से भोजपुरी फिल्मों का सूरज पूरे शबाब पर था। ऐसे में रंजीत स्टूडियो में महेश कौल की दूसरी फिल्मों में व्यस्त फिल्मकार मनु नायक तक भी भोजपुरी फिल्मों की चर्चा पहुंची। ‘गंगा मइया…’ और उसके बाद बनने वाली ‘लागी नाही छूटे राम’ और ‘बिदेसिया’ जैसी दूसरी फिल्मों की सफलता ने मनु नायक को भी उद्वेलित किया कि आखिर हम छत्तीसगढ़ी में फिल्म क्यों नहीं बना सकते।
अनुपम चित्र कंपनी के मुलाजिम के तौर पर 350 रूपए मासिक पगार पाने वाले मनु नायक के सामने चुनौती थी कि छत्तीसगढ़ी में फिल्म बनाएं तो बनाएं कैसे…? एक तो रकम का जुगाड़ नहीं दूसरे हौसला डिगाने वाले भी ढेर सारे लोग। भोजपुरी के नज़ीर हुसैन, शैलेंद्र, चित्रगुप्त और एस.एन.त्रिपाठी जैसे दिग्गज छत्तीसगढ़ी फिल्म में नहीं है तो फिर तुम्हारी छत्तीसगढ़ी फिल्म मुंबई में बनेगी कैसे? इसमें कौन काम करेगा? बन भी गई तो देखेगा कौन? सिर्फ छत्तीसगढ़ में रिलीज कर घाटे की भरपाई कर पाओगे? ऐसे ढेर सारे ‘ताने’ और सवाल थे युवा मनु नायक के सामने। लेकिन पास था तो खुद का विश्वास और डॉ.हनुमंत नायडू ‘राजदीप’ जैसे हौसला देने वाले दोस्त का साथ। फिर महेश कौल और पं.मुखराम शर्मा की छाया का भी असर था कि बहुत सी दिक्कतें तो शुरूआती दौर में ही खत्म हो गई।
पार्टनर नदारद … साथ दिया अपनों ने
अंग्रेजी की कहावत ‘वैल बिगन इस हाफ डन’ की तर्ज पर स्टोरी, कास्टिंग और दूसरे तमाम पहलुओं को फाइनल करने के बाद अंततः मनु नायक ने तय किया पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म को छत्तीसगढ़ अंचल में ही फिल्माया जाए। मनु नायक अपनी फिल्म के निर्देशन की जवाबदारी महेश कौल के सहायक के तौर पर सेवा दे रहे रायपुर के निर्जन तिवारी को देना चाहते थे। हालांकि कुछ व्यक्तिगत कारणों से अनुबंध के बावजूद मनु नायक ने निर्जन तिवारी को ‘नमस्ते’ कर खुद ही निर्देशन की जवाबदारी सम्हालने का फैसला लिया। लेकिन ‘कहि देबे संदेस’ के रास्ते में रूकावटें भी कम नहीं थी। फिल्म निर्माण के लिए मनु नायक का रायपुर के व्यवसायिक भागीदारों नारायण चंद्राकर और तारेंद्र द्विवेदी के साथ बाकायदा अनुबंध हुआ था,जिसमें प्रमुख रूप से इस बात का उल्लेख था कि श्री नायक अपनी पूरी टीम लेकर रायपुर पहुंचेंगे और इन भागीदारों द्वारा पहले से तय की गई पंडरिया और आस-पास के लोकेशनों पर शूटिंग होगी,जिसका सारा खर्च भी भागीदार ही उठाएंगे।
इस तरह अनुबंध के अनुसार श्री नायक अपनी टीम लेकर 12 नवंबर 1964 को मुंबई से रायपुर के लिए रवाना हो गए। अगले दिन दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर नारायण चंद्राकर मिले और अनमने ढंग से यह बता दिया कि रायपुर में श्री द्विवेदी ने कोई तैयारी नहीं की है। ऐसे मुश्किल वक्त में मनु नायक को रायपुर के रामाधार चंद्रवंशी, पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा, बीडीओ एपी श्रीवास्तव और पलारी गांव के लोगों का उदार सहयोग मिला। फिल्म के टाइटिल में मनु नायक ने इन लोगों का आभार जताया है।

रायपुर में बुनकर संघ के सामने खपरा भट्ठी के पास रामाधार चंद्रवंशी के निवास पर श्री नायक ने अपनी पूरी टीम को ठहराया और टहलते हुए बस स्टैंड की तरफ निकले। जहां संयोग से उनकी मुलाकात पलारी से कांग्रेसी विधायक बृजलाल वर्मा से हो गई। चूंकि उन दिनों अखबारों में मनु नायक और उनकी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के बारे में काफी कुछ छप रहा था लिहाजा श्री वर्मा ने पैदल जा रहे मनु नायक को रोका और हालचाल पूछा। जब श्री नायक ने अपनी दुविधा बताई तो उन्होंने तुरंत सारी व्यवस्था करने एक चिट्ठी अपने भाई तिलक दाऊ के नाम लिख दी। बातों-बातों में श्री वर्मा ने शर्तनुमा एक प्रस्ताव भी रख दिया कि पूरी फिल्म की शूटिंग पलारी में होगी और यह सुविधा भी दे दी कि महिलाओं के लिए उनके घर के पुश्तैनी गहने इस्तेमाल किए जाएंगे।

मुहूर्त शॉट रायपुर के विवेकानंद आश्रम में
इस तरह तय फिल्म की शूटिंग का रास्ता साफ हो गया लेकिन पलारी के लिए रवानगी तय हुई 14 नवंबर की शाम की। ऐसे में श्री नायक के सामने दुविधा थी कि पूरे एक दिन टीम को ख़ाली कैसे रखे। इसका भी इंतजाम उन्होंने कर लिया। पास के रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाकर उन्होंने स्वामी आत्मानंद से मुलाकात की और धूम्रपान की पाबंदी की शर्त पर उन्होंने आश्रम के भीतर एक दृश्य फिल्माने की इजाजत ले ली। इस तरह श्री नायक ने ‘कहि देबे संदेस’ के मुहूर्त शॉट के तौर पर 14 नवंबर 1964 को पहला दृश्य हॉस्टल के एक कमरे में दो दोस्तों कान मोहन और कपिल कुमार के बीच की बातचीत वाला शूट किया। इसके बाद यूनिट पलारी पहुंची। यहां फिल्म की शूटिंग शुरू तो हुई लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत थी कच्ची फिल्म की। शूटिंग के लिए तब ब्लैक एंड व्हाइट कच्ची फिल्म ब्रिटेन से समुद्री मार्ग से आती थी। भारत-पाक युद्ध के चलते देश में आपातकाल के चलते कच्ची फिल्म के लिए लगभग राशनिंग की स्थिति थी। ऐसे में मनु नायक के सामने चुनौती थी कि जितनी फिल्म मिल सकती है उससे कम से कम रि-टेक में शूटिंग पूरी करें। इस चुनौती को उन्होंने पूरा भी किया। कुछ दृश्य रायपुर और भिलाई में भी शूट किए गए। इसकी चर्चा आगे करेंगे।
मोहम्मद रफी की आवाज में रिकार्ड हुआ पहला गीत

मनु नायक अपने सीमित बजट की वजह से गीतकार डॉ.एस.हनुमंत नायडू ‘राजदीप’ और संगीतकार मलय चक्रवर्ती पर यह राज जाहिर नहीं करना चाहते थे कि वह बड़े गायक-गायिका को नहीं ले सकेंगे। लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था। तब मलय चक्रवर्ती धुन तैयार करने के बाद पहला गीत रफी साहब की आवाज में ही रिकार्ड करने की तैयारी कर चुके थे और उनकी रफी साहब के सेक्रेट्री से इस बाबत बात भी हो चुकी थी। सेक्रेट्री रफी साहब की तयशुदा फीस से सिर्फ 500 रूपए कम करने राजी हुआ था। सीमित बजट के बावजूद अपनी धुन के पक्के मनु नायक ने हिम्मत नहीं हारी और मलय दा को लेकर सीधे फेमस स्टूडियो ताड़देव पहुंच गए। इसके आगे का हाल खुद मनु नायक की जबानी सुनिए – “वहां जैसे ही रफी साहब रिकार्डिंग पूरी कर बाहर निकले, मैनें उनके वक्त की कीमत जानते हुए एक सांस में सब कुछ कह दिया। मैनें अपने बजट का जिक्र करते हुए कह दिया कि मैं छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म बना रहा हूं, अगर आप मेरी फिल्म में गाएंगे तो यह क्षेत्रीय बोली-भाषा की फिल्मों को नई राह दिखाने वाला कदम साबित होगा। चूंकि रफी साहब मुझसे पूर्व परिचित थे, इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोले – कोई बात नहीं, तुम रिकार्डिंग की तारीख तय कर लो। और इस तरह रफी साहब की आवाज में पहला छत्तीसगढ़ी गीत -‘झमकत नदिया बहिनी लागे’ रिकार्ड हुआ। इसके अलावा रफी साहब ने मेरी फिल्म में दूसरा गीत ‘तोर पैरी के झनन-झनन’ को भी अपना स्वर दिया। इन दोनों गीतों की रिकार्डिंग के साथ खास बात यह रही कि रफी साहब ने किसी तरह का कोई एडवांस नहीं लिया और रिकार्डिंग के बाद मैनें जो थोड़ी सी रकम का चेक उन्हें दिया, उसे उन्होंने मुस्कुराते हुए रख लिया। मेरी इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर ने भी गाने गाए लेकिन जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत करते हुए इन दूसरे सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी। इस तरह रफी साहब की दरियादिली के चलते मैं पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म में इन बड़े और महान गायकों से गीत गवा पाया।”
प्रीमियर रायपुर के बजाए दुर्ग में
आउटडोर शूटिंग के बाद मुंबई में सुआ गीत सहित कुछ अन्य दृश्यों की इनडोर शूटिंग हुई। पोस्ट प्रोडक्शन के बाद अंतत: 14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। फिल्म का प्रीमियर होना था रायपुर के मनोहर टॉकीज में, लेकिन कतिपय विवाद (इसका खुलासा बाद में) के चलते टॉकीज के प्रोप्राइटर शारदा चरण तिवारी ने अनुबंध के बावजूद दो दिन पहले ही फिल्म के प्रदर्शन से मनाही कर दी। यह अलग बात है कि दुर्ग में यह फिल्म बिना किसी विवाद के चली, फिर इसे भाटापारा में रिलीज किया गया और सारे विवादों के निपटारे के बाद जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल (आज की राज टॉकीज) में प्रदर्शित हुई।

नायिकाओं के सेक्रेट्री से प्रोडक्शन कंट्रोलर तक का सफर
अब आज चलते-चलते थोड़ी सी बात मनु नायक के कैरियर को लेकर। लगातार विवादों के चलते मनु नायक का कैरियर भी प्रभावित हुआ। हालांकि इसके बावजूद उन्होंने अगली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘पठौनी’ की घोषणा कर दी। लेकिन ‘कहि देबे संदेस’ का कर्ज छूटते-छूटते और विभिन्न कारणों से ‘पठौनी’ शुरू नही नहीं हो पाई। इस बीच मुंबई में टिके रहने और परिवार चलाने श्री नायक ‘जो काम मिला सो किया’ की स्थिति में आ गए। तब भी कई मॉडल हीरोइन बनने का ख्वाब लिए मुंबई पहुंच रहीं थीं, जिन्हें बतौर सेक्रेट्री श्री नायक ने मंजिल दिलाने की कोशिश की लेकिन मॉडल और उनके सेक्रेट्री दोनों को नाकामी हासिल हुई। तभी नई तारिका रेहाना (सुल्ताना) का पदार्पण हुआ। श्री नायक ने रेहाना की सेक्रेट्रीशिप कर ली। इस दौरान ‘दस्तक’ और ‘चेतना’ की सफलता ने रेहाना के कैरियर को नई ऊंचाईयां दे दी। इसी बीच संयोगवश श्री नायक को तब की सुपर स्टार तनूजा का सेक्रेट्री बनने का मौका मिला। इस बार भी तनूजा और मनु नायक दोनों एक दूसरे के लिए ‘लकी’ साबित हुए। बाद में इन्हीं संबंधों के चलते तनूजा ने अपनी बेटी काजोल को लांच करने पहली फिल्म ‘बेखुदी’ के निर्देशन का दायित्व भी श्री नायक को सौंपा था, हालांकि परिस्थितिवश फिल्म श्री नायक के हाथों से निकल गई, जिसकी अलग कहानी है। खैर, तनूजा की सेक्रेट्रीशिप के दौरान श्री नायक ने प्रोडक्शन कंट्रोलर के तौर पर अपने कैरियर की नए ढंग से शुरूआत की। पहली फिल्म डायरेक्टर मुकुल दत्त की ‘आज की राधा’ थी। रेहाना सुल्ताना, महेंद्र संधू, रंजीत, डैनी डैंग्ज़ोंपा और पद्मा खन्ना जैसे सितारों से जड़ी यह फिल्म कतिपय कारणों से रिलीज नहीं हो पाई। बाद में ‘जीते हैं शान से’ सहित बहुत सी फिल्में उन्होंने बतौर प्रोडक्शन कंट्रोलर उन्होंने की। नए दौर के छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मयारू-भौजी’ में श्री मनु नायक के नाम का इस्तेमाल किया गया लेकिन उसमें उनका कितना योगदान था यह श्री नायक और इस फिल्म की यूनिट से जुड़े प्रमुख लोग बेहतर बता सकते हैं। इन दिनों श्री नायक फिर एक बार सक्रिय हैं अपने एक महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर।
सुधि पाठक श्री मनु नायक से संपर्क कर सकते है -
पता : 4बी/2, फ्लैट-34, वर्सोवा व्यू को-आपरेटिव सोसायटी, 4 बंगला-अंधेरी, मुंबई-53
मोबाइल : 09870107222

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आगे पढ़िए  .  .  .  अगले गीत में


प्रस्तुत आलेख लिखा है श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी ने। भिलाई नगर निवासी, जाकिर जी पेशे से पत्रकार हैं। प्रथम श्रेणी से बीजेएमसी करने के पश्चात फरवरी 1997 में दैनिक भास्कर से पत्रकरिता की शुरुवात की। दैनिक जागरण, दैनिक हरिभूमि, दैनिक छत्तीसगढ़ में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं देने के बाद आजकल पुनः दैनिक भास्कर (भिलाई) में पत्रकार हैं। “रामेश्वरम राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता” का प्रथम सम्मान श्री मोहम्मद जाकिर हुसैन जी को झांसी में दिसंबर 2004 में वरिष्ठ पत्रकार श्री अच्युतानंद मिश्र के हाथों दिया गया।

मोहम्मद जाकिर हुसैन
(पत्रकार)
पता : क्वार्टर नं.6 बी, स्ट्रीट-20, सेक्टर-7, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल : 9425558442
ईमेल : mzhbhilai@yahoo.co.in

पेश है आज का गीत …



झमकत नदिया बहिनी लागे
परबत मोर मितान हवे रे भाई
परबत मोर मिता~न
हो हो हो~हो
में बेटा हंव ए धरती के
धरती~~ धरती मोर परान हवे रे भाई
धरती मो~र परान
झमकत नदिया बहिनी लागे
परबत मोर मितान हवे रे भाई
परबत मोर मिता~न
हो हो हो~हो
हरियर लुगरा~ पहिरे भुइंया
चंदा दिए कपार मा~
तरिया के दरपन मा मुख ला
देखत बइठे पार मा
सिंदूर बुके सांझ इहां के
सोनहा इहां बिहान हवे रे भाई
सोनहा इहां बिहा~न
झमकत नदिया बहिनी लागे
परबत मोर मितान हवे रे भाई
परबत मोर मिता~न
हो हो हो~हो
हो~~हो होहो हो~~हो
हो~~हो होहो हो~~हो
होओओओओओ हो
होओओओओओ हो
कान के खिनवा~ झम-झम झमके
पैरी झनके पांव मा~
घर-घर चूरी खन-खन खनके
सरग उतर के गांव मा~
हरियर-हरियर राहर डोले
पिंवरा-पिंवरा धान हवय रे भई
पिंवरा-पिंवरा धा~न
झमकत नदिया बहिनी लागे
परबत मोर मितान हवे रे भाई
परबत मोर मिता~न
हो हो हो~हो
में बेटा हंव ए धरती के
धरती~~ धरती मोर परान हवे रे भाई
धरती मोर परान
हो हो~~ होहो
हो हो~~ होहो
हो हो~~ होहो
झमकत नदिया~~~~~ बहिनी~~ लागे~~~
हो हो~ हो~हो
झमकत नदिया~~~~~आ~आ~आ बहिनी~~ लागे~~
हो हो~~ होहो
हो हो~~ होहो
हो हो~~ होहो

गीतकार : डॉ.हनुमंत नायडू ‘राजदीप’
संगीतकार : मलय चक्रवर्ती
स्वर : मोहम्मद रफी
फिल्म : कहि देबे संदेस
निर्माता-निर्देशक : मनु नायक
फिल्म रिलीज : 1965
संस्‍था : चित्र संसार

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बिहनिया के उगत सुरूज देवता … Bihaniya Ke Ugat Suruj Devta
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होरे होरे होरे … Hore Hore Hore
तरि नारी नाहना … Tari Nari Nahna
मोरे अंगना के सोन चिरईया नोनी … Mor Angna Ke Son Chiraeaya Noni

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