Saturday, October 20, 2012

एक गज़ल मे 500 शेर, तैयार हुआ मुनव्वर का 'मुहाजिरनामा'


अब तक एक गजल में इतने ज्यादा शेर लिखना रिकार्ड 


 उर्दू के जाने-माने शायर मुनव्वर राना ने एक नायाब रिकार्ड अपने नाम किया है। पहली बार उर्दू में सिर्फ एक गज़ल में पूरे 500 शेर लिखे गए हैं। खुद मुनव्वर राना का कहना है कि शायर या लेखक किसी रिकार्ड के लिए नहीं लिखता लेकिन दो साल पहले जब वह लिखने बैठे तो पता ही नहीं लगा कि कब 500 शेर हो गए। 'मुहाजिरनामा' नाम से उनकी यह किताब हिंदी और उर्दू में शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। 'छत्तीसगढ़Ó के पाठकों के लिए उन्होंने 'मुहाजिरनामा' लिखने की वजह बताते हुए ख़ास तौर पर अपनी इस अप्रकाशित किताब के चुनिंदा शेर भी पेश किए।
पिछले दिनों भिलाई आए मुनव्वर राना ने खास बातचीत में कहा कि मुहाजिर उसे कहते हैं जो अपनी जमीन से उठ कर कहीं और चले जाए। देश के विभाजन के दौरान हमारे अपने परिवार के ज्यादातर लोग हिजरत कर उस हिस्से मे चले गए जिसे आज पाकिस्तान कहते हैं। उस दौरान हमारे दादी-दादा बुआएं,चाचा सारे लोग चले गए और पूरा खानदान बिखर गया। हमारे वालिद (पिता) ने कहा कि हम यहीं रहेंगे।
यह तो थी आपबीती,जहां तक 'मुहाजिरनामा' लिखने की बात है तो मुहाजिरों के हालात पर नस्र (गद्य) में काफी लिखा गया। भीष्म साहनी से लेकर मंटो और मंटो से लेकर इंतजार हुसैन तक बहुत ने इसमें बहुत काम किया। इसकी बनिस्बत शायरी में अब तक कोई बड़ा काम नहीं हुआ। इक्का-दुक्का लोगों ने मुख्तलिफ शेर कहे हैं लेकिन इस एक ही उन्वान (शीर्षक) में 500 शेर कहने की कोशिश पहली बार हुई है। श्री राना का कहना है कि यह अपने आप में रिकार्ड है लेकिन वह गिनीज या लिम्का बुक में इसे दर्ज करवाने के लेकर ज़रा भी उत्साहित नहीं है। क्योंकि शायर किसी रिकार्ड के लिए नहीं लिखता।
'मुहाजिरनामा' की शुरूआत के बारे में श्री राना ने बताया कि 2008 में वह एक मुशायरे के सिलसिले में करांची गए थे। वहां एक साहब ने कहा कि हमारे हैदराबाद चलिए। हमनें कहा, तबियत साथ नहीं देती कि हम इतनी दूर 250 किमी जाएं और फिर लौटे। वो जिद करते रहे हम माफी मांगते रहे।  आखिर में एक बहुत कमजोर सी बात उन्होंने कह दी कि राना साहब, आज आपको जितना पेमेंट मिल रहा है उसका दुगुना-तिगुना हम देंगे लेकिन हम आपको हैदराबाद लेकर ही चलेंगे। मैनें कहा-आप ने बहुत कमजोर बात कह दी। आखिरकार हम आपके मेहमान हैं। तब उन्होंने माफी मांगी।
दरअसल होता यह है कि वहां जो पाकिस्तान में बैठे हैं वो ऐसा सोचते हैं कि वहां के भिखारी रहे होंगे जो यहां राजा बन गए। जबकि ऐसा नहीं है। सन् 1955-56 में जो बाग़ मेरे दादा 25 हजार में बेच कर गए थे उसे वापस खरीदने 2001 में मेरे वालिद ने 25 लाख के दाम लगा दिए तो हमें नहीं मिला उन्होंने कहा कि आपके पूर्वजों ने हमें दिया है और अमानतें बेचने के लिए नहीं होती। वहां करांची में जब मैं स्टेज पर बैठा था तो मैनें कुछ शेर कहे। मैंनें कहा मतला उन साजिद साहब की नजर है जिन्होंने ये बात मुझसे कही थी और मुहाजिरों की तरफ से पाकिस्तानी हुकूमत की नजर है। (मतला ये था कि)
मुहाजिर हैं हम मगर एक दुनिया छोड़ आएं हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आएं हैं।
इस तरह शुरूआत हुई 'मुहाजिरनामा' की। इसके बाद दो साल में कई मौके ऐसे आए जब शेर लिखते वक्त दर्द उभरता गया और तबियत बिगड़ती चली गई। पूरा 'मुहाजिरनामा' तैयार करने में मैनें जो तकलीफ महसूस की है उसका जिक्र नहीं कर सकता। इन दो सालों मे कम से कम 4 बार अस्पताल में दाखिल होना पड़ा। अब यह पूरा तैयार हो चुका है। जिसमें 500 शेर के अलावा 30 पेज का एक आलेख भी है। हिंदी और उर्दू में यह किताब मिज़गां और सहारा पब्लिशर लेकर आ रहे हैं।
श्री राना अपनी अप्रकाशित किताब 'मुहाजिरनामा' के चंद शेर पेश करते हुए उनके साथ कुछ ब्यौरा भी देते गए।
(पाकिस्तान में बैठा हुआ याद करता है हिंदुस्तान के अपने शहर को)
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हां ताल्लुक था
जो लक्ष्मी छोड़ आएं हैं दुर्गा छोड़ आएं हैं।
हिमालय से निकलती हर नदी आवाज देती थी,
मियां आओ वजू कर लो, ये जुमला छोड़ आएं हैं।
वजू करने को जब भी बैठते हैं ये याद आता है
कि हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आएं हैं।
(यहां एक शेर है जिसमे मुंतकिल के मायने है हस्तांतरण)
जमीनें मुंतकिल करते हुए एक कोरे कागज पे
 अंगूठा कब लगाया था अंगूठा छोड़ आए हैं।
(आज भी देखिए होता यह है कि कोई पुश्तैनी चीज अगर आप बेचते हैं तो पढ़े-लिखे होनें के बावजूद आपका अंगूठा पकड़ कर लगाया जाता है क्योंकि वो भागता है वहां पर से, कहता है कि नहीं ये गलत हो रहा है।)
(फिर आगे शेर है)
हमारी अहलिया (बीवी)तो आ गई,मां छूट गई आखिर
 कि हम पीतल उठा लाएं हैं सोना छोड़ आए हैं
महीनों तक तो अम्मी ख्वाब में भी बड़बड़ाती थी,
सूखाने के लिए हम छत पर पुदीना छोड़ आए हैं
 अभी तक बारिशों में भीगते ही याद आता है
कि छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं
(इसमें एक पूरी तस्वीर उभरती है कि)
गले मिलते हुई नदियां, गले मिलते हुए मजहब
इलाहाबाद में कैसा नजारा छोड़ आएं हैं
महल से दूर बरगद के तले निर्वाण की खातिर
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं
मोहर्रम में हमारा लखनऊ ईरान लगता था
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं
(एक और शेर है जिसमें रेयाया के मायने है जनता और हाकिम के मायने है शासक)
रेयाया थे तो फिर हाकिम का कहना क्यों नहीं माना
जो हाकिम थे तो क्यंू अपनी रेयाया छोड़ आएं हैं
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी
कि हम बिस्तर में एक हड्डी का ढांचा छोड़ आएं हैं
(लोगों ने कहा कि-भैया अभी मत जाओ,आज कल के मेहमान हैं चच्चा या अब्बा, कहां जाओगे। तो बोले कि अरे नहीं, हमें तो पाकिस्तान जाना है।   मालूम पड़ा कि उधर वो बैठे होंगे ट्रेन में और इधर उनके बुजुर्ग चल बसे)
 (जिन लोगों ने उस हिस्से से यहां हिजरत की उनका दर्द इस शेर में है)
यहां सब कुछ मयस्सर है, यहां हर चीज हासिल है
सभी कुछ है मगर पंजाब आधा छोड़ आए हैं
सड़क भी शेरशाही आ गई तक्सीम की जद में
तुझे हम कर के हिंदुस्तान छोटा छोड़ आए हैं
(जवान होने का जो अमल है उसका सबसे तहजीबी लफ्ज इस शेर में इस्तेमाल हुआ है)
भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी
वही झूले में हम जिसको हुमकता छोड़ आए हैं।

(भिलाई नगर, 8 अप्रैल 2010)

2 comments:

  1. मुनव्वर साहब की बात ही अलग है। उनके कहने का अंदाज ही अलग है। उन्हें पढ़ना एक बेचैनी भरा सकुन दे जाता है। शुक्रिया इसे यहां उपलब्ध करवाने के लिए.

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  2. https://www.youtube.com/watch?app=desktop&v=2XZFLpbojPo&feature=share

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