Monday, March 23, 2020

भगत सिंह को हमनें 'बम-पिस्तौल' वाली छवि तक सीमित

 कर दिया, उनका वैचारिक पक्ष आज भी आना बाकी


 राजगुरु,सुखदेव और भगत सिंह के शहीदी दिवस 23 मार्च  पर 

शहीदे आजम पर शोधकर्ता प्रो. चमनलाल से खास मुलाकात


मुहम्मद जाकिर हुसैन

शहीदे आजम भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों पर प्रमाणित शोध करने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर प्रोफेसर चमनलाल का मानना है कि आज भी दुनिया को भगत सिंह जैसे नौजवान के वैचारिक पहलुओं से रूबरू कराना जरूरी है। प्रो. चमनलाल मानते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह के क्रांतिकारी रूप से आम जनता का लगाव ज्यादा है, इसलिए समाज के सामने भगत सिंह के विचार ज्यादा नहीं आ पाए। भगत सिंह पर विगत 5 दशक से लगातार शोध कर रहे प्रो. चमनलाल हाल ही में छत्तीसगढ़ प्रवास पर थे।  इस दौरान उनके शोध और भगत सिंह को लेकर मौजूदा हालात पर लंबी बातचीत हुई। आज 23 मार्च को अमर शहीद राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह के शहीदी दिवस पर वही बातचीत प्रो. चमनलाल की जुबानी-


ऐसे प्रेरित हुआ शहीदे आजम पर शोध के लिए

दुर्ग सर्किट हाउस में प्रो चमनलाल से चर्चा 
बचपन में दूसरे बच्चों की तरह शहीद भगत सिंह की तस्वीरें और प्रतिमाएं देखते हुए दिमाग में एक बिम्ब सा बना, जो मुझे बेहद आकर्षित करता था। फिर 20 की उम्र में हिंद पाकेट बुक्स से प्रख्यात क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त लिखित 'भारत के क्रांतिकारी' नाम की किताब मंगवाई, जिसने काफी प्रभावित किया। 
यहां बताते चलूं कि मन्मथनाथ गुप्त काकोरी कांड में फांसी की सजा से इसलिए बचे क्योंकि तब उनकी उम्र 15 से कम थी। इस किताब में उनके अपने संस्मरण है जिनमें भगत सिंह का कई बार जिक्र आता है। इस किताब ने मेरे दिमाग को झकझोर दिया।
इसी दौरान पता चला कि गदर पार्टी के बड़े नेता बाबा गुरुमुख सिंह 'देशभक्ता यादां' नाम का पाक्षिक अखबार जालंधर से निकालते हैं। मैनें उस किताब के हिस्से चमनलाल प्रभाकर नाम से लिख कर वहां भेजना शुरू किया। इससे क्रांतिकारी आंदोलन में मेरी दिलचस्पी बढ़ती गई। साहित्य में रूचि के चलते जल्द ही मैं हिंदी साहित्य का प्राध्यापक हो गया।
क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा रहे प्रो. यशपाल पर पीएचडी करने मैं 1977 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) आया। उनके अपने संस्मरण में भी भगत सिंह का काफी जिक्र आता है।
 इस तरह लगाव बढ़ता गया और पीएचडी के बाद मैनें शहीद भगत सिंह के दस्तावेजों पर ध्यान देना शुरू किया। तब पता चला कि भगत सिंह के भांजे बृजमोहन सिंह ने पंजाबी में कुछ दस्तावेज हासिल किए थे। इसके बाद पहली बड़ी कोशिश के तौर पर मैनें कर्मेंदु शिशिर के साथ मिल कर शहीद भगत सिंह के दस्तावेजों का पहला संग्रह निकाला जो 1986 में राजकमल प्रकाशन से निकला और आज भी बेहद लोकप्रिय है।

शोध के बाद केंद्र सरकार तैयार हुई जन्मशताब्दी मनाने

20 साल तक जेएनयू में प्राध्यापक रहते हुए भी शहीद भगत सिंह पर फोकस करते हुए हमारा शोध कार्य चलता रहा। इसके चलते 2004 में पहली बार भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज प्रकाशित किए। इन सारे शोध का नतीजा यह हुआ कि शहीदे आजम की जन्मशताब्दी 2007 में औपचारिक रूप से मनाने केंद्र सरकार तैयार हुई और प्रकाशन विभाग ने भी उन पर किताबें निकाली।

भगत सिंह के विचारों पर भी होनी चाहिए चर्चा

शहीदे आजम के व्यक्तित्व को लेकर सभी बातें करते हैं। उनका क्रांतिकारी स्वरूप हम सब को भाता है। इसलिए समाज में उनके साथ बम-पिस्तौल को ही जोड़ कर देखा जाता है और उनके लेखन पर चर्चा कम होती है। जबकि देखिए, बेहद कम उम्र में शहीदे आजम ने बेहद महत्वपूर्ण लेखन किया है।
 उनके लिखे कई लेख और पत्र आज तक मिल रहे हैं। इसलिए भगत सिंह की शौर्य गाथाएं तो अपनी जगह है लेकिन उनका लेखन महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. अम्बेडकर और पेरियार के स्तर का है।

शोधपीठ 13 साल से खाली, अब जाकर स्थापित हुआ अभिलेखागार

भगत सिंह के क्रांतिकारी पक्ष के साथ-साथ उनके वैचारिक-बौद्धिक पक्ष को सामने लाने हमने केंद्र सरकार से 2007 शताब्दी वर्ष में एक चेयर (शोधपीठ) की मांग की थी। केंद्र ने मांग मान भी ली और इसे जेएनयू में स्थापित भी कर दिया लेकिन उसकी विडंबना ये है कि आज 13 साल होने को आए और अब तक इस चेयर पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है। 
वहां सिर्फ एक पट्टिका लगी हुई है। हम लोगों ने सिर्फ चेयर ही नहीं बल्कि इसके साथ भगत सिंह अभिलेखागार (आर्काईव) की मांग भी की थी, जहां देश के 1857 से 1947 तक के सभी क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेज व फोटोग्राफ सहित अन्य सामग्री होनी चाहिए।
 हमारा प्रस्ताव केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जेएनयू के नाम से मंजूर किया था। हालांकि वहां पहल नहीं हो पाई। इस बीच 23 मार्च 2019 को दिल्ली सरकार ने हमारा प्रस्ताव स्वीकार किया और अब वहां अभिलेखागार स्थापित हो रहा है।

भगत सिंह को दक्षिणपंथ के साथ जोडऩा सरासर बेइमानी

हाल के कुछ सालों में यह चलन ज्यादा बढ़ गया है, जिसमें शहीदे आजम भगत सिंह को दक्षिणपंथ के साथ जोड़ा जाता है। अंग्रेजों से माफी मांग कर छूटने वाले और अंग्रेजों की पेंशन लेने वाले दक्षिणपंथी नेता सावरकर के साथ उनका नाम जोड़ा जा रहा है। पिछले बरस अपने इन्हीं षडय़ंत्रों के चलते इन लोगों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी मेें भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के साथ सावरकर की मूर्ति लगा दी थी और विवाद होने के बाद उसे हटाया था।
हकीकत यह है कि जब भगत सिंह को जब फांसी हुई तो देश के हर बड़े नेता ने इस पर विरोध जताया। महात्मा गांधी बोले, अंग्रेज सरकार से अपील की, डॉ. अंबेडकर ने संपादकीय लिखा और नेहरू-पटेल ने भी बोला। लेकिन दूसरी तरफ दक्षिणपंथ के किसी एक नेता ने अपनी जुबान नहीं खोली। 
अगर सावरकर या किसी ने एक लफ्ज भी लिखा हो तो मुझे दिखा दें। महात्मा गांधी-जवाहर लाल नेहरू से लेकर तमाम नेताओं ने जेल में जाकर कोशिश की कि भगत सिंह अपनी भूख हड़ताल तोड़ें। इसी भूख हड़ताल में जतिन दास शहीद भी हो गए थे। इस नाजुक वक्त में भी दक्षिणपंथ का एक भी नेता सक्रिय नहीं रहा। हालत तो यह थी कि तब किसी एक धर्म के नहीं बल्कि सभी धर्मों के कट्टरपंथियों ने उनकी भूख हड़ताल और फांसी पर चुप्पी साधे रखी थी।

भगत सिंह को मिथक से बाहर निकालने लगातार करना होगा संघर्ष

बीते 5 दशक से हमारा शोध निरंतर चल रहा है। आज भी हमें कहीं न कहीं से भगत सिंह के लेख मिल जाते हैं। 12 साल पहले हमारे पास भगत सिंह से जुड़े 100 दस्तावेज थे जो अब 130 हो चुके हैं और लगातार मिल रहे हैं। उनके लेखन पर केंद्रित नया संस्करण हाल के दिल्ली पुस्तक मेले में 12 साल बाद चार खंडों में जारी हुआ है। हमारी कोशिश है विभिन्न भाषाओं में हम भगत सिंह का लेखन प्रकाशित करें।
 इन्हीं कोशिशों में हिंदी, उर्दू और मराठी संस्करण निकला। हिंदी भी निकला। अंग्रेजी में हार्पर कालिंस ने अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकाला है। भगत सिंह पर वैचारिक लेखन पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी में जारी है। हमारी कोशिश है कि उनके लेखन की व्याख्या करते हुए विचारों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए।
 वहीं गदर पार्टी पर भी फोकस करें। इन सबकी आज जरूरत इसलिए है, क्योंकि आज बौद्धिक जगत में सबसे बड़ी चुनौती 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' में फैलाया जा रहा झूठ है। भगत सिंह की वैचारिक मित्रता नेहरू, अंबेडकर और पेरियार के स्तर की थी। इसी विचारधारा पर नए भारत का निर्माण होना चाहिए।
 इसकी बनिस्बत भगत सिंह पर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले अधिकार जमाने के मकसद से उनके व्यक्तित्व और विचार को कुछ और रूप दे रहे हैं। इसे दुरूस्त करने वैचारिक स्तर पर हम सबको संघर्ष करना पड़ रहा है। कुल मिला कर हमारा आज का यही संघर्ष है।

गरिमा बरकरार रहनी चाहिए सुखदेव राज की

क्रन्तिकारी सुखदेव राज के प्रतिमा स्थल पर 
छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले का सौभाग्य है कि यहां अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की शहादत के समय साथ रहे क्रांतिकारी सुखदेव राज अंतिम दिनों में यहां रहे। दुर्ग के कुथरेल गांव में उनका स्मृति स्थल है। 
आजादी के बाद सुखदेव राज ने विनोबा भावे की प्रेरणा से समाजसेवा का फैसला करने की ठानी थी, जिसके बाद दुर्ग जिले में फैली कुष्ठ रोग की बीमारी के मरीजो की सेवा करने 1963 में वे दुर्ग आये। 
वे लगभग 10 वर्ष तक यहाँ कुथरेल में रहे और 1973 में उनका निधन हुआ था। मप्र शासन काल में मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और शहीद भगत सिंह के भाई सरदार कुलतार सिंह की मौजूदगी में क्रांतिकारी सुखदेव राज की प्रतिमा का अनावरण 8 दिसंबर 1976 को हुआ था। 
आज सुखदेव राज का स्मृति स्थल उपेक्षित सा पड़ा है। छत्तीसगढ़ सरकार से मेरा निवेदन है कि क्रांतिकारी सुखदेव राज की गरिमा बरकरार रखे। अफसोस है कि क्रांतिकारी सुखदेव राज की गरिमा के अनुरूप प्रतिमा स्थल को इस विकसित नहीं किया गया है।

Saturday, March 21, 2020


जब भिलाई स्टील प्लांट में स्काईलैब गिरने की
अफवाह से नेलसन परिवार ने खो दिया मां को



कोरोना वायरस को लेकर बनाए जा रहे दहशत के माहौल के बीच
नेलसन बंधु बोले-हमनें मां को खोया था, आप न फैलाएं अफवाहें


मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन

12 जुलाई 1979 की दुखद घडी और दूसरी फोटो में (बाएं से ) एरिक, एडवर्ड , पिता बेंजामिन, माँ एग्नेस, हेराल्ड और जेएम नेलसन

कोरोना संक्रमण को लेकर अफवाहों और दहशत के माहौल के बीच फिर एक बार बहुत से लोगों को 42 साल पुराना 'स्काईलैब' से दुनिया के खत्म होने वाला दिन याद आ गया है। प्रख्यात मूर्तिकार पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन और उनके छोटे भाई जॉन एरिक नेलसन आज भी अफवाहों और दहशत से भरा वह दिन नहीं भूलते जब इसके चलते उन्हें अपनी मां को खोना पड़ा था। नेलसन बंधु कहते हैं-आज कोरोना वायरस को लेकर भी माहौल कुछ इसी तरह का है और लोग अफवाहें व दहशत फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। नेलसन बंधुओं ने इस माहौल में संयम बरतने और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है।
जॉन मार्टिन नेलसन - जॉन एरिक नेलसन
उल्लेखनीय है कि आज जिस तरह कोरोना वायरस को लेकर आम जनता के बीच भय व अफवाह का माहौल गर्म है, इससे कुछ हद तक ज्यादा भय का माहौल 1979 में स्काईलैब गिरने की खबर पर था। तब तो दुनिया खत्म होने की आशंका के चलते लोगों ने खंदक खुदवाने से लेकर घरों में महीनों का राशन जमा करने तक जैसी कई हरकतें दहशत में की थीं। 
42 साल पुराने इस घटनाक्रम से जुड़ी कई यादें आज भी लोगों के जहन में जिंदा है। लेकिन सबसे दुखद अनुभव नेलसन बंधुओं का था। नेलसन द्वय बताते हैं कि तब पूरे भारत में स्काईलैब गिरने की दहशत थी। लोगों ने समझ लिया था कि अब दुनिया खत्म हो जाएगी। इस दौरान 12 जुलाई 1979 में जॉन मार्टिन नेलसन और जॉन एरिक नेलसन अपने नंदिनी स्थित घर से सुबह 7 बजे जनरल शिफ्ट के लिए भिलाई स्टील प्लांट रवाना हुए। एरिक बताते हैं कि-तब दो दिन से एक अफवाह जोर पकड़ रही थी कि स्काईलैब सीधे भिलाई स्टील प्लांट पर ही गिरेगा। इससे हमारी मां इलिशिबा एग्नेस मेरी नेलसन बेहद चिंतित थी। हम दोनों भाई जब सुबह घर से निकल रहे थे तब मां और ज्यादा चिंतित दिखी तो मैनें मजाक में मां से कहा-हम तो जा रहे हैं मां, अगर बीएसपी में स्काईलैब गिरा तो इसे आखिरी मुलाकात समझना।
इसके बाद हम दोनों भाई तो बस में बैठकर भिलाई आ गए। इधर अपने बेटों की चिंता में घुल रही मां ने खाना भी नहीं खाया और कब घर में उन्हें दिल का दौरा पड़ा किसी को पता नहीं चला। तब नंदिनी से भिलाई तक खबर करने शायद किसी को कुछ सूझा नहीं होगा, इसलिए हमें कोई खबर नहीं मिली। दोपहर की बस से जब हम लोग नंदिनी अपने घर लौटे तो मां के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थी।
 हमारे भाई जॉन एडवर्ड नेलसन, जॉन हेराल्ड नेलसन और परिवार के दूसरे लोग बस स्टैंड में मिल गए और पूरी बात बताई। तब हमारे पास अफ़सोस करने के अलावा कुछ नहीं बचा था। एरिक कहते हैं-अगर स्काईलैब को लेकर दहशत और अफवाह का माहौल नहीं रहता तो हम मां को नहीं खोते। इस दहशत के चलते उन्हें आज भी मां से किए उस मजाक का अफसोस है। इसलिए हमारी सभी से अपील है कि कोरोना वायरस को लेकर भय का माहौल न बनाएं। किसी तरह की अफवाह के झांसे में न आएं और साहस के साथ कोरोना का मुकाबला करें।

ऐसे लोगों के लिए ही बनाया है ईश्वर ने स्वर्ग: श्रीवास्तव 

नेलसन परिवार के करीबी और भिलाई स्टील प्लांट के कार्मिक विभाग के रिटायर अफसर नरेंद्र श्रीवास्तव बताते हैं-नेल्सन की माताजी भोली, सरल सहज, मेहनती और संवेदनशील थी। उसने अपना जीवन परिवार की परवरिश मे ही व्यतीत कर दिया था। घर के प्रत्येक व्यक्ति का  ख्याल रखती थी। खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती थी। शाम को प्राय: नानवेज बनता था। रिश्तों का निभाना बहुत अच्छी तरह से जानती थी। मेरे ऊपर उनका विशेष स्नेह था। ईश्वर ने  स्वर्ग  ऐसे लोगों के लिए ही बनाया है। शत शत नमन।

क्या थी स्काईलैब, जिससे फैली दुनिया के खत्म होने की अफवाह

स्काई लैब और उसके टुकड़े
यह एक नौ मंजिला ऊंचा और 78 टन वजनी प्रयोगशाला का ढांचा था, जिसे अमेरिका ने 1973 में अंतरिक्ष में छोड़ा था। चार साल तक स्काईलैब ने ठीक काम किया लेकिन 1977-78 के दौरान उठे सौर तूफान से इसे काफी नुकसान हुआ।
इसके सौर पैनल खराब हो गए और यह धीरे-धीरे अपनी कक्षा से फिसलकर पृथ्वी की ओर बढऩे लगी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आखिरकार स्काईलैब के धरती पर गिरने की घोषणा कर दी गई। इस घोषणा के साथ एक आशंका यह भी जताई गई थी कि इसका मलबा भारत पर गिर सकता है। जैसे-जैसे स्काईलैब के धरती पर गिरने की तारीख पास आती गई, लोगों में दहशत बढ़ती गई। इस बीच 1979 का वह दिन भी आ गया जब स्काईलैब को धरती के वायुमंडल में प्रवेश करना था।
 12 जुलाई को भारत में सभी राज्यों की पुलिस हाई अलर्ट पर रखी गई।  लेकिन जैसा कि नासा ने आखिरी समय में अनुमान लगाया था स्काईलैब का मलबा ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच हिंद महासागर में गिरा और इसके कुछ टुकड़े पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के एक कस्बे एस्पेरेंस पर भी गिरे लेकिन इनसे किसी तरह के जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। हालांकि अफवाहें इस कदर फैली हुई थीं कि भारत के हर गली-कस्बे मेें लोग इस दहशत में डूबे हुए थे कि स्काईलैब सीधे उन्हीं के क्षेत्र में गिरेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और सारी अफवाहों और दहशत पर विराम लगा।

स्काईलैब प्रकरण जिन दिनों जोरों पर था और जैसे-जैसे 12 जुलाई करीब आ रही थी लोगों में दहशत बढ़ते जा रही थी। तब भारत में तैनात विशेष दूत का कहना था कि अगर भारत और अमेरिका सिर्फ दो विकल्प हुए तो नासा निश्चित रूप से स्काईलैब को अमेरिकी जमीन पर ही गिराएगा। लेकिन भारतीयों के बीच इस बयान का उल्टा ही असर हुआ यहां तक कि देश के कई गावों में लोगों ने यह मान लिया कि बस कुछ दिन बाद दुनिया खत्म हो जाएगी। देश के कई हिस्सों में बुजुर्ग बताते हैं कि तब लोगों ने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर पैसा ऊलजुलूल तरीके से खर्च करना शुरू कर दिया था।

अमेरिका ने उस समय हर देश के अपने दूतावास में एक विशेष दूत की नियुक्ति सिर्फ इसलिए की थी ताकि वह संबंधित सरकार को स्काईलैब से जुड़ी जानकारियां मुहैया कराता रहे। भारत में यह जिम्मेदारी थॉमस रेबालोविच संभाल रहे थे। इसी समय उन्होंने भारतीय पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि यदि नासा स्काईलैब को नियंत्रित कर सके और उसके पास इसे गिराने के दो विकल्प हों, भारत और अमेरिका तो नासा निश्चित रूप से स्काईलैब को अमेरिकी जमीन पर ही गिराएगा।

इस घटना के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ऑस्ट्रेलिया सरकार से माफी मांगी थी। वहीं दूसरी तरफ कस्बे एस्पेरेंस के स्थानीय निकाय ने अमेरिका पर 400 डॉलर का जुर्माना लगाया था। हालांकि अमेरिकी सरकार ने यह कभी नहीं चुकाया। स्काईलैब के धरती पर गिरने के इतने सालों के बीच अंतरिक्ष विज्ञान ने खासी तरक्की की है लेकिन अभी-अभी वह इस काबिल नहीं हो पाया है कि संपर्क टूटने के बाद किसी उपग्रह या अंतरिक्ष स्टेशन के धरती पर गिरने का सही समय और स्थान बता सके।


याद रखना कोरोना एक दिन तुझे पड़ेगा रोना: नायकर 
रायपुर में मुलाक़ात 26 जनवरी 2020 
जाने-माने मिमिक्री कलाकार केके नायकर स्काईलैब से लेकर आज कोरोना के खौफ तक के दौर के गवाह है। तब स्काईलैब पर उनकी मिमिक्री बेहद लोकप्रिय हुई थी। नायकर 26 जनवरी 2020 को रायपुर आए थे। 27 जनवरी को उनका सफल शो रायपुर के शहीद स्मारक भवन में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मौजूदगी में हुआ। उस मुलाक़ात के बाद  आज कोरोना खौफ को देखते हुए नायकर ने जबलपुर से यह टिप्पणी भेजी है।
नायकर कहते हैं- उस समय स्काईलैब से आदमी डरा मगर,आजा़द था उससे निपटने के लिये अपने अपने विचारों से स्वतंत्र था और भीड़ भी जमा कर तरीकों का आदान प्रदान भी कर रहा धा। मगर ये कोरोना पिद्दी का शोरबा न जाने किस उस्ताद के अखाड़े का पठ्ठा है जो भीड़ को भी ललकार रहा है।
अगर दवा के बस में आ गया तब तो ठीक वर्ना किसी विरोधी पार्टी ने रोकडा़ देकर अपनी ओर मिला लिया तो बहुमत की कहानी और उसकी कल्पना ही कुछ और ही होगी। मगर यह विद्रोही और साहसी भी है। इससे बड़ा डान किसे समझूं जिसने अपने दम पर बिना आवाज किए बिना आवाज दिए। रुतबा तो देखो,जिसके पास डराने का हथियार बस खाँसी,सरदर्द,नाक बहना और दम घुटना और पसन्द दो पैर वाले। न रंग से मतलब है न रूप से न जात पात से बस मोहब्बत सबसे ज्यादा सीनियर सिटीजऩ से। बड़ा विचित्र है। सुना है उम्र बहुत थोड़ी सी है और हौसले बुलंद है। जिसकी हुंकार से आज संसार के बड़े बड़े देश-महानगर घुटने टेक चुके हैं। मगर वो सिर्फ जान का दुश्मन है।
भगवान ने अगर तुझे बनाया है तो याद रखना कोरोना एक दिन तुझे पड़ेगा रोना। भगवान का बनाया इस जमीन पर इंसान भी है तुझे यदि ऊपर वाले ने बनाया है दम निकालने के लिए तो आज भी इंसान कितना भी विरोधाभास आपस में कर ले मगर इंसान और इंसानियत की खातिर वो एक दूसरे के साथ है। हम सब्र रखना जानते हैं कोरोना तुम्हारे गले का फंदा कुछ दिनों में वो बना लेगा तब तुझे पड़ेगा रोना। यह दौर भारत भूलेगा नहीं सारे योद्धाओं को प्रणाम जो इस कोराना को हराने के लिए दिन रात एक किये हुऐ है और विशेष प्रणाम उन्हें जो इस लॉक डाउन के दौर में घर पर खा पीकर लुगाई के संघ कंधे से कंधा मिला कर प्याज काट रहे हैं। हांथ भी साबुन से धो रहे हैं और किचन में बर्तन भी धो रहे हैं।
ऐसे श्रम दान की कोरोना तुमने कल्पना भी नहीं की होगी। अब इस पृथ्वी से बिदा हो जाईऐ ,आप हमारे किसी काम के नहीं हैं। हम इंसान मिलनसार हैं। भले आपस में लड़ ले,एक दूसरे की बुराई भी कर लें मगर दुख सुख में भी ज्यादातर रिशते निभा भी लेते है। मगर तुमने जब से अपनी जात दिखाई है तब से दोस्त कम दुश्मन ही ज्यादा बनाऐ है। अब बिदा हो जाओ बहुत सम्मान आपको मिल चुका। हमारे यहां कहावत है कि घूरे के भी दिन फिरते है। मगर शायद इंसान तुम्हारी गिनती इस कहावत से नही करेगा। हमारा शेयर बाजार तुम्हारी वजह से औंधे मुंह गिरा था अब तुम भी औंधे मुंह गिरोगे। ये हमारी कल्पना अब कामना में बदल जाएगी फिर इस पृथ्वी पर नया सबेरा और सुख समृृद्धि का बसंत आएगा।

आज भी परेशान हैं स्काईलैब वाले 'सुगनामल' 

नायकर स्काईलैब और आज के कोरोना को याद करते हुए कहते हैं-हमने स्काईलैब का डर हंसी में बदला था। आज भी हमारे सुगनामल परेशान हैं। उनको आज भी नुकसान हो रहा है वो सबसे कह कह कर रो रहा है। हमने स्काईलैब के समय उसके आधा किलो के वजन के टुकड़े से बांट बनाया था। अब धंधा बदला तो फिर कोरोना ने परेशान कर दिया इसके चक्कर में हमारा पूरा माल फंस गया है, कोई दुकान में आता नहीं ।
मैने पूछा अब क्या बेच रहे हो ? सुगनामल बोल- कोरोना का चप्पल जूता। हमने कहा अपने को सम्हालो। कहने लगे डाक्टर को भी बताया डाक्टर हंसता है। चप्पल से बीमारी का क्या उसी समय एक लड़का भी डाक्टर से बोला हमको भी कोरोना का असर हुआ है। हम पूछा कैसे ? वो बोला तुम्हारी दुकान से जो लड़की निकली थी उसकी चप्पल कोरोना की थी। डाक्टर बोला आगे से दूरी बना के रखना।कम से कम एक मीटर। सुगनामल भी दुकान बन्द कर के आपनी किस्मत को रो रहा है। हे भगवान अब स्काईलैब के बाद ये क्या हो रहा है। 

धूमकेतु, प्लेग से लेकर बर्ड फ्लू तक दहशत कैसी कैसी


सूरत प्लेग 1994 और हेली पुच्छल तारा 1986
अब बात कोरोना वायरस और हाल के बरसों में फैली अलग-अलग दहशत की। 2001 में भारत में एंथ्रेक्स वायरस की जबरदस्त दहशत थी। राधिका नगर में रहने वाले अमीर अहमद के घर एक गुमनाम लिफाफा आया, जिसमें चॉक का पावडर था। दहशत के माहौल में सबने समझा एंथ्रेक्स का वायरस मिलाकर किसी ने भेज दिया है। पुलिस से लेकर मीडिया तक सब सक्रिय हुए। बड़ी-बड़ी हेडलाइन के साथ चॉक पावडर को फ्रंट पेज पर जगह मिली। हालांकि बाद में सब कुछ सामान्य हो गया। अब इस बात को 20 साल होने जा रहे हैं और हमारे सामने कोरोना की दहशत है। इस बार मामला हद से ज्यादा अतिसक्रियता वाला दिख रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है और अपने मुल्क से लेकर पूरी दुनिया में सब कुछ 'बंद-बंद' है। ऐसे में एहतियात बरतना बुरा नहीं है।

दुनिया के खत्म होने की दहशत की बात करें तो करीब 34 बरस पहले कुछ ऐसी ही दहशत हेली पुच्छल तारा (धूमकेतू) ने मचाई थी। तब 1986 में 9 फरवरी से 10 अप्रैल तक माहौल ऐसा था कि बहुतों ने सोच लिया था कि बस हेली पुच्छल तारा हमारी पृथ्वी से टकराएगा और दुनिया खत्म हो जाएगी। दरअसल हेली धूमकेतु सबसे प्रसिद्घ पुच्छल तारा है। इसका नाम प्रसिद्घ खगोलशास्त्री एडमंड हैली के नाम पर रखा गया है। न्यूटन के समकालीन हैली ने धूमकेतुओं के बारे में अध्ययन किया। उनका कहना था कि जो धूमकेतु सन् 1682, में दिखायी दिया था यह वही धूमकेतु है जो सन् 1531 व 1607 तथा संभवत: सन् 1465 में भी दिखायी पड़ा था। उन्होंने गणना द्वारा भविष्यवाणी की कि यह सन् 1758 के अन्त के समय पुन: दिखायी पड़ेगा। ऐसा हुआ भी कि यह पुच्छल तारा 1758 के बड़े दिन की रात्रि (क्रिसमस रात्रि) को दिखलायी दिया। तब से इसका नाम हैली का धूमकेतु पड़ गया। हैली की मृत्यु 14 जनवरी 1742 को हो गयी यानि उन्होंने अपनी भविष्यवाणी सच होते नहीं देखी। इसके बाद यह पुच्छल तारा नवम्बर 1835, अप्रैल 1910, और फरवरी 1986 में दिखायी पड़ा। यह पुन: 2061 में दिखायी पड़ेगा।

आज जैसी दहशत कोरोना वायरस को लेकर है, कुछ ऐसा माहौल पहले भी रहा है और वैज्ञानिक चेतना वाले लोग जानते हैं कि इस तरह का वायरस फैलना कोई नई बात नहीं है। हजारों साल से प्लेग से पूरी की पूरी आबादी का सफाया सुनते-पढ़ते आ रहे थे और यह भरोसा पाल बैठे थे कि आधुनिक युग में तो प्लेग आ ही नहीं सकता। लेकिन 1994 में गुजरात के सूरत शहर में प्लेग ने दस्तक दी और इसकी 'सूरत' बिगाड़ दी।

हाल के दौर में 2002 में पश्चिमी नील वायरस और 2003 में सार्स ने पूरी दुनिया की जान हलक में अटका दी थी। इसके बाद 2005 में बर्ड फ्लू की ऐसी दहशत मची कि लोगों का खानपान तक बदल गया और मुर्गी फार्म व्यवसायियों को 5 रूपए में भरपेट चिकन खिलाने की पार्टी तक रखनी पड़ी। 2009 में स्वाइन फ्लू की दहशत भी जबरदस्त तरीके से फैली क्योंकि इसमें मौत के आंकड़े बढ़ते गए। तब रुमाल में नीलगिरी का तेल, कपूर और लौंग का मिश्रण रख सूंघने का फैशन शुरू हुआ।

2012 में तो इन सारे वायरस को पीछे छोड़ते हुए एक शोशा छोड़ा गया कि माया सभ्यता की भविष्यवाणी के मुताबिक इस साल दुनिया खत्म हो जाएगी। इसे भुनाने में ऐसे कई चैनलों का कारोबार चल निकला, जो आज हिंदु-मुस्लिम कर अपना पेट पाल रहे हैं। 2014 में ईबोला, 2016 में झीका और 2018 में निपाह वायरस की दहशत हमारे यहां कम रही लेकिन दूसरे मुल्कों में मौतें भी हुई, इसलिए दहशत भी बढ़ती गई।
बहरहाल डर का अपना मनोविज्ञान है, इसे समझिए और मुस्कुराइए। फिलहाल सबकुछ बंद के हालात है। इस बीच केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले का 'गो कोरोना' राइम खूब चल रहा है। कोरोना को लेकर एहतियात बरतने में बुराई नहीं है। लिहाजा सतर्क रहें और दहशत का माहौल न बनाएं।

गेट पर 'उपचार' के बाद मस्जिद में पहुंचे नमाजी, माइक से अजान बंद



सेक्टर-6 जामा मस्जिद 20 मार्च 20 
शुक्रवार 20 मार्च 2020 को दोपहर की नमाज में मस्जिदों में खास एहतियात बरती गई। प्रशासनिक व्यवस्था के तहत धारा 144 लगा दिए जाने के चलते आम जुमा के बजाए इस बार नमाजी गिनती के पहुंचे। मस्जिद कमेटी ने अंदर आने से पहले गेट पर ही इन नमाजियों के लिए एल्कोहल रहित सैनिटाइजर की व्यवस्था कर रखी थी। जिसके लिए बाकायदा कमेटी की ंओर से लोगों को सैनिटाइजर लेकर खड़ा किया गया था।
ज्यादातर नमाजी मास्क पहन कर आए थे। मस्जिद के अंदर आने के नमाजियों को एहतियात के साथ नमाज पढऩे कहा गया। जामा मस्जिद सेक्टर-6 में अपनी तकरीर में इमाम हाफिज इकबाल अंजुम हैदर ने कोरोना वायरस को लेकर सावधानी बरतने की अपील करते हुए कहा कि मस्जिद में आने के बजाए घर पर ही नमाज अदा करें। वहीं उन्होंने बताया कि धारा-144 लगने के बाद मस्जिद से लाउड स्पीकर पर अजान बंद कर दी गई है। नमाज के बाद सभी से बिना इकठ्ठा हुए सीधे घर जाने की अपील की गई। जिसका नमाजियों ने पालन किया। वहीं मस्जिद के सामने लगने वाले फल व अन्य ठेलों को भी नमाज से पहले ही हटा दिया गया।


हुजूरे अकरम ने कहा था-एक ऐसा फितना आएगा, जिसमें जिसे

 जहां पनाह मिले, वो वहां पनाह हासिल कर ले तो रहेगा महफूज 

जमा मस्जिद सेक्टर-6 में नमाज़ियों के लिए लगई गई नोटिस 
कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए मस्जिदों में ताले लगा दिए गए हैं। इसी कड़ी में जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमाम हाफिज इकबाल अंजुम हैदर ने 24 मार्च 2020 को एक अपील जारी की है। जिसमें उन्होंने नबी करीम सललल्लाहो अलैहि वसल्लम से  जुड़ी हदीस (हदीस सही बुखारी शरीफ) में कोरोना वायरस से बचाव के इशारे का जिक्र करते हुए मस्जिदों के बजाए अपने घरों में नमाज कायम करने का कहा है। उन्होंने इस मुश्किल घड़ी में उन परिवारों की फिक्र करने की भी अपील की है,जो गरीबी, नादारी और फाकाकशी की जिंदगी गुजारते हैं और जिनके यहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल होता है।
हाफिज हैदर ने कहा कि-आज सभी लोग अपना पूरा वक्त घर पर गुजारें। हदीस सही बुखारी शरीफ  में इस बारे में कुछ इशारे भी है जिसमें हमारे प्यारे नबी सललल्लाहो अलैहि वस्सलम का फरमान है कि एक फितना, एक दौर ऐसा आएगा जब  ऐसी आजमाइश (बला) आएगी जिसे हम और आप आज के लिहाज से कोरोना वायरस भी कह सकते हैं कि जिसमें बैठने वाला खड़े रहने वाले से बेहतर होगा और खड़ा रहने वाला चलने वाले से ज्यादा फायदेमंद होगा और चलने वाला दौडऩे वाले से बेहतर हालात में होगा। जो कोई भी उस बला में जाएगा उसमें गिरफ्तार हो जाएगा।
 यह हदीस भी कोरोना वायरस की तरफ इशारा है, लिहाजा उसी हदीस के आखिर में प्यारे नबी सललल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कहा है कि जिसे जहां पनाह मिले, वो वहां पनाह हासिल कर ले। तो जो जहां है, वो फिर वहीं रह जाए तो हर इंसान उस बला से महफूज रहेगा।
हाफिज हैदर ने कहा कि शासन-प्रशासन ने कोरोना वायरस को देखते हुए जो कदम उठाए गए हैं उस पर हम सभी को 'लब्बैक' कहते हुए साथ देना है। क्योंकि यह कदम हमारी बेहतर के लिए उठाए गए हैं। धारा 144 का उल्लंघन करने से लोग बचें और बेहद जरूरी काम होने पर ही घर से निकले। इसलिए कोरोना वायरस से सबसे बेहतर लड़ाई का तरीका यह है कि हम समाजी दूरी बनाए रखें और अपने-अपने घरों में कैद रहें। इसके साथ ही हम समाज के ऐसे तबके का खयाल रखें जो मुफलिसी और फाकाकशी की जिंदगी गुजारते हैं। उन्होंने अपील की है कि जो साहिबे हैसियत हैं, मालदार हैं और जिनके अपने घरों में राशन पानी लाकर इंतजाम कर लिया है,वो अपने आसपास और गरीबों का खयाल रखें। दूसरों की भी मदद करें।
हाफिज हैदर ने कहा कि जो मुसीबत-बलाएं आती है, उन्हें दूर करने का जो तरीका है वो आज बताया ही जा रहा है। लेकिन मजहबे इस्लाम में इन बलाओं को दूर करने का एक तरीका यह भी है कि आप कसरत से जरूरतमंदों को खैरात करें, जरूरतमंद लोगों पर मुहब्बत और शफकत का हाथ फेरें।
 कोई गरीब हो, मुफलिस हो,नादार हों तो कोशिश करें कि उन घरों में भी राशन लाकर दे दें। जिस तरह से हमें कोरोना वायरस से डर है और मौत का खौफ है। लेकिन उस गरीब की भी सोचिए जिसे कोरोना वायरस का खौफ तो है साथ ही गरीबी व भूख का भी। गुजारिश है तमाम भिलाई के लोगों से कि वो इस दहशत, वहशत और खौफ के माहौल में अपने आसपास, पड़ोसियों और गरीबों का खास खयाल रखें। जो हुकूमत गाइडलाइन दे रही है, उस पर हम सख्ती के साथ अमल करें। आज हमारी हिफाजत घरों में महफूज होने से ही है।

जुमा की नमाज नहीं होगी आज से ,कब्रिस्तान में भी बरत रहे एहतियात

कब्रिस्तान के बाहर लगाई गई नोटिस 
कोरोना वायरस के प्रसार की आशंका को देखते हुए मुस्लिम समुदाय भी एहतियात बरतने की अपीलें जारी कर रहा है। 27 मार्च शुक्रवार से  दोपहर जुमा की नमाज लॉक डाउन की मियाद 14 अप्रैल तक किसी भी मस्जिद में नहीं होगी। इसके लिए बाकायदा आडियो-वीडियो संदेश सोशल मीडिया पर और प्रसार माध्यमों से जारी किया गया है।
इसी तरह कब्रिस्तान हैदरगंज कैम्प-2 में मैय्यत के दफन के दौरान अधिकतम 20 लोगों को अंदर आने की इजाजत होगी। इस आशय का निर्देश कब्रिस्तान इंतेजामिया कमेटी की ओर से गेट पर भी लगा दिया गया है। उल्लेखनीय है कि मस्जिदों में रोजाना की फर्ज नमाज बा-जमाअत पहले ही बंद कर दी गई है और लोगों से घरों में नमाज पढ़ने कहा गया है। वहीं माइक से अजान भी बंद कर दी गई है।
27 मार्च को जुमा की नमाज को देखते हुए गुरुवार को जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमामो खतीब हाफिज मुहम्मद इकबाल हैदर अशरफी ने अपील जारी की है। इसे आप यू ट्यूब लिंक पर क्लिक कर  भी देख सकते हैं।जिसमें उन्होंने बताया है कि इज्तेमाई तौर पर जुमा की नमाज कायम नहीं की जाएगी इसलिए सभी से अपने-अपने घरों में दोपहर के वक्त जुहर की नमाज अदा करने अपील की गई है। ऐसी ही अपील शहर की दूसरी मस्जिदों से भी जारी की गई है।
इसी तरह कब्रिस्तान इंतेजामिया कमेटी कैम्प-2 के सदर शमशीर कुरैशी ने जारी अपील में कहा है कि मुल्क व समाज के हित को देखते हुए कम से कम तादाद में मैयत दफन करने कब्रिस्तान पहुंचे। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण की आशंका और धारा-144 व लॉक डाउन के मद्देनजर कब्रिस्तान में एहतियात बरता जाए। प्रशासनिक निर्देश के मुताबिक शहर में मैयत होने पर कब्रिस्तान हैदरगंज में दफन करने सिर्फ 20 लोगों को आने की इजाजत होगी।
 इस संबंध में इंतेजामिया कमेटी की ओर से कब्रिस्तान के गेट पर नोटिस भी लगा दी गई है। मस्जिद हजरत बिलाल हुडको के मुतवल्ली/सदर शाहिद अहमद रज्जन ने भी जानकारी दी है कि 14 अप्रैल तक मस्जिद में लाउड स्पीकर से अजान नहीं दी जा रही है और फर्ज व जुमा की नमाज बाजमाअत नहीं होगी। उन्होंने कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए किए जा रहे सरकारी उपायों पर सहयोग की अपील की है।

Tuesday, March 17, 2020


'अयोध्या से अयोध्या तक' जारी है 'माननीय '

को संसद-राजभवन तक भेजने का सिलसिला 


मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन 


सुप्रीम कोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत किए जाने के फैसले के साथ ही चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इधर कुछ खोजी लोगों ने इस फैसले को जस्टिफाई करने जस्टिस रंगनाथ मिश्र और जस्टिस बहरूल इस्लाम का नाम आगे कर दिया। 
कल से जारी बहस के बीच बड़ी सफाई के साथ इस परंपरा की शुरूआत जहाँ से होती है, वो नाम छिपा लिया गया। अब इसे संयोग ही मानिये की स्वतंत्र भारत में अब तक की जानकारी के मुताबिक 'न्याय' देने वालों को प्रभावित करने का सिलसिला अयोध्या मामले से शुरू होता है और आज जस्टिस गोगोई का नाम भी अयोध्या मामले पर फैसले की वजह से ज़्यादा चर्चा में आया है
 वैसे जस्टिस गोगोई का नाम इस पंरपरा में आखिरी नहीं है। आप इंटरनेट पर ही खंगाले तो कई चौंकाने वाली जानकारी मिलेगी। जिस तरह से देश की स्वतंत्रता के बाद 'माननीयों' को संसद से लेकर राजभवन तक भेजा जाता रहा है, वह अपने आप में हैरान करने वाला है। इसकी शुरआत करने वाली भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ हो या इस पिच पर जम कर खेलने वाली कांग्रेस हो, सबने अपने-अपने हिसाब से 'माननीयों' के लिए सीढ़ी तय की है। कुल मिलाकर मामला दोनों पार्टियों के बीच बराबरी सा दिखता है। 


नायर से 'नायक ' बनने वाले जिला मजिस्ट्रेट 

न्याय जगत से जुड़े किसी व्यक्ति को संसद तक पहुंचाने की शुरूआत का श्रेय आज की भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती राजनीतिक पार्टी जनसंघ को जाता है।याद कीजिए फैजाबाद की 22-23 दिसंबर 1949 की दरमियानी रात,(सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में शामिल रिकॉर्ड के मुताबिक ) जब बाबरी मस्जिद के अंदर चोरी से रामलला की प्रतिमा रख दी गईं। इसके बाद जिस व्यक्ति की भूमिका निर्णायक साबित हुई वह थे फैजाबाद के तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट आईसीएस आफिसर कंदनगलतिल करुणाकरण नायर।
दस्तावेज बताते हैं कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दखल के बावजूद केके  नायर ने प्रतिमा निकलवाने से इनकार कर दिया था। इसके कुछ साल बाद 1952 में नायर ने सरकारी मुलाजमत छोड़ी और जनसंघ के हो लिए।
नायर का उपकार इतना ज्यादा था कि चौथे लोकसभा चुनाव को दौरान 1962 में जनसंघ ने न सिर्फ उन्हें बहराइच से लोकसभा का टिकट दिया बल्कि उनकी पत्नी शकुंतला नायर को कैसरगंज से उतारा और दोनों पति-पत्नी चुनाव जीत कर सांसद रहे। दस्तावेजों में यह भी मिल रहा है कि तब नायर दंपति के ड्राइवर को भी विधानसभा का टिकट देकर जनसंघ ने उपकृत किया था। नायर को दक्षिणपंथी हमेशा एक नायक के तौर पर  देखता है


सांसद रहे और जस्टिस भी 

नायर के बाद दूसरा नाम असम के प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व बहरूल इस्लाम का आता है। 1962 में राज्यसभा में कांग्रेस के सदस्य थे। उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के बीच में ही त्यागपत्र दे दिया। 
उन्हें 1972 में असम और नगालैंड उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। बाद में वह जुलाई 1979 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी बने। वह एक मार्च 1980 को सेवानिवृत्त हुए और इसके बाद 4 दिसंबर, 1980 को उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था लेकिन यहां भी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने जनवरी 1983 में त्यागपत्र दे दिया था। इसके 10 साल बाद 5 फरवरी 1993 को उनका इंतकाल हुआ।


 एक नाम जो विधायक, सांसद और न्यायमूर्ति तीनो रहा 

इधर-उधर होने वालों में तीसरा नाम न्यायमूर्ति गुमानमल लोढ़ा का हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय में 1978 में न्यायाधीश नियुक्त होने से पहले वह 1972 से 1977 तक जनसंघ से राजस्थान विधान सभा के सदस्य रह चुके थे। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त होने के बाद न्यायमूर्ति गुमानमल लोढ़ा फिर सक्रिय राजनीति में लौटे और भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर 1989 से लगातार तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे। 22 मार्च 2009 को उनका निधन हुआ।


न्यायिक जगत से संसद  तक  का सफर 

अब बात सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रहे जस्टिस रंगनाथ मिश्र की। 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में भड़के सिख विरोधी दंगों की घटनाओं की जांच के लिये 26 अप्रैल 1985 को तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। इस आयोग ने फरवरी 1987 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी।
वैसे जस्टिस रंगनाथ मिश्र का परिवार राजनीति और न्यायिक जगत दोनों में सक्रिय रहा है। उनके भाई भी सांसद-विधायक रहे है और फिलहाल भतीजे पिनाकी मिश्रा राजनीति में सक्रिय हैं तो दूसरे भतीजे दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए हैं। 25 सितंबर 1990 से 24 सितंबर 1991 तक देश के चीफ जस्टिस रहे जस्टिस रंगनाथ मिश्र को उनके रिटायरमेंट के 7 साल बाद कांग्रेस ने 1998 में राज्यसभा भेजा। जहां से वे 2004 में रिटायर हुए और 13 सितंबर 2012 को उनका निधन हुआ।

राजभवन पहुँचने वाले कुछ 'माननीय' 

न्याय जगत की हस्तियों को राजभवन भेजने की परंपरा 1997 से ज्यादा जोर पकड़ी है। जिसमें उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश रहीं न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी को उनके रिटायरमेंट के बाद 25 जनवरी 1997 को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था। इससे एक कदम आगे जाते हुए मौजूदा एनडीए सरकार ने देश के प्रधान न्यायाधीश पी सतशिवम को अप्रैल 2014 में सेवानिवृत्ति के बाद सितंबर-14 में केरल का राज्यपाल बनाया था। यह पहली बार हुआ था कि किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश को किसी राज्य का राज्यपाल बनाया गया।


एक न्यायधीश का मुख्यमंत्री बनने तक का सफर 

न्यायाधीश का दायित्व निभाने के बाद राजनीति में सक्रिय होने वाला फिलहाल एकमात्र नाम विजय बहुगुणा का है। पहले कांग्रेस में रहे अब भारतीय जनता पार्टी में है। विजय बहुगुणा पहले उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए और फिर वह बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने लेकिन अचानक ही उन्होंने 15 फरवरी 1995 को न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गये और 2007 से 2012 तक लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य बने और फिर 13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014 तक वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने। फिलहाल भाजपा में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।


अब कुछ बातें गोगोई की 

अब बात जस्टिस रंजन गोगोई की। सुप्रीम कोर्ट से 17 नवंबर 2019 को रिटायर हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया गया है केंद्र सरकार की ओर से सोमवार 16 मार्च 2020 को  देर शाम जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया हैसुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में रंजन गोगोई का कार्यकाल करीब साढ़े 13 महीने का रहा इस दौरान उन्होंनें कुल 47 फैसले सुनाए, जिनमें से कुछ बहुचर्चित फैसले भी शामिल हैं
18 नवंबर 1954 को जन्मे रंजन गोगोई ने साल 1978 में बतौर एडवोकेट अपने करियर की शुरुआत की थी रंजन गोगोई ने शुरुआत में गुवाहाटी हाईकोर्ट में वकालत की उनको संवैधानिक, टैक्सेशन और कंपनी मामलों का जानकार वकील माना जाता था इसके बाद उनको 28 फरवर 2001 को गुवाहाटी हाईकोर्ट का स्थायी न्यायमूर्ति नियुक्त किया गया। 9 सितंबर 2010 को उनका तबादला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया
इसके बाद, 12 फरवरी 2011 को उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया23 अप्रैल 2012 को उन्हें पदोन्नत करके सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया गया जब दीपक मिश्रा चीफ जस्टिस के पद से रिटायर हुए, तो उनकी जगह जस्टिस रंजन गोगोई को चीफ जस्टिस बनाया गया


सार्वजनिक प्रेस कांफ्रेंस से आये थे चर्चा में 

12 जनवरी 2018 को न्यायमूर्ति जे चेलेश्वर, एमबी लोकुर और कूरियन जोसेफ के साथ मिलकर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने भारत के उच्चतम न्यायालय के इतिहास में पहली बार, उच्चतम न्यायालय के न्याय वितरण प्रणाली में विफलता और मामलों के आवंटन के मामलें में एक प्रेस वार्ता आयोजित की थी। इस दौरान, चारो न्यायाधीशों ने पत्रकारों से कहा कि विशेष सीबीआई न्यायाधीश बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत के मामले को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा को आवंटित करने से प्रेरित होकर उन्होंने प्रेस वार्ता की है।लोया, एक विशेष सीबीआई न्यायाधीश थे, दिसंबर 2014 में रहस्यमय परिस्थितियों  उनकी मौत हुई थी। न्यायमूर्ति लोया 2004 के सोहराबुद्दीन शेख मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पुलिस अधिकारी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह का नाम सामने आया था। बाद में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया। न्यायमूर्ति चेलेश्वर 30 जून, 2018 को सेवानिवृत्त हुए, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को भारत के उच्चतम न्यायालय के दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में बने, उनके बाद जस्टिस एम बी लोकुर और कुरियन जोसेफ क्रमश: वरिष्ठता में रहे।

यौन उत्पीड़न का आरोप भी लगा था गोगोई पर 

रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न का भी आरोप लग चुका है। हालाँकि अब उन्हें इस मामले में क्लीन चिट मिल चुकी है और आरोप लगाने वाली महिला कर्मी व उसके साथ बर्खास्त उसके अन्य रिश्तेदारों की सुप्रीम कोर्ट में नौकरियां बहाल कर दी गयी हैद वायर की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने शीर्ष अदालत के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उनका यौन उत्पीड़न किया था 
35 वर्षीय यह महिला अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थीं उनका कहना है कि चीफ जस्टिस द्वारा उनके साथ किए ‘आपत्तिजनक व्यवहार’ का विरोध करने के बाद से ही उन्हें, उनके पति और परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है
महिला के कथित उत्पीड़न की यह घटना 11 अक्टूबर 2018 की है, जब वे सीजेआई के घर पर बने उनके दफ्तर में थीं महिला ने अपने हलफनामे में लिखा है कि इसके बाद उनका विभिन्न विभागों में तीन बार तबादला हुआ और दो महीने बाद दिसंबर 2018 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गयाइन्क्वायरी रिपोर्ट में इसके तीन कारण दिए गए, जिनमें से एक उनका एक शनिवार को बिना अनुमति के कैज़ुअल लीव लेना है
उनका कहना है कि यह शोषण उनकी बर्खास्तगी पर ही नहीं रुका, बल्कि उनके पूरे परिवार को इसका शिकार होना पड़ा. उन्होंने बताया कि उनके पति और पति का भाई, दोनों दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल हैं, को 28 दिसंबर 2018 को साल 2012 में हुए एक कॉलोनी के झगड़े के लिए दर्ज हुए मामले के चलते निलंबित कर दिया गया
इस बाद छह मई-19 को सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच समिति ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोप पर क्लीनचिट दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस इंदु मल्होत्रा इस जांच समिति की सदस्य थे


इन बहुचर्चित फैसलों के लिए याद किए जाते हैं गोगोई

1. अयोध्या मामला:- सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 सदस्यीय बेंच ने फैसला सुनाया सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया जिसमें शीर्ष कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन को रामलला विराजमान को देने और मुस्लिम पक्षकार (सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड) को अयोध्या में अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है
2. चीफ जस्टिस का ऑफिस पब्लिक अथॉरिटीः- जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने चीफ जस्टिस के ऑफिस को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में आने को लेकर फैसला सुनाया इसमें कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस का ऑफिस भी पब्लिक अथॉरिटी है लिहाजा चीफ जस्टिस के ऑफिस से आरटीआई के तहत जानकारी मांगी जा सकती है
3. सबरीमाला मामला:- जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की साथ ही मामले को सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय बड़ी बेंच को भेज दिया इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश जारी रहेगा जैसा कि कोर्ट 2018 में दिए अपने फैसले में कह चुका है
4. सरकारी विज्ञापन में नेताओं की तस्वीर पर पाबंदी: चीफ जस्टिस के तौर पर रंजन गोगोई और पी.सी. घोष की पीठ ने सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीर लगाने पर पाबंदी लगा दी थी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से सरकारी विज्ञापन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस, संबंधित विभाग के केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, संबंधित विभाग के मंत्री के अलावा किसी भी नेता की सरकारी विज्ञापन पर तस्वीर प्रकाशित करने पर पाबंदी है
5. अंग्रेजी और हिंदी समेत 7 भाषाओं में फैसला: - अंग्रेजी और हिंदी समेत सात भाषाओं में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को प्रकाशित करने का फैसला चीफ जस्टिस रहते हुए रंजन गोगोई ने ही लिया था इससे पहले तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले सिर्फ अंग्रेजी में ही प्रकाशित होते थे
इस बीच, जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किए जाने पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं. एआईएमआईएम मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट किया, 'क्या यह 'इनाम है'? लोगों को जजों की स्वतंत्रता में यकीन कैसे रहेगा? कई सवाल हैं.'
इस तरह हम  देखते हैं कि फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नायर से शुरू हुई कहानी आज रंजन गोगोई तक पहुंच चुकी है। यकीन मानिए यह पूर्ण विराम नहीं है। देश बहस करता रहे, पद, सत्ता और प्रभाव मिले तो कौन मना करता है। इसकी कीमत चाहे कुछ भी हो। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तो कह ही चुके हैं,  सब मिले हुए हैं जी..। तो यही होता आया है और यही होता रहेगा.?

चलते-चलते....रियाणा में हुआ कारनामा, प्रभावशाली लोगों के

 बच्चों और रिश्तेदारों को हाइकोर्ट में कानूनी अधिकारियों के पद

मानव अधिकार कार्यकर्ता रजत कल्सन ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है.... आम आदमी का मेहनती व होनहार उम्मीदवार बस देखता रह गया और 90 अधिकारियों की नियुक्ति में नेताओं, अधिकारियों और जजों के बच्चों और रिश्तेदारों को नियुक्ति दे दी गई । इस लिस्ट में स्व. सुषमा स्वराज के बेटी बांसुरी स्वराज, जुलाना से पूर्व विधायक परमिंद्र ढुल के बेटे रविंद्र ढुल, विधायक रामकुमार गौतम के बेटे रजत गौतम, पंचकूला में एडिशनल जज की पत्नी को भी कानून अधिकारी नियुक्त किया गया है।
वहीं चंडीगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष अरूण सूद की पत्नी अंबिका सूद को भी एडिशनल एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया है। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में सीनियर जज राजीव शर्मा की बेटी त्रिशांजली शर्मा को भी नियुक्त किया गया है। जेजेपी के प्रदेशाध्यक्ष निशान सिंह के बेटे की भी नियुक्ति हुई है।
हरियाणा के पूर्व डीजीपी यशपाल सिंघल की बेटी महिमा यशपाल सिंघल, हरियाणा के जींद से विधायक कृष्ण मिड्ढा का रिश्तेदार पंकज मिड्ढा, बीजेपी नेता बच्चन सिंह आर्य का बेटा रणबीर आर्य, रिटायर्ड जज टीपीएस मान के रिश्तेदार संदीप सिंह मान, रिटायर्ड जज एसके मित्तल के रिश्तेदार संजय मित्तल को नियुक्त किया गया है।
हरियाणा सरकार की तरफ से जारी 90 कानून अधिकारी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सरकार की पैरवी करेंगे। इनमें 22 एडिशनल एडवोकेट जनरल, 28 डिप्टी एडवोकेट जनरल और 28 असिस्टेंट एडवोकेट जनरल हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए आठ एडिशनल एडवोकेट जनरल की भी नियुक्ति की गई है। गरीब आदमी के होनहार बच्चे केवल मेहनत करते रहेंगे और नेताओं के बच्चे ,रिश्तेदार मलाई खाते रहेंगे।

Monday, March 16, 2020


'वोल्गा से शिवनाथ तक' एक  अभूतपूर्व दस्तावेज,पठनीय ग्रंथ

समीक्षक-डॉ. परदेशी राम वर्मा



मैं अतीत को जीत,जीत की पहली एक किरण हूँ, भारत के आते भविष्य का मैं मंगलाचरण हूँ।  
बदल रहा यह देश, विश्व को मैंने दिखा दिया है, मैं भिलाई का नगर कि मैंने जीना सिखा दिया है।


समीक्षक डॉ परदेशीराम वर्मा के साथ लेखक 
उपरोक्त पंक्तियां दिवंगत रमाशंकर तिवारी द्वारा रचित हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसम्पर्क विभाग में प्रमुख थे। भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरूआती दौर में कुछ ऐसे कर्मचारी और अधिकारी यहाँ आये जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी यश प्राप्त किया।
 दानेश्वर शर्मा,रविशंकर शुक्ल, रमाशंकर तिवारी,मोहन भारती और केशव पाण्डे जैसे कवि चढ़ती जवानी के दिनोंं में यहाँ आये और आगे चलकर वे अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज कहलाये। केशव पाण्डे जनवादी लेखक संघ दुर्ग जिला के अध्यक्ष बने। दानेश्वर शर्मा लिटररी क्लब के अध्यक्ष बने और मोहन भारतीय ने प्रतिष्ठित जैनी पत्रिका का एक दशक तक संपादन किया। प्रसिद्ध पत्रकार और सेंट थॉमस कालेज भिलाई के पत्रकारिता विभाग में शिक्षाविद् मुहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा लिखित पुस्तक 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में भिलाई नगर की वंदना का रमाशंकर तिवारी लिखित यह गीत महत्व के साथ प्रकाशित है।
जाकिर छत्तीसगढ़ के जिम्मेदार और प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं। नई पीढ़ी के जिन पत्रकारों ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया जाकिर उनमें से एक प्रमुख नाम है। वे अपने दायित्वों को निबाहते हुए पुस्तक लेखन भी करते हैं। अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'वोल्गा से शिवनाथ तक' उनकी तीसरी पुस्तक है। निश्चित रूप से शीर्षक राहुल सांकृत्यायन की किताब 'वोल्गा से गंगा' की तर्ज पर है लेकिन 'वोल्गा से शिवनाथ तक' इस शीर्षक में ही पूरी किताब की आंतरिक सामग्री के सम्बन्ध में लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है। पुस्तक लेखन में सदैव शीर्षक चयन का विशेष महत्व होता है। विशेषकर किसी विशेष संदर्भ को केन्द्र में रखकर लिखी गई किताब में तो शीर्षक का चयन पाठक को जुडऩे का आमंत्रण ही देती है।
वोल्गा रूस की नदी है और शिवनाथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर के पास बहने वाली नदी है। शिवनाथ नदी से जुड़ा है दुर्ग शहर जिसके पास ही भिलाई नाम से नया नगर आबाद हुआ। रूसी भाषा में दोस्ती को द्रुगे कहा जाता है। आश्चर्य तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ी में भी इसे दु्रग या दुरूग ही कहते हैं। छत्तीसगढ़ी और रूसी की दोस्ती भी दु्रगे शब्द में निहित है। भारत और रूस ने मिलकर भिलाई इस्पात संयंत्र को खड़ा किया। यह द्रुगे अर्थात दोस्ती की मिसाल भी है।
जवाहर लाल नेहरू ने इस तरह के नए उद्योग नगरी को भारत का नया तीर्थ कहा। विनोबा भावे ने भिलाई कारखाने को भलाई कारखाना कहा। जाकिर इससे पहले 'भिलाई एक मिसाल' और इस्पात नगरी के प्रसिद्ध रंगकर्मी सुब्रत बसु पर 'फौलादी रंगकर्मी सुब्रत बसु' पुस्तक भी लिख चुके हैं। जाकिर हिन्दी और उर्दू के अच्छे जानकार हैं। उनके पास आमफहम सर चढ़कर बोलने वाली भाषा है।
वे कल्याण महाविद्यालय के छात्र हैं। उन्होंने इतिहास में एमए किया है। वे बाकायदा पत्रकारिता में डिग्री के साथ सक्रिय हैं। अपनी अब तक की दो दशक की पत्रकारिता में उन्हें दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ और हरिभूमि में कार्य का अनुभव है।
'हरिभूमि' में ही लगातार पन्द्रह दिनों तक उनका कॉलम 'वोल्गा से शिवनाथ तक' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जिसमें प्रकाशित सभी साक्षात्कार रूसी दम्पत्तियों के थे जो भिलाई में ही बस गए हैं।
यह भी सुखद संयोग रहा कि 'हरिभूमि' ने 17 साल पहले इस कॉलम को ससम्मान प्रकाशित किया था और जब किताब की बारी आई तो 'हरिभूमि' के यशस्वी प्रबंध संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने इसकी भूमिका लिखकर जाकिर के लेखनकर्म को यथोचित सम्मान दिया।
पुस्तक में पहला लेख है 'ऐसे साकार हुआ भिलाई'। इस प्रथम लेख में जाकिर ने 1955 से लेकर 1961 तक के संघर्ष भरे दिनों का खाका खींचा है। इसमें 1932 में आये इस सिलसिले के महत्वपूर्ण प्रस्ताव का जिक्र भी है। किस तरह 1945 में आयरन एण्ड स्टील पैनल बना, भिलाई कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण कब से हुआ और पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार ने किस तरह 1952 में देश में इस्पात की खपत की दिशा में ठोस चिंतन किया। फिर सोवियत संघ से संबंध बने, धीरे-धीरे भिलाई के सामने आ रही अड़चने हटीं। 1953 में पंडित रविशंकर शुक्ल ने ऐलान कर दिया था कि वे भिलाई के पक्ष में केंद्र्र सरकार के सामने दृढ़ता से बात रखेंगे।
10 सितम्बर 1954 की बैठक में सोवियत संघ से सहयोग लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। 2 फरवरी 1955 को 10 लाख टन हाट मेटल सालाना उत्पादित करने हेतु संयंत्र लगाने हेतु सोवियत संघ और भारत के बीच समझौता हुआ। धीरे-धीरे लाल मिट्टी, डासा कन्हार वाली धरती जिसे धान का कटोरा कहा जाता है वहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र आकार लेने लगा।
रूस ठंडा मुल्क हैं और वहाँ से विशेषज्ञ भिलाई आये जो बरसात और गर्मी के मौसम में खूब अपना रंग दिखाता है। यहाँ खूब बारिश भी होती है और गर्मी भी अधिक पड़ती है। रूसी विशेषज्ञ ठंडे माहौल में रहने के आदी थे। उन्हें मौसम, भाषा, भोजन और अन्य परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। लेकिन एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित इस्पात सेनानियों ने यहाँ धीरे-धीरे उत्साह का वातावरण बना दिया।
'द्रुगे' अर्थात दोस्ती ने विशाल कारखाने को बहुत कम समय में खड़ा कर दिया। मैत्री बाग भिलाई नगर में इसी दोस्ती को महत्व देते हुए बनाया गया। जहाँ संस्थापकों की प्रतिमा भी लगाई गई है। 1 जुलाई 1956 को मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल भिलाई आए। उसके बाद देश के मूर्धन्य नेतागण लगातार भिलाई आये। जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे से लेकर नेहरू जी के साथ छुटपन में भिलाई आये राजीव गांधी बाद में प्रधानमंत्री के रूप में भी भिलाई आये।
शुरूआती दौर की हर परिस्थिति पर जाकिर ने इस पुस्तक में लेखन करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। शुरू में भोजन और निवास के लिए यहाँ सुविधा नहीं थी। ऐसे दौर में पुरोहित होटल ने यहाँ सबसे पहले इस दिशा में काम किया। सेक्टर-1 में और कैम्प-1 में पुरोहित होटल स्थापित कर सेवा का कीर्तिमान रचा गया। तब बड़े-बड़े ठेकेदार पुरोहित होटल (लॉज) में ही ठहरते थे। लक्ष्मीनिवास मित्तल जैसे स्टील किंग शुरूआती दिनों मेें अपने पिता के साथ यहीं ठहरे। बीके, बी.ई.सी, सिम्पलेक्स के रूप में बाद में फैक्ट्री लगाने वाले लोग तब ठेका लेने के लिए आते थे और पुरोहित लॉज में ही आसरा पाते थे।
धीरे-धीरे सेक्टर-1 बना फिर अन्य सेक्टर बने। भिलाई नगर का पहला सिनेमा चित्रमंदिर सिविक सेंटर में तैयार किया गया। नेहरू सांस्कृतिक सदन बना। मड़ोदा टैंक ने भी आकार लेना शुरू किया। नेहरू चिकित्सालय ने यहाँ अपार यश अर्जित किया। इसी कारखानें से जुड़ी हैं पद्म विभूषण तीजन बाई। जाकिर ने इन सबको अपनी किताब में यथोचित महत्व दिया है।
अलेक्सेई निकोलाई कोसिजिन सोवियत संघ के मंत्री परिषद के उपाध्यक्ष के हाथों 1961 में भारत रूस मैत्री के प्रतीक स्तम्भ (ओबेलिस्क) की आधार शिला रखी गई। इसी प्रतीक स्तम्भ में एक तरफ जवाहरलाल नेहरू की पंक्ति अंकित हैं कि-'भिलाई भारत के भविष्य का शुभ शगुन एवं प्रतीक हैं।' दूसरी तरफ तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री खुश्चेव की पंक्ति है कि-'भारत-रूस की मैत्री भिलाई इस्पात संयंत्र की तरह मजबूत हो।'
भिलाई इस्पात संयत्र की गतिविधियों एवं उपलब्धियों की ज्यादातर शानदार फोटोग्राफी हरीश जाधव जी द्वारा की गई है। जाकिर ने अपनी किताब में 'टाइम कैप्स्यूल' का भी जिक्र किया है, जो 25 दिसम्बर 1965 को ब्लास्ट फर्नेस-4 की नींव में डाला गया।
इस पुस्तक से गुजरते हुए मुझे एक शख्स के द्वारा रचित कीतिर्मानों को पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ। विजय सिंह पाराशर तत्कालीन सुपरिन्टेण्डेण्ट ब्लास्ट फर्नेस भिलाई इस्पात संयंत्र ने भी अपना अनुभव साझा किया है। वे नेहरू नगर में रहते हैं। पाराशर मेरी बहू के दादा जी हैं।
मैं उन्हें विभिन्न पारिवारिक समारोहों में उनकी अग्रगामी भूमिका के कारण ही जानता और सम्मान देता था। इस पुस्तक से यह जानकारी मिली कि भिलाई इस्पात संयंत्र में काबिल इंजीनियर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण सेवायें दी हैं। पुस्तक में 121वें पृष्ठ में उनके योगदान का विशेष जिक्र जाकिर ने किया है।
पुस्तक में जाकिर ने सभी प्रबंध निदेशक, रूसी प्रमुखों के साथ विशेषज्ञों को याद किया है। इस पुस्तक में जनरल मैनेजर जी. जगतपति के नाम प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पत्र को भी प्रकाशित किया गया है, जो एक विशेष पत्र है। यह पत्र बताता है कि देश के विकास के लिए चिंतित रहने वाले बड़े लोग किस तरह चौकन्ने होकर हर उपलब्धि का ध्यान रखकर उससे सम्बन्धित लोगों की हौसला अफजाई करते थे।
शिवराज जैन राजनांदगांव में जन्मे,पढ़े-लिखे पहले छत्तीसगढिय़ा इन्जीनियर थे जो बाद में प्रबंध निदेशक और फिर सेल के अध्यक्ष भी बने। चर्चित जनरल सुपरिन्टेण्डेंट कुलवंत सिंह नागी का भी इस पुस्तक में जिक्र है जिन्होंने एक विशेष अवसर पर शिवराज जैन तथा रशियन विशेषज्ञ मिखाइलोविच को पंजाब की परंपरागत पगड़ी पहनाकर सम्मान दिया था।
भारत और रूस के बीच राजनायिक सम्बन्धों के 70 वर्षीय इतिहास को महत्व देते हुए भिलाई से इंडिया-रशिया फ्रैंडशिप मोटर रैली 20 फरवरी 18 को निकाली गई। भिलाई में रूसी महिलाओं ने अपने लिए जीवन साथी चुना। उनके सुखद दाम्पत्य जीवन के ब्यौरे को भी बहुत आत्मीयता के साथ इस ग्रंथ में संग्रहित किया गया है।
रूस में नेहरू, लता और राजकपूर खूब प्रसिद्ध रहे हैं। जाकिर ने रूसी लोगोंं के साक्षात्कारों के माध्यम से इस सन्दर्भ में रोचक जानकारियाँ दी हैं। इस ग्रंथ में एक मार्मिक कहानी प्रदीप पुरतेज सिंह की है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में जन सम्पर्क विभाग में उपप्रमुख थे। उनका प्रेम रूसी महिला से था। उन्होंने रूसी महिला के माता-पिता को राजी करने का प्रयत्न भी किया लेकिन विकलांग पुरतेज सिंह को देखकर वे लोग राजी नहीं हुए। इस तरह तान्या त्सालगावा एव प्रदीप सिंह की प्रेमकथा का दुखद अंत हुआ। रूसी भाषा के जानकार दुभाषिए विष्णु प्रभाकर तोपखानेवाले का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। वे रूसी भाषा में प्रवीण थे। रूसियों ने उन्हें खूब सम्मान एवं अपनत्व दिया।
'वोल्गा से शिवनाथ तक' एक ऐसी किताब है जिसमें एक कारखाने के जन्म की कहानी है। उसका बचपन और उसकी जवानी के किस्से भी इस कृति में है। छत्तीसगढ़ प्रान्त की आंतरिक विशेषता, यहाँ के लोगों की सहजता, देश भर से आये श्रमिकों से जुड़े उनके प्रान्तोंं की तस्वीरें किताब के हर्फ-हर्फ में है। भिलाई नगर में विभिन्न प्रान्तों से आये समुदायों ने अपना भवन बनाया। पूरा देश यहाँ अपनी विशेषताओं के साथ मिल जाता है।
भिलाई इस्पात संयंत्र के हर अगुवा ने कुछ नया करने का प्रयास किया। छत्तीसगढ़ के उदार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तर प्रदेश, बिहार के छठ पर्व पर छुट्टी देकर छत्तीसगढ़ की उदारता का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है। विभिन्न प्रान्तों से भिलाई आये कर्मचारियों, व्यवसायियों तथा उनके बच्चों ने विभिन्न क्षेत्रों में कीर्तिमान रचकर सबको प्रेरित किया है।
यह पुस्तक संतुलित विचार और समग्र जानकारी, प्रमाणित आंकड़ों एवं ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं के आलेखन के कारण बेहद महत्वपूर्ण बन पड़ी है। कल्पना के बदले यथार्थ और सुनी सुनाई बातों के बदले प्रामाणिक इतिहास को आधार बनाकर लेखक जाकिर ने ऐसी किताब को आकार दिया है जो उसे भिलाई और देश से प्रेम करने वाले पाठक के लिए इसे बेहद उपयोगी किताब बनाती है। वोल्गा से शिवनाथ पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक हैं।

ग्रंथ - वोल्गा से शिवनाथ तकमूल्य - 500.00 रू.
प्रकाशक- सर्वप्रिय प्रकाशन कश्मीरी गेट चर्च रोड, नई दिल्ली
लेखक - मुहम्मद जाकिर हुसैनसमीक्षक- डॉ. परदेशी राम वर्मा
संपर्क- लेखक-9425558442 समीक्षक-9827993494

----------

Tuesday, March 3, 2020

जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के खिलाफ भिलाई के शीर्ष अफसर
 से नशे की हालत में बुलवा कर टेप भिजवाया गया था दिल्ली


रवि से पहले भी कई शीर्ष अफसर निकले चुके हैं इस कूचे से बेआबरू होकर


मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन 


एम रवि के साथ लेखक तालपुरी बंगले में 
भिलाई स्टील प्लांट के अब तक के 65 साल के इतिहास में हर 10-15  साल में ऐसे मौके आए हैं जब शीर्ष पद पर जवाबदारी संभालने वाले अफसर को किसी न किसी वजह से अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करते हुए विदा होना पड़ा है।
चुनौतीपूर्ण दायित्व को निभाते हुए अक्सर शीर्ष पद के अफसरों के सामने दिल्ली से टकराव या स्थानीय राजनीति सहित ऐसी कई नौबत आती रही है, जब अचानक तबादले का दंश झेलना पड़ा या फिर अचानक विदाई तय कर दी गई।
29 फरवरी 2020 को भी ऐसा ही वाकया हुआ, जब बीएसपी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एम  रवि को निलंबन की हालत में ही रिटायर होना पड़ा और गुमनामी ओढ़े यह शख्स चुपचाप अपने गृह नगर भोपाल के लिए रवाना हो गया। कोक ओवन हादसे के दूसरे दिन 10 अक्टूबर 2018 को तूफानी दौरे पर आए तत्कालीन इस्पात मंत्री चौधरी विरेंद्र सिंह ने मीडिया और जनसमूह के समक्ष उन्हें काम से अलग करने की घोषणा सार्वजनिक रूप से की थी।
 तब से रवि अपने तालपुरी के बंगला नंबर-1 में निर्वासित जीवन जी रहे थे। उनसे मिलने वाले कम हो गए थे और बहुत से लोगों से उन्होंने खुद ही मिलने से इनकार भी कर दिया था। हालांकि कुछ दिन पहले एक मौका ऐसा आया था कि मैनें उन्हें कॉल किया तो उन्होंने मिलने का समय दे दिया और फिर उनके बंगले में पहुंच कर मैनें उन्हें अपनी किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' भेंट की। कुछ अनौपचारिक चर्चा भी हुई, जिसे सार्वजनिक करने का कोई तुक नहीं है। बस, रवि और उनके परिवार की सुखद भविष्य की कामना कर सकते हैं।
वैसे शीर्ष पद पर बैठे लोगों के साथ यह विडम्बना कोई नई बात नहीं है। इस पद पर नियुक्ति जिन समीकरणों के तहत होती है, कई बार यही समीकरण भी अफसर पर भारी पड़ जाते हैं। ऐसे मेें हालात के शिकार बहुत से अफसरों पर गाज गिरती रही है। भिलाई स्टील प्लांट में पहले शीर्ष पदनाम जनरल मैनेजर (जीएम) हुआ करता था, बाद में मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) और अब यह पदनाम मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) है।
पदनाम  वक्त जरूरत के हिसाब से बदलता रहा है लेकिन गौर करने वाली बात यह है की यहां नेतृत्व करने वाले अफसरों में बहुतों को शान के साथ ससम्मान विदाई दी गई है लेकिन कुछ के साथ हालात ऐसे भी रहे कि उन्हें विदाई तक नसीब नहीं हुई। एम. रवि की गुमनाम विदाई के साथ ऐसे बहुत से किस्से फिर से लोगों के जहन में ताजा हो गए हैं।
आईए, ऐसे ही कुछ प्रसंग के बारे में जानते हैं। इनमें बेहद विवादास्पद हालात में भिलाई छोडऩे वाले कुछ शीर्ष दिवंगत नेतृत्व कर्ताओं के नाम उनके परिजनों की निजता का सम्मान करते हुए नहीं दिए गए हैं।

स्थानीयता के मुद्दे पर इस्तीफा दिया था मेहता ने 

दवे दम्पति के साथ भोपाल स्थित उनके निवास में (2006) 
भिलाई की स्थापना काल से ही शीर्ष नेतृत्वकर्ता कई वजहों से विवाद में घिरते रहे हैं। पहले जनरल मैनेजर श्रीनाथ मेहता (कार्यकाल 17-5-55 से 31-5-57) मध्यप्रदेश कैडर के आईसीएस आफिसर थे। तब देश भर से बड़ी संख्या में युवाओं को भिलाई में रोजगार दिया जा रहा था।
 इस दौरान मध्यप्रदेश के लोगों की रोजगार के मामले में उपेक्षा किए जाने और दिल्ली में बैठी आईएसएस लॉबी के चलते कुछ प्रांत विशेष के लोगों की सर्वाधिक भरती किए जाने के मुद्दे पर मेहता की दिल्ली से ठन गई थी। इस संबंध में मुझे मेहता की बेटी मालती दवे और दामाद केके दवे (मध्यप्रदेश के रिटायर डीजी पुलिस) ने विस्तार से बताया था।
दवे दम्पति अब इस दुनिया में नहीं है। केके दवे शुरुआती दौर में भिलाई के चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर भी रहे हैं। उन्होंने बताया था कि यह टकराव इतना बढ़ा था कि मेहता ने आनन-फानन में भिलाई छोड़ दिया था। हालात ऐसे बन गए थे कि नए जनरल मैनेजर क नियुक्ति नहीं हुई थी और मेहता के अचानक नाराज होकर चले जाने से तत्कालीन चीफ इंजीनियर के एन सुब्बारमन को जनरल मैनेजर का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।

इस्पात मंत्री से सीधे टकराव मोल ले लिया था सेन ने 

काजल भट्टाचार्य
तीसरे जनरल मैनेजर सुकू सेन (कार्यकाल 10-4-61 से 10-4-63 तक) अब तक के एकमात्र उदाहरण है,जिन्हें 60 वर्ष की आयु में भिलाई का दायित्व दिया गया था।
 सुकू सेन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और टाटा स्टील से उन्हें खास तौर पर भिलाई लाया गया था। सुकू सेन की विदाई भी अप्रत्याशित घटनाक्रम के चलते हुई थी, जिसमें दिल्ली की किसी बैठक में उन्होंने तत्कालीन इस्पात मंत्री से ठन गई थी।
 इस बैठक से सुकू सेन यह कह कर निकल गए थे कि आपको दूसरा सुकू सेन फिर नहीं मिलेगा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। हालांकि उन्हें औपचारिक रूप से भिलाई में भव्य विदाई दी गई थी और उनका बाद के दिनों में भिलाई से संपर्क भी बना हुआ था। उनके इस्तीफे की बात उनकी बड़ी बेटी काजल भट्टाचार्य ने मुझे एक इंटरव्यू के दौरान बताई थी।

                        किस्सा नशे में धुत्त जीएम से प्रधानमंत्री को अपशब्द बुलवाने का 

अब एक बेहद चर्चित किस्सा जान लीजिए। भिलाई में एक प्रमुख इंजीनियर का करियर बेहद तेज गति से बुलदिंयों पर पहुंचा और उन्हें उस समय के सर्वोच्च पद जनरल मैनेजर की जवाबदारी दी गई। उनके नेतृत्व में सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक मगडंप कांड हो गया, जिसकी सीबीआई जांच शुरू हुई।
इससे बौखलाए एक बड़े ठेकेदार और पेट्रोल पंप के मालिक ने नेहरू नगर के अपने बंगले पर उन्हें बुलाया और शराबनोशी के दौरान उनसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ अपशब्द बुलवा लिए। इस दौरान फ्लावर पॉट में छिपा कर रखे गए रिकार्डर से ठेकेदार ने सबकुछ रिकार्ड कर लिया और यह कैसेट तत्कालीन इस्पात मंत्री चंद्रजीत यादव तक भेज दिया गया।
इसके बाद जाहिर है जनरल मैनेजर को बेहद शर्मिंदगी उठानी पड़ी। हालात ऐसे बन गए थे कि इस्पात मंत्री चंद्रजीत यादव ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से साफ कह दिया था कि या तो उन्हें हटाइए या फिर मुझे। इसके बाद जीएम साहब को इस्तीफा देना पड़ा। इस प्रकरण के प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि तब जीएम साहब को लेकर इतनी ज्यादा नाराजगी थी कि इस्पात भवन के कमरे से जैसे ही बाहर निकले तो उनके नाम की प्लेट को नाराज लोगों ने तोड़ कर गिरा दिया था।

मित्रा ने इसलिए छोड़ दिया था भिलाई और एमडी का पद 

मित्रा  के साथ कोलकाता में  (2006 )
40 लाख टन परियोजना के दौरान दिल्ली की नाराजगी तब के मैनेजिंग डायरेक्टर निमाई कुमार मित्रा (कार्यकाल 11-8-81 से 08-10-84 तक)  को भी झेलनी पड़ी थी। मित्रा (अब दिवंगत) ने मुझे इस संबंध में इंटरव्यू में ऑन रिकार्ड सब कुछ बताया था।
 मित्रा के मुताबिक तब कोक ब्लेंडिंग सिस्टम से जुड़े ठेके को लेकर उन पर मंत्रालय से दबाव था कि ''ए'' पार्टी को ठेका दिया जाए लेकिन तकनीकी पक्ष जानने के बाद वो खुद ''बी'' पार्टी के पक्ष में थे। ऐसे में टकराव बढ़ा को मित्रा ने 51 साल की उम्र में अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी।
हालांकि तत्कालीन सांसद चंदूलाल चंद्राकर ने उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलवाने पहल की थी लेकिन अपमानित महसूस कर रहे मित्रा ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मंजूर नहीं किए जाने और सेल में उपाध्यक्ष पद का प्रस्ताव दिए जाने के बावजूद मैनेजिंग डायरेक्टर का पद के साथ साथ भिलाई भी  छोड़ दिया और कोलकाता चले गए थे ।
अपमानजनक परिस्थिति में विदा होने वालों में तीन दशक पहले के एक मैनेजिंग डायरेक्टर को आज भी लोग याद करते हैं। भिलाई से ही अपना करियर शुरू वाले ये सज्जन एमडी बनने के बाद 40 लाख टन परियोजना का निर्माण कार्य पूरा कराने और उत्पादन की गति बनाए रखने में सामंजस्य बिठाने के बजाए लोक कला संस्कृति के आयोजनों में ज्यादा व्यस्त हो गए।
 कई मामलों में ये सज्जन मैनेजिंग डायरेक्टर से ज्यादा जननेता साबित होते जा रहे थे। ऐसे में विभिन्न मुद्दों पर दिल्ली से उनका टकराव हुआ। यह टकराव इतना बढ़ा कि एक रोज अचानक शाम को उनका रांची तबादला करने आदेश जारी हो गया और अगली सुबह सेल के उपाध्यक्ष शिवराज जैन ने भिलाई आकर कार्यकारी एमडी का कार्यभार अगली व्यवस्था तक संभाल लिया। इन प्रकरणों के अलावा भी कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें दिल्ली की नाराजगी का कोपभाजन बनना पड़ा।

राजनीति का शिकार हो गए एम. रवि..?

बीएफ-8 से उत्पादन की शुरुआत 
भिलाई स्टील प्लांट में डेढ़ साल पहले 9 अक्टूबर 2018 को हुए कोक ओवन बैटरी विस्फोट कांड की जांच अंतत: पूरी नहीं हो पाई और निलंबित चल रहे सीईओ एम. रवि अपनी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी कर शनिवार 29 फरवरी 2020 को विदा भी हो गए।
 आम चर्चा यही है कि उन्हें 'उपर की राजनीति' के चलते 'बलि का बकरा' बना दिया गया। हालांकि रवि आखिर तक इस प्रयास में लगे थे कि जांच रिपोर्ट पर फैसला पहले हो जाए और निर्दोष साबित होकर कम से कम एक दिन ही सही वे सीईओ के पद से रिटायर हो जाएं लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सूत्र बताते हैं कि जांच की कार्रवाई पूरी हो चुकी है और अब गेंद इस्पात मंत्रालय के पाले में है।
अगर सामान्य परिस्थिति होती तो संभव था कि उन्हें भव्य समारोह में विदाई दी जाती। लेकिन अब हालात बेहद अलग है। रवि पिछले डेढ़ साल से अपने बंगले में अकेले थे। यहां तक कि इस बीच उनकी माता का निधन भी हुआ और उनके बेटे का विवाह भी हुआ लेकिन समय विपरीत होने की वजह से बीएसपी उच्च प्रबंधन के ही बहुत से प्रमुख लोगों ने उनके सुख-दुख में कन्नी काट ली थी।
 तमाम हालात को देखते हुए रवि ने भी लोगों से मिलना जुलना कम कर दिया था और अपना समय जांच कार्रवाई का सामना करने और किताबें पढऩे में बिता रहे थे। खबर है कि हफ्ते भर से उन्होंने अपना घरेलू सामान अपने गृह नगर भोपाल भिजवा दिया था और खुद भी परिवार सहित भोपाल रवाना होने की तैयारी कर ली है।
इस मामले में निलंबित चल रहे तत्कालीन जीएम सेफ्टी टी. पांड्याराजा भी रिटायर हो चुके हैं। वहीं तीसरे अफसर ईएमडी के डीजीएम प्रभारी नवीन कुमार अकेले ऐसे अफसर हैं, जो सेवारत हैं। अब दोनों रिटायर अफसरों को जांच पर कार्रवाई अनुशंसा का इंतजार रहेगा। इस्पात मंत्रालय इससे पहले नरेंद्र कोठारी की अध्यक्षता वाले जांच आयोग से मामले की जांच करवा चुका है और आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंप भी दी है।
 

जितने दोस्त-उतने दुश्मन भी बनाए रवि ने

एम. रवि ने अपनी सेवा की शुरूआत चूंकि भिलाई से ही की थी और सिर्फ 4 साल छोड़कर उन्होंने पूरी सेवा भिलाई में ही दी थी, इसलिए हर चेहरा उनका पहचाना हुआ था। ऐसे में सीईओ बनने के बाद अपनी कार्यशैली की वजह से रवि ने दोस्तों के साथ-साथ दुश्मन ज्यादा बना लिए थे। 
पद की गरिमा को एक तरफ रख जिस तरह रवि सहज होकर किसी से भी मिल रहे थे, उससे उच्च प्रबंधन में बैठे अफसरों को परेशानी हो रही थी। इसके अलावा रवि ने जिस अंदाज में एकतरफा ढंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भिलाई कार्यक्रम तय करवाया, उससे जाहिर तौर पर इस्पात मंत्रालय और सेल में बैठे लोगों का अहं प्रभावित होना ही था।
इसका नजारा लोगों ने प्रधानमंत्री के दौरे के समय लोगों ने लाइव भी देखा। ऐसे में उन्हें निपटाने का रास्ता देख रहे लोगों को मौके की तलाश थी और 9 अक्टूबर 2018 के हादसे ने आग में घी का काम किया। इसके बाद जो भी हुआ सभी के सामने है।
हालांकि रवि सार्वजनिक मंचों पर गाना गाने और अवांछित लोगों को इस्पात भवन में बुलाकर बैठक कराने जैसे कदमों की वजह से विवादों में आए तो कर्मियों के साथ शॉप फ्लोर पर उतर कर कंधे से कंधा मिलाकर काम करने जैसे कदमों के चलते लोगों की नजरों में चढ़े भी हुए थे। यह लोगों को रास नहीं आ रहा था, जिसकी परिणति निलंबित हालत में उनके रिटायरमेंट के साथ हुई। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम इस्पात मंत्रालय उनके मामले में जल्द फैसला लेगा।