Thursday, March 24, 2022

मेरा कश्मीरनामा-3

 

हमनें बड़े भाई को आतंकी हमले में खोया, हमारे घर पर घास 

उग आई और आर्मी बैठी है, इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी..? 

 

 हास्पिटल सेक्टर में निवासरत दूदा दंपति को उम्मीद कश्मीर में फिर लौटेंगे वो बहार वाले दिन


मुहम्मद जाकिर हुसैन 

वो 90 वाला खौफनाक दौर था, भिलाई स्टील प्लांट के उपमहाप्रबंधक (डीजीएम) रामकृष्ण दूदा उस रोज अपने घर में टेलीविजन देख रहे थे और उनकी पत्नी और भिलाई महिला महाविद्यालय सेक्टर-9 की प्राचार्य डॉ. संतोष कौल दूदा किचन में व्यस्त थी।

 किसी काम से श्रीमती दूदा बाहर निकली तो टीवी पर खबर आ रही थी कि सुप्रसिद्ध कश्मीरी साहित्यकार सर्वानंद कौल प्रेमी की उनके नौजवान बेटे वीरेंद्र कौल प्रेमी सहित आतंकवादियों ने बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी है। यह दर्दनाक वाकया 30 अप्रैल 1990 का है। 

बकौल श्रीमती दूदा-मेरे कदम वहीं रूक गए, कुछ समझ में नहीं आया कि प्रेमी जैसे साहित्यकार, जो कि सभी वर्गों में समानरूप से लोकप्रिय थे, भी दहशतगर्दी का शिकार हो गए। उन्होंने कई धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रंथों का कश्मीरी में अनुवाद किया था। उस रात हम लोग खाना नहीं खा सके। 

आतंकियों के शिकार सर्वानंद कौल 'प्रेमी' और मीर वाइज फारुख शाह

तब तो यह सिलसिला चल निकला था। हम लोग सर्वानंद प्रेमी के कत्ल से सदमे में थे कि कुछ ही दिन के बाद 21 मई 1990 को कश्मीर में सर्वमान्य धार्मिक नेता मीर वाइज फारुख शाह को भी आतंकियों ने अपनी गोली का निशाना बना दिया। 

आरके दूदा कहते हैं-उस दौर में हमनें अपने बड़े भाई को भी आतंकी हमले में खो दिया और प्रेमी जैसे साहित्यकार व मीर वाइज जैसे अमनपसंद लोगों के कत्ल ने हमें अपने भाई को खोने जैसा दुख दिया। दूदा दंपति आज भी हैरान है कि प्रेमी-मीर वाइज की तरह शांति प्रिय लोग ही क्यों लगातार दहशतगर्दी का शिकार हुए। 

अब चूंकि आगामी दिनों में (15 जुलाई 2001 को) पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ आगरा में शिखर वार्ता तय है इसलिए दूदा दंपत्ति भी उत्सुक है, लेकिन बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं है। 

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कश्मीर पर दोनों देशों को देनी होगी कुरबानी, तब हल होगा मसला

दूदा दंपति-साभार फेसबुक

आरके दूदा कहते हैं जिस तरह दूर क्षितिज पर हमें जमीन-आसमान मिलते दिखाई देते हैं लेकिन, वास्तव में जमीन-आसमान मिलते नहीं है वहीं हाल दोनों मुल्क के बीच का है। 

बीते 50-52 साल में दानों देशों के रिश्तों में जो उतार-चढ़ाव आए है वह सिर्फ एक शिखर वार्ता से तो हल होने वाला नही। हां, यह जरूर है कि कम से कम दोनों मुल्क आपसी तकरार भूल कर एक टेबल पर बात करने तैयार हुए हैं।

 इससे रिश्तों में सुधार जरूर आएगा और सीमा पर तनाव कम होगा। दूदा कहते हैं कि दूसरे मामलों में भले ही समझौते हो जाएं लेकिन, कश्मीर मसले पर बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि यह मसला बहुत पेचीदा हो गया है फिर बातचीत में निरंतरता रहनी चाहिए और दोनों देशों को कुछ ना कुछ कुर्बानी देनी पड़ेगी। इसके बाद ही हम किसी नतीजे की उम्मीद कर सकते हैं। 

 

सिर्फ हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मारा गया, आम कश्मीरी भटक रहा 

जनरल मुशर्रफ द्वारा हुर्रियत कांफ्रेंस को दावतनामा भेजने के मसले पर श्रीमती दूदा कहती हैं कि हम यह नहीं कहते कि आप हुर्रियत को बुलाएं बल्कि होना यह चाहिए कि कश्मीरी को बुलाएं जिसमें सभी वर्ग हो। आरके दूदा का कहना हैं दहशतगर्दी से कश्मीर में सिर्फ हिंदू ही पीडि़त नहीं था बल्कि वहां का मुसलमान भी मारा गया और घर छोडऩे विवश हुआ।

आज वहां भाड़े के आतंकवादियों के नाम से सूडान और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों से आए लोग अपने पैर जमा रहे हैं और कश्मीरी अपने ही मुल्क में भटक रहा है। श्रीनगर के करीब करणनगर की रहने वाली श्रीमती दूदा व जवाहर नगर के आरके दूदा को अपना कश्मीर भुलाए नहीं भूलता। 

 

साझी थी हमारी महाशिवरात्रि और ईद की खुशियां

कश्मीरी महिलाएं परंपरागत वेशभूषा में (आर्काइवल फोटो)

आरके दूदा कहते हैं-हम कश्मीरी लोग तो रूहानी तौर पर काफी ऊपर थे। हमारा रहन-सहन, मेल-जोल सब एक आदर्श था।

वह बताते है हमको तो कभी भी हिंदु-मुस्लिम में फर्क पता नहीं चला। बचपन से हम देखते आ रहे थे कि घर में हमारे मुस्लिम परिवार रहता था।

फिर महाशिवरात्रि, जो कि हमारा सबसे बड़ा त्योहार होता है, में हमें सबसे पहली मुबारकबाद मुहल्ले के मुस्लिम परिवारों से मिलती थी। मुसलमान ईद के दिन का तबर्रूक सबसे पहले अपने हिंदू भाई के घर देता था। 

बचपन में हम सुनते थे और यह इतिहास भी है कि आजादी की जंग हिंदु-मुसलमान दोनों ने इकट्ठे लड़ी थी। लेकिन अब जो हालात बिगड़ गए है उसके लिए हम किसे जिम्मेदार ठहराएं। 

 

14 अगस्त का दिन, जब हमारे परिवार पर कहर टूटा

दूदा कहते हैं हमने जो खोया ईश्वर करे किसी को ऐसा दिन देखने ना मिले। वह बताते है स्वतंत्रता दिवस के ठीक एक दिन पूर्व 14 अगस्त 1997 को आतंकवादी अपनी पूर्व घोषणा पर कायम थे। 

हमारे बड़े भाई कन्हैयालाल दूदा नियमित दिन की तरह सुबह उठे और श्रीनगर जाने बस पर सवार हुए। बस थोड़ी ही दूर गई थी कि आतंकवादियों ने बस यात्रियों को अपना निशाना बना लिया। 

दूदा अपने भाई की तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं इस तरह हम कश्मीरियों ने ना जाने कितने ही अपनों को खोया है। श्रीमती दूदा कहती है अब 13 बरस हो गए है, हम अपने घर नहीं जा पाए है। 

बीच में खबर मिली की करणनगर और जवाहर नगर के हमारे घरों में घास उग आई है और वहां मिलिट्री बैठी हुई है अब इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी। 

फिर भी हम इस उम्मीद पर कायम हैं कि एक न एक दिन घाटी में अमन लौटेगा। हम लोगों ने 80 के दौर तक जो दिन देखें हैं, हमारी आने वाली पीढ़ी भी वैसे ही बहार के दिन देख पाएगी। 

 

..तब आखिरी बार इकट्‌ठा हुआ था हमारा पूरा परिवार

कश्मीरी पंडित परिवार (आर्काइवल फोटो)

श्रीमती दूदा बताती हैं-हर साल मई-जून आता है तो हमको अपने घर की याद आती है। लेकिन फिर ध्यान आता है कि अब वहां हमारा कोई नहीं है।

जब हम 12 बरस पहले (1990 में) श्रीनगर गए थे तब आखिरी बार हमारा पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था। 

उसी दौरान कश्मीरी साहित्यकार सर्वानंद कौल प्रेमी से भी आखिरी मुलाकात हुई थी। अब तो वहां वीराना है। सिर्फ भाड़े के विदेशी आतंकवादी है बाकी वहां के रहवासी तो पलायन कर चुके हैं। 

श्रीमती दूदा कहती है अब जबकि भारत-पाक वार्ता होने वाली है तो पाकिस्तान के साथ विभिन्न मुद्दों पर बात करने के अलावा हमें आयात-निर्यात बढ़ाने और युद्धबंदियों की रिहाई पर भी बात खुल कर बात करनी चाहिए। 

आरके दूदा कहते है दहशतगर्दी से सभी तंग आ चुके हैं। अब जबकि अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में बदलाव आ चुका है। जर्मनी जैसा देश एक हो चुका है। भारत और पाकिस्तान जो कि एक ही संस्कृति के पोषक हैं, के लिए क्या जर्मनी से सबक लेने का वक्त नहीं आ गया है?

 

आज भी हम पंडितों को अपने कश्मीरी मुसलमानों पर पूरा भरोसा

परंपरागत कश्मीरी नृत्य

रामकृष्ण दूदा का कहना है कि कुछ अरसे से घाटी में हालात बदले हैं लेकिन, यह नाकाफी है। अभी भी सूरत ऐसी नहीं कि कश्मीरी पंडित वापस अपने घर लौट सकें। 

आज भी कश्मीरियों को सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं दे सकता। सार्क समिट एक अच्छी पहल है, बातचीत आगे भी होगी लेकिन सरकारों के अलावा इसमें आम कश्मीरी को भी जोडऩा होगा। 

जब शांति के लिए जनता एक साथ बैठेगी तो हल जरूर निकलेगा। इसके अलावा आज जरूरत है, घाटी में जो हथियारों, गोला बारूद का जखीरा है उसे नष्ट करके मेजर ऑपरेशन चलाया जाए। दूदा कहते हैं कि आज भी कश्मीरी पंडित वापस अपने घर लौटना चाहते हैं।

क्योंकि यह जमीनी हकीकत है कि आज भी कश्मीरी पंडित को अपने कश्मीरी मुसलमान पर ही ज्यादा भरोसा है ना कि दूसरे समुदाय पर। इसलिए हर कश्मीरी को कश्मीरियत का उसूल निभाना होगा और सरकारों को दृढ़ इच्छा शक्ति का सबूत देना होगा। 

 

रद्द किया जाए कश्मीर में बेची गई तमाम संपत्ति का करार

हरिभूमि 12 जुलाई 2001

दूदा का कहना हैकि अब मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार को सबसे पहले यह कदम उठाना चाहिए कि कश्मीरी पंडितों ने आतंक के दौर में जो संपत्ति बेच दी है उसका करार रद्द किया जाए और संपत्ति बेचने पर पाबंदी लगा दी जाए।

क्योंकि 15-16 साल में पंडितों और मुसलमानों ने जो भुगता है वह वापस तो नहीं आ सकता लेकिन इससे दोनों समुदायों को इकट्‌ठा रहने का मौका मिलेगा। 

वह कहते हैं कि अभी भी वहां की सरकार गंभीर नजर नहीं आती है। पिछले साल वनधामा नरसंहार में 45 लोग मारे गए, उनके एक-एक परिजनों को सरकारी नौकरी का वायदा किया गया था लेकिन साल बीतने के बाद भी सारे प्रभावित लोग बदहाल हैं।

आज तक किसी को नौकरी नहीं मिली इससे लोगों में असंतोष है। सरकार को लोगों का विश्वास जीतना होगा। जो शाख टूट चुकी है उस पर फिर से बहार लाने दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा। 

 

 हमारे परिवार के कई लोग आतंक की भेंट चढ़े, वहां तो

 मुसलमानों को भी नहीं बख्शा आतंकियों ने:निर्मला देवी 

उम्र के आखिरी पड़ाव में श्रीमती निर्मला देवी कौल की सिर्फ एक ख्वाहिश है। वह चाहती है किसी न किसी तरह कश्मीर में अमन कायम हो। 

श्रीमती संतोष कौल दूदा की मां निर्मला देवी आज के हालात के लिए किसी को दोष नहीं देना चाहती, फिर भी कहती है जो हुआ सो हुआ, ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे। दरअसल श्रीमती कौल ने आतंकवाद की आंधी झेली है। 

वह बताती हैं कि मैं सिर्फ एक अटैची में कपड़े रखकर अपनी बेटी के घर आई थी। पीछे घर में आतंकवादियों ने आग लगा दी। अब वहां तो राख भी नहीं बची होगी, क्योंकि बात 15 बरस पुरानी है। 

श्रीमती संतोष कौल बताती हैं कि उस हादसे के बाद परिवार के कई लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। इससे मम्मी बहुत ज्यादा अवसाद में आ गई थीं। 

निर्मला देवी कहती हैं- घाटी में कश्मीरी पंडितों को सुनियोजित तरीके से निकाला गया था, ताकि हमारी जमीन जायदाद पर कब्जा कर सकें, लेकिन कश्मीरी पंडितों के निकलने के बाद आतंकवादी वहां बच गए मसलमानों को भी जेहाद के नाम पर निशाना बना रहे हैं।

वह कहती हैं कि हालात अगर सामान्य होते नजर आए तो कश्मीरी पंडित वापस लौट सकते हैं। लेकिन इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार में दृढ़ इच्छा शक्ति का होना बेहद जरूरी है।

 जम्मू कश्मीर की पिछली सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए बगैर नाम लिए वह कहती हैं कि शायद 'वो' सबसे अयोग्य मुख्यमंत्री थे जिन्हें यह नहीं मालूम था कि उनके स्टेट में क्या हो रहा है।

खास बात:-दूदा दंपति से इंटरव्यू 13 जुलाई 2001 को और श्रीमती निर्मला देवी का इंटरव्यू 13 जनवरी 2004 को 'हरिभूमि' में प्रकाशित हुआ था। फिलहाल दूदा दंपति भिलाई छोड़ कर अन्यत्र बस गए हैं। 

मेरा कश्मीरनामा-1

मेरा कश्मीरनामा-2

 

Sunday, March 20, 2022

मेरा कश्मीरनामा-2

 

आंखों के सामने कश्मीरी भाई का खून देखा 

तो तीन दिन छिपते-छिपाते भिलाई लौट आया

 

श्रीनगर की हजरत बल दरगाह, शोपियां कस्बे में सेब की फसल औऱ वहां के मौजूदा हालात

मुहम्मद जाकिर हुसैन

 बात 1990 की है। आतंकवाद से झुलसते कश्मीर से ज्यादातर कश्मीरी पंडित पलायन कर रहे थे। भिलाई इस्पात संयंत्र में बतौर अफसर सेवा दे रहे पुष्कर नाथ सत्थु को जम्मू के करीब शोपयान कस्बे में अपने पैतृक निवास में रखे कुछ जरूरी कागजात लाने की याद आई। भिलाई में जम्मू पहुंच सत्थु शोपयान के लिए पैदल ही निकल पड़े।

इस दौरान सत्थु किसी तरह काजीगुंड पहुंचे थे कि ठीक उनके सामने एक कश्मीरी युवक आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गया। अपनी आंखों के सामने एक कश्मीरी मुस्लिम भाई का बहता खून देख सत्थु तुरंत उल्टे पांव जम्मू की ओर लौट पड़े। 

 

चरार-ए-शरीफ में मत्था टेकने और अपने सेबों

 के बाग फिर से देखने की ख्वाहिश रह गई अधूरी

सत्थु दंपति (2018) फेसबुक

भिलाई के सत्थु परिवार की दिली ख्वाहिश थी कि एक बार परिवार सहित अपने पुरखों के घर शोपियान जाएं। 
अपने सेब के बागों में बेफिक्र होकर घूमें और हजरत बल में शुक्राना अदा करने माथा टेक आएं। अफसोस, उनकी यह ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाई।

अपनी श्रृंखला कश्मीरनामा के लिए पुष्करनाथ सत्थु से बात करने उनके रुआबांधा वाले घर में मैं बैठा था तो यह सब बताते हुए वह बेहद परेशान लग रहे थे। फिर भी उन्होंने खुद को संभाला और तफसील से बात की। सत्थु बताने लगे कि तब किसी तरह छिपते-छिपाते तीन दिन के पैदल सफर के बाद मुझे सेना के एक ट्रक में पनाह मिली। 

तब कहीं वापस सही-सलामत भिलाई पहुंच पाया। कई बार तो लगता था कि जान बच पाएगी या नहीं। पैदल सफर जारी रहा। 

इस दौरान मैनें कई जगह कत्लो-गारत का खौफनाक मंजर देखा। हमारे सारे रिश्तेदार तो वहां से निकल चुके थे लेकिन वहां जो बाकी हमारे कश्मीरी भाई रह रहे थे मुझे उनके बारे में सोच कर दहशत होने लगी कि इनकी सलामती की गारंटी कौन लेगा? हमारे कश्मीर तो पंडित और मुसलमान सब इकट्‌ठे रहते थे फिर किसकी नजर लग गई समझ नहीं आता।

सत्थु कहते हैं- उस आखिरी सफर के बाद हमारे लिए कश्मीर ऐसा हो गया मानो हमने इसे सिर्फ किस्से कहानियों में ही जाना हो। यह बताते हुए पुष्करनाथ सत्थु की आंखें छलक गईं। वह कहने लगे-आज हमारी यादों में जिंदा है हमारा अपना शोपयान कस्बा।

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अब पुराने फोटोग्राफ्स देख नम हो जाती हैं आंखें 

हमारी बातों के बीच अपना पारिवारिक एलबम दिखाते हुए सत्थु कहने लगे-अभी ज्यादा दिन की बात नहीं है, जब हम लोग अपने पूरे परिवार के साथ शोपयान और पहलगाम गए थे। 1983 के इस सफर की गवाह फोटोग्राफ्स देख कर आज भी हमारे परिवार की आंखें नम हो जाती है। 

सत्थु कहते हैं-वहां तो हमारा सब कुछ लूट गया। यहां जो जमा पूंजी थी उसे हमने वहां मकान बनाने में लगा दी थी। वहां तो कुछ रहा नहीं अब भविष्य की चिंता सता रही है कि भिलाई स्टील प्लांट से रिटायरमेंट के बाद हम कहां जाएंगे। 

हमारी बातचीत में शामिल होते हुए सत्थु की पत्नी फुला सत्थु कहती हैं आज हम अपनी जड़ों से इतने कट गए हैं कि हमारे बच्चे अब नहीं जानते कि कश्मीरियत क्या है, हमारी परंपरा क्या है? 

एक अच्छी शुरूआत है बाजपेयी-मुशर्रफ में बातचीत

रूआबांधा निवासी सत्थु दंपत्ति का पुत्र संजय चेन्नई में साफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है व पुत्री सुप्रिया स्नातकोत्तर की छात्रा है। इस शिक्षित परिवार के मुखिया पुष्कर नाथ सत्थु कहते हैं जनरल मुशर्रफ भारत आ रहे हैं और बाजपेयी साहब से बातचीत भी करेंगे। 

शिखर वार्ता की तैयारियां चल रही हैं। यह बेहतर कदम है और इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। खुशी की बात है कि दोनों देश बातचीत के लिए राजी तो हैं।

लेकिन, बातचीत से किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर कोई सोचे कि कश्मीर समस्या एक बातचीत से हल हो जाएगी तो यह गलत है। हां, यह एक अच्छी शुरुआत है। अब कश्मीर की समस्या कोई आज की तो नहीं है। आधी सदी से ज्यादा का अरसा हमने इसका हल ढूंढने में ही बिता दिया।  


1951 के पहले का दर्जा दें तो कुछ बात बनें 

हरिभूमि भिलाई 11 जुलाई 2001

बातों के दौरान पुष्करनाथ सत्थु कहते हैं यह एक पेचीदा मामला है और किसी फार्मूले पर सभी पक्ष संतुष्ट हो जाएगें ऐसा नहीं लगता। मेरी राय में अगर कश्मीर को 1951 के पहले का दर्जा देने से समस्या हल हो सकती है तो सरकार को जरूर पहल करनी चाहिए। 

जहां तक हुर्रियत काफ्रेंस की मुशर्रफ से मुलाकात का सवाल है तो हमें यह समझना चाहिए हुर्रियत समूचे कश्मीरियों की प्रतिनिधि संस्था नहीं है। कश्मीर में और भी लोग हैं और भारत सरकार को सभी पक्षों को बराबर मानना चाहिए। 

सत्थु के पुत्र संजय का कहना है कि उन्हें बाजपेयी-मुशर्रफ वार्ता से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि सबसे पहले दोनों देशों को मानना होगा कि कश्मीर एक कोर इश्यु है तभी कुछ बात बनेगी। फिर अभी मुशर्रफ का अपने देश के कट्टरपंथियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। पाकिस्तान में वैसे भी हुक्मरान कोई भी हो वहां सेना का दखल सबसे अहम होता है। पुष्करनाथ कहते हैं-हमें उम्मीद तो है कि कुछ बेहतर हो सकता है। क्योंकि हम सभी चाहते हैं कश्मीर अपने घर लौटना। 1990 के बाद से हम सब इंतजार कर रहे हैं कि वह दिन कब आएगा, जब हम अपने घर लौटेंगे। 

 

हमारी पहचान बचाने 'पनुन कश्मीर' को मंजूरी दे सरकार

 जब तक भारत सरकार कश्मीर के आम लोगों को संतुष्ट नहीं रख सकती कश्मीर में शांति संभव नहीं। अपने बेटे की बातों से इत्तेफाक रखते हुए पुष्करनाथ सत्थु कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों का जो पनून कश्मीर आंदोलन है यदि उसके अनुसार भी भारत सरकार हम लोगों को एक निश्चित क्षेत्र पूर्ण संरक्षण के साथ दे तो शायद हमारी पहचान बच सकती है। 

वह कहते हैं-दिल्ली सरकार कश्मीरी पंडितों को आवास व अन्य सुविधा दिलाने प्राथमिकता देती है ऐसी ही पहल छत्तीसगढ़ सरकार को करनी चाहिए। 

सत्थु बताते हैं- 1960 में मेरा भिलाई आना हुआ और यह सोच कर यहीं रूक गया कि नौकरी के बीच छुट्टी में घर जाता रहूंगा फिर रिटायरमेंट करीब है पर शोपयान में अपना कोई रहा नहीं। 


स्विटजरलैंड से भी बेहतर था हमारा शोपियान

अहरबल की खुबसूरत वादी (सौजन्य-जिला प्रशासन शोपियान)

सत्थु कहते हैं-हमारा शोपियान तो स्विटजरलैंड से भी बेहतर था लेकिन, ना जाने किसकी नजर लग गई। 

पहले मैं जब भी छुट्टियों में जाता था तो घर से 20-25 मील दूर चरारे शरीफ दरगाह जरूर जाता था और भिलाई लौटते अपने घर के बाग के प्रसिद्ध सेब लाता था। 

फुला सत्थु कहती हैं-हम फिर अपने बागान के सेब खाना चाहते हैं और चरारे शरीफ में मत्था टेकना चाहते है। पुष्करनाथ सत्थु चुप हो गए, क्योंकि उनके पास कोई जवाब नहीं है। 

यह इंटरव्यू जुलाई 2001 का है। बाद के दिनों में 1-2 मरतबा उनसे मिलना हुआ। सोशल मीडिया पर भी सत्थु परिवार बेहद सक्रिय रहा है। अफसोस, पुष्करनाथ सत्थू अब हमारे बीच नहीं हैं। 2 जनवरी 2019 में उनका भिलाई में निधन हो गया।

मेरा कश्मीरनामा-1

मेरा कश्मीरनामा-3

Thursday, March 17, 2022

मेरा कश्मीरनामा-1

 

कश्मीर की वादियों में आखिरी सांस लेने

 की आरजू पूरी न हो सकी मल्ला दंपति की


मुहम्मद जाकिर हुसैन

मल्ला दंपत्ति के साथ लेखक सपत्नीक-जनवरी 2008 नई दिल्ली

बात 1983 की है, कश्मीर की लालडेल कालोनी (श्रीनगर) में एक मकान की नींव रखी गई। भिलाई इस्पात संयंत्र से सेवानिवृत्त हुए कार्मिक अधिकारी जानकी नाथ मल्ला की ख्वाहिश थी इस मकान को घर बनाने की, आबाद रखने की। 

इसलिए भूमिपूजन हुआ, दीवारें खड़ी हुई और तमाम तैयारियों के बाद मल्ला परिवार का सपनों का आशियाना बन गया।

दुर्ग के आदर्श नगर मेें मल्ला दंपति के मकान का नाम पम्पोश (कमल) था, लिहाजा अपने कश्मीर के घर का नाम भी पम्पोश रखना तय हुआ। छह बरस बाद भिलाई स्टील प्लांट से शिक्षा अधिकारी के तौर पर मनमोहिनी मल्ला भी रिटायर हो गईं। मल्ला दंपति की एक बेटी है। सोचा था वहीं बस जाएंगे और बेटी भी अपनी आगे की पढ़ाई वहीं कर लेगी। 

मल्ला दंपति छत्तीसगढ़ से सीधे कश्मीर जाने की उधेड़बुन में थे। कश्मीर और दिल्ली में रह रहे अपने रिश्तेदारों को भी इसकी खबर कर दी थी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। उन बातों को याद करते हुए मल्ला दंपति की आंखें भीग जाती हैं। 

मकान ही नहीं हमारे ख्वाबों पर भी गिरा रॉकेट लांचर

उन दिनों मल्ला परिवार भिलाई को अलविदा कहने की तैयारी में था। लेकिन अचानक खबर आई कि 1989 में यह घर आतंकवादियों के राकेट लांचर का निशाना बन गया और मल्ला परिवार चाह कर भी अपने घर ना जा पाया। मल्ला कहते हैं-वो राकेट लांचर सिर्फ हमारे मकान पर ही नहीं गिरा बल्कि उन ख्वाबों पर भी गिरा जो हमने बरसों से संजोए थे। 

कश्मीर में अपने कई परिजनों को खोने वाले जेएन मल्ला को आज भी अपना पैतृक घर और गलियां भूलती नहीं। छत्तीसगढ़ कश्मीरी पंडित समिति के अध्यक्ष जानकीनाथ मल्ला कहते है हम इस उम्मीद पर जी रहे हैं कि कश्मीरी पंडित एक ना एक दिन अपने घर जरूर लौटेंगे। 

बाजपेयी-मुशर्रफ शिखर वार्ता को लेकर उत्सुकता

आगामी 15 जुलाई 2001 को पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की भारत यात्रा और भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ होने वाली भारत-पाक शिखर वार्ता को लेकर मल्ला परिवार बेहद उत्सुक है। 

बीएसपी की रिटायर शिक्षा अधिकारी मनमोहिनी मल्ला कहती हैं-वार्ता सिर्फ बातचीत के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि कुछ हल भी निकलना चाहिए। वह कहती हैं, हमने जो खोया है वह कोई लौटा तो नहीं सकता फिर भी हमारे प्रधानमंत्री ने जो पहल की है उसका खैर मकदम है

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कश्मीर से दिल्ली और फिर भिलाई का सफर 

भिलाई के शुरूआती दौर में मल्ला परिवार सहित

74 वर्षीय जेएन मल्ला बीते दिनों को याद करते हुए कहते है-कश्मीर आज जिस बदहाली में है उसकी शुरुआत 1940 में हुई थी जब उस वक्त क्विट कश्मीर मूवमेंट के अंतर्गत वहां के जमीदारों से जमीन हड़पना शुरु हुई। 

इसका सबसे ज्यादा नुकसान वहां के कश्मीरी पंडितों को हुआ। बाद में जब बख्शी गुलाम मोहम्मद ने कश्मीर की सत्ता संभाली तो कश्मीरी पंडितों को नौकरियों व अन्य सेवाओं में अवसर कम मिलने लगे। इस उपेक्षा  से त्रस्त होकर बहुत से कश्मीरी पंडितों को देश के विभिन्न भागों में पहुंचकर रोजगार के अवसर तलाशने पड़े।

मैं स्कूल की पढ़ाई के बाद 1952 में नई दिल्ली पहुंचा था। जहां राष्ट्रपति भवन में मेरे निकट रिश्तेदार पदस्थ थे। उनके साथ वहीं रहने और पढऩे का मौका मिला। मेरी पढ़ाई पूरी हुई तो उस दौरान भिलाई परियोजना शुरू हुई थी। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कार्यालय में आईसीएस आफिसर निर्मलचंद्र श्रीवास्तव पदस्थ थे।

1957 में जब श्रीवास्तव को भिलाई परियोजना का महाप्रबंधक बना कर भेजा गया तो उन्होंने मुझे भी साथ ले लिया और इस तरह किस्मत मुझे भिलाई ले आई। फिर मैं यहीं का हो कर रह गया। अब पता नहीं कब अपने कश्मीर जा पाउंगा।

पाकिस्तान की नीयत पता चलती है ऐसे बयानों से 

मल्ला दम्पत्ति की आगामी मुशर्रफ-बाजपेयी की आगरा शिखर वार्ता को लेकर अपनी धारणा है। जेएन मल्ला कहते है दोनों देशों की होने वाली उच्च स्तरीय बातचीत से कश्मीर मसले का शांतिपूर्वक हल निकलना चाहिए।

वह कहते हैं वार्ता से पूर्व भारत में पाकिस्तान के हाई कमिश्नर ने एक बयान दिया है कि लाहौर और शिमला समझौते के साथ संयुक्त राष्ट्र के मसौदे को भी पाकिस्तान मानता है जिसमें जनमत संग्रह की बात थी। आज जनमत संग्रह अव्यवहारिक है फिर भी उच्चायुक्त यह मुद्दा उठा रहे है इससे ही पाकिस्तान की नीयत पता लग जाती है। ऐसे में वार्ता का कोई औचित्य नहीं रहेगा।

वास्तविक नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए

मल्ला दंपति

मल्ला कहते है, कश्मीर आज जिस स्थिति में है उसके लिए कौन जिम्मेदार हैं सभी जानते है, कभी इच्छा होती है कि भारत को बलपूर्वक पाक अधिकृत कश्मीर वापस ले लेना चाहिए। 

लेकिन, ऐसा हमारे हिंदुस्तानी खून में नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि हम वास्तविकता को स्वीकार करें और संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता से 1947 में बनाई गई वास्तविक नियंत्रण रेखा को भारत और पाकिस्तान के बीच की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा मानें।

मल्ला कहते हैं कश्मीर के साथ भारत सरकार को भी देश के अन्य राज्यों की तरह समान व्यवहार करना चाहिए और अगर इस वार्ता की आड़ में पाकिस्तान की मंशा फिर जेहाद के नारे को बुलंद करने की है तो भारत को अपनी संप्रभुता की खातिर पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाने तैयार रहना चाहिए। 

 

हम अपने घर नहीं जा सकते, इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी..?

श्रीमती मल्ला कहती है जिस कश्मीर में हमारा बचपन गुजरा, हम बड़े हुए वह हमारे दिल में बसा है कई बार ख्वाहिश होती है कि कश्मीर जाएं और उन्हीं वादियों में घूमें लेकिन, फिर हकीकत तो हकीकत है। आज हम अपने घर नहीं जा सकते इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकी है। 

वह कहती है आगरा शिखर वार्ता अगर हमें हमारे घर पहुंचा दे तो जनरल मुशर्रफ और अटल बिहारी वाजपेयी के हम जिंदगी भर ऋणी रहेंगे। मल्ला दम्पति की आंख छलक गई।  जेएन मल्ला कहने लगे-यहां भिलाई में हमनें अपने जिंदगी के बेहतर दिन गुजारे, अब एक ही आरजू है कि कश्मीर में अपने 'वतन' में आखिरी सांस लें। श्रीमती मल्ला अपनी छलकती आंखों के साथ उनकी बातों से इत्तेफाक रखते हुए हामी भर देती हैं।


रास्ता खुलेगा तो टूटे हुए दिल करीब आएंगे

हरिभूमि10-7-2001 भिलाई संस्करण

कश्मीर पर छिड़ी बातों पर कुछ और जोड़ते हुए जानकीनाथ मल्ला कहते हैं- कुछ दिनों से यह सूरत दिखाई दे रही है कि कश्मीर में फिर वहीं पुराने दिन लौटेंगे। 

खुदावंद तआला से हम यही दुआ करते हैं कि हमारे यहां वाजपेयी जी और वहां मुशर्रफ की पहल को कामयाबी बख्शे और मुफ्ती मोहम्मद सईद की चीफ मिनिस्टरशिप में जम्मू कश्मीर में अमन चैन लौटे।

मल्ला कहते हैं कि आज भी हर कश्मीरी, जिसमें पंडित और मुसलमान दोनों शामिल हैं, दिलोजान से चाहता है कि कश्मीर का मसला हल हो जाए, ताकि वहां खुशहाली और अमन लौटे और कट्टरवाद से मुक्ति मिल जाए। 

 अमन की बहाली से ही लौटेंगे हमारे पुराने दिन

वह कहते हैं कि अगर अमन की बहाली होती है तो वहीं पुराने दिन लौटेंगे और जिससे कश्मीर और कश्मीरियत दोनों जिंदा रह सकेंगे। पास बैठी श्रीमती मनमोहिनी मल्ला उनकी बातों से इत्तफाक रखते हुए कहती है, वाकई अब तो हालात ऐसे बनने चाहिए कि कश्मीरी पंडित वापस उन्ही वादियों में लौट सके। वह कहती है यदि मुफ्ती सरकार इसमें कामयाब हो जाती है तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

विस्थापित कश्मीरियों के संबंध में जेएन मल्ला कहते हैं कि अगर कट्टरवाद के खिलाफ सरकार दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दें तो विस्थापित कश्मीरी फिर वापस लौट सकते हैं। मल्ला कहते हैं कि पहले मुजफ्फराबाद और श्रीनगर वाला रास्ता खोलना चाहिए, ताकि लोग एक दूसरे से मिल सकें। 

अगर ऐसा हो गया तो श्रीनगर और मुजफ्फरबाद का रास्ता क्या खुलेगा समझो दिल से रास्ते खुल जाएंगे और हिंदुस्तान और पाकिस्तान जो दिल के दो दुकड़ों की तरह अलग हो गए हैं वह भी करीब आएंगे। हम तो उम्मीद करते हैं कि एक न एक दिन यह होगा और हम अपने वतन में लौट सकेंगे। 

 

कश्मीर में बसने की ख्वाहिश लिए दुनियाा से विदा हुए दोनों

 मल्ला दंपत्ति से मेरा रिश्ता माता-पिता और एक संतान की तरह था। अक्सर उनसे कश्मीर के मसले पर मेरी बात होती थी। उनके घर पर कई बार कश्मीरी दस्तरख्वान बिछा और कश्मीरी खानों का जायका उनके दुर्ग वाले घर में ही चखने का मौका मिला। खास तौर पर कश्मीरी गोश्त बिल्कुल अलहदा अंदाज में पका हुआ, जिसका जायका मैं आज तक भूल नहीं पाया। मल्ला साहब जब भी बात करने बैठते तो सबसे पहले नफीस उर्दू में ओम नम: शिवाय  (اوم نمہ شوائے) और श्री गणेशाय नम: (شری گنیشائے نما) लिखते, फिर जो कुछ भी बताते अपनी याददाश्त के लिए डायरी में उर्दू में नोट भी कर लिया करते थे।
कश्मीरी जबान में कमल को ''पम्पोश'' कहते हैं और मल्ला दंपति को कमल का फूल बेहद पसंद था। इसलिए उन्होंने न सिर्फ अपने दुर्ग आदर्श नगर वाले घर का नाम ''पम्पोश'' रखा था बल्कि कश्मीर जो घर बनाया था उसका नाम भी ''पम्पोश'' रखा था।
उन्हें बाजपेयी शासन काल में कमल वाली भारतीय जनता पार्टी से भी खूब उम्मीदें थी। मल्ला दंपति को लगता था कि जीते जी जरूर कश्मीर में अमन के साथ बस जाएंगे। हालांकि यह कभी हो न सका...। मल्ला दंपति से यह इंटरव्यू जुलाई 2001 में उनके दुर्ग वाले घर पम्पोश में अलग-अलग मुलाकातों के दौरान लिया था। 2006 में मल्ला परिवार दुर्ग से दिल्ली अपने कश्मीरी पंडित समुदाय के साथ रहने चले गया। हालांकि उनके मेरा जीवंत संपर्क बना रहा। 

वर्ष 2008 के शुरूआती दिनों में मेरा सपत्नीक नई दिल्ली जाना हुआ था, जहां मल्ला दंपत्ति से रूबरू आखिरी मुलाकात हुई थी। कुछ दिनों बाद 6 फरवरी 2008 को मनमोहिनी मल्ला इस दुनिया से रुखसत हो गईं। बाद के दिनों में जेएन मल्ला से संपर्क बना रहा। फोन पर बातें होती थीं। कभी दिल्ली जाने पर मुलाकात भी हो जाती थी।17 दिसंबर 2018 को जानकीनाथ मल्ला का निधन हुआ।

मेरा कश्मीरनामा-2

मेरा कश्मीरनामा-3


Saturday, March 5, 2022

रूस से ज्यादा यूक्रेन करीब रहा है भिलाई के 

 

भिलाई का निर्माण किया यूक्रेन के इंजीनियरों ने, 65 साल 

पहले बने बेहतर रिश्ते आज तनाव-अपमान के शिकार

 

यूक्रेन का अज्वस्ताल स्टील प्लांट, जहां भिलाई के ज्यादातर इंजीनियरों ने तकनीकी प्रशिक्षण लिया- तस्वीर 1960 की

मुहम्मद जाकिर हुसैन 

हम भिलाईवालों से कोई रूसी और यूक्रेनी नागरिकों के बीच फर्क करने कहे तो शायद ही कोई कर पाए। रंग-रूप वेशभूषा और बोली-भाषा भी एक सी होने की वजह से वैसे भी इनमें फर्क करना आसान नहीं। दरअसल, हम लोग भिलाई में जिन्हें 'रशियन' के नाम से जानते हैं उनमें से 90 फीसदी लोग यूक्रेन मूल के ही हैं। आज भी भिलाई में जो बचे हुए 'रशियन' परिवार हैं, उन सभी का रिश्ता यूक्रेन से जुड़ा है। 

यह अलग बात है कि इन सभी की भावनाएं आज भी रूस के साथ जुड़ी हुई है। इन दिनों जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव चल रहा है, ऐसे में भिलाई में रहने वाले ये सभी वयोवृद्ध भी चिंतित है यूक्रेन-रूस में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को लेकर। सभी की वीडियो कॉल पर बातें हो रही हैं और एक दूसरे।

 तनाव के इस माहौल में दूसरा पहलू वर्तमान में यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा लेने गए भारतीय स्टूडेंट की सुरक्षित 'घर वापसी' का है। वर्तमान में भारतीय स्टूडेंट के साथ जो सुलूक यूक्रेन में हो रहा है, उसके वीडियो विचलित कर देने वाले हैं। लेकिन हमेशा हालात ऐसे नहीं थे। 

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर तत्कालीन सोवियत संघ के साथ जो रिश्ता बना, उसके नतीजे में भिलाई स्टील प्लांट का जन्म हुआ। इसके साथ ही तत्कालीन रूसी इंजीनियर भिलाई पहुंचे कारखाना निर्माण के लिए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को सोवियत संघ भेजा गया स्टील टेक्नालॉजी में महारत हासिल करने। 

आईए, पहले एक नजर डालते हैं तत्कालीन परिस्थितियों पर। हमारे देश की आजादी के साथ ही नेहरू काल में जब हमारे राजनयिक रिश्ते तत्कालीन सोवियत संघ के साथ स्थापित हुए तो सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उबर रहा था। इस विश्व युद्ध में आज के रूस और यूक्रेन में स्थित तमाम बड़े स्टील प्लांट पर दुश्मन देशों जर्मन, जापान और इटली का हमला हुआ था। इनमें ज्यादातर स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

ऐसी परिस्थिति में सोवियत संघ वहां के सभी स्टील प्लांट में फिर से उत्पादन शुरू करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ था। इसके बावजूद हमारे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कोशिश के चलते सोवियत संघ ने भारत में 10 लाख टन उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने सहमति दे दी। 

तब वैश्विवक महाशक्ति के तौर पर सोवियत संघ भले ही अपना झंडा बुलंद कर रहा था लेकिन वहां का स्टील सेक्टर बहुत अच्छी हालत में नहीं था। इसके बावजूद सोवियत रूस ने अपने स्टील प्लांटों में भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण देना स्वीकार किया और अपने तमाम एक्सपर्ट को भिलाई भी भेजा। सोवियत संघ की इस पहल से भिलाई स्टील प्लांट अपने स्वरूप में आ सका।


'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी 

 

ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में 

मेकेयेवका स्टील प्लांट के बाहर भिलाई के इंजीनियर-1960

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर बड़े स्टील प्लांट रूस और यूक्रेन गणराज्य में थे। इनमें भी भिलाई के इंजीनियरों को ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए 1956 से 1990 तक  भेजा जाता रहा। 

शुरूआती दौर में जब भिलाई से देश भर के नौजवान सोवियत संघ गए तो यूक्रेन के इन्ही स्टील प्लांट के शहरों में रुमानियत का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

दरअसल, तब सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध से उबरा था और अपनी सख्त पाबंदियों के चलते 'आयरन कर्टेन' कहा जाता था। वहां की वही खबरें बाहर आती थी, जो वहां का कम्युनिस्ट सोवियत प्रशासन चाहता था। दूसरा वहां की महिलाओं को तब विदेश जाने की अनुमति दुर्लभ थी। 

ऐसे में जब भारत के नौजवान यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए तो वहां की बहुत सी नवयुवतियां इन्हें अपना दिल दे बैठीं। यह सब उस दौर की बातें हैं, जब तब के सोवियत संघ में उद्योगों का बोलबाला था और इनमें सबसे ज्यादा बड़े स्टील प्लांट संचालित थे। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर डॉ. सोनाली चक्रवर्ती की टिप्पणी 

 

 सोवियत संघ टूटा और बदल गईं परिस्थितियां

यूक्रेन का एक मेडिकल कॉलेज

एक नाटकीय घटनाक्रम में दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और सभी गणराज्यों ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। यही वह दौर था, जब यूक्रेन और रूस का इस्पात उद्योग चरमरा रहा था। 

 तब नवस्वाधीन यूक्रेन ने अपने यहां शिक्षा पर जोर दिया और देखते ही देखते मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक तूफान सा आ गया। इसका सीधा असर हमारे हिंदुस्तान पर भी हुआ। 

91 के पहले तक भिलाई सहित सोवियत प्रभाव वाले भारतीय शहरों में ज्यादातर परिवारों के बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए रूस-यूक्रेन जाया करते थे। तब इंजीनियरिंग में वहां भिलाई से गए स्टूडेंट को प्राथमिकता भी मिलती थी। लेकिन 91 के बाद वहां इंजीनियरिंग के बजाए फोकस मेडिकल में होने लगा और भारत के बनिस्बत वहां सस्ती मेडिकल शिक्षा की वजह से भारतीय स्टूडेंट का यूक्रेन का रुख करने लगे।

आज की परिस्थिति में बताया जा रहा है कि करीब 20 हजार स्टूडेंट यूक्रेन में मेडिकल कॉलेज में शिक्षा ले रहे हैं। फिलहाल सभी की चिंता यह है कि हमारे स्टूडेंट सुरक्षित अपने घर लौट जाएं। आईए जानते हैं कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ भारत ने कैसे रिश्ते जोड़े और इसके बाद उन दिनों भारतीयों को किस तरह वहां स्पेशल ट्रीटमेंट मिला। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी  

 

भिलाई की पृष्ठभूमि और नेहरू का दौरा 

नेहरू-इंदिरा का मग्नितागोर्स्क दौरा (जून-1955)

भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह देश के औद्योगिकीकरण के लिए दुनिया के बड़े देशों से हाथ मिलाया, इसका ब्यौरा आपको मेरी किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में विस्तार से मिल जाएगा। 

यह प्रधानमंत्री नेहरू ही थे, जिनकी वजह से तब सोवियत संघ ने भारत में एक स्टील प्लांट लगाने न सिर्फ कर्ज बल्कि तमाम तकनीकी सहायता व मशीनरी उपलब्ध कराने हामी भरी थी। जवाहरलाल नेहरू का सोवियत संघ से रिश्ता हमारे देश की आजादी से पहले का था।

 जवाहरलाल नेहरू ने 1947 के पहले और बाद में तीन मरतबा सोवियत संघ का दौरा किया था। पहली बार वह सोवियत सरकार के विशेष आमंत्रण पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर 7 नवंबर 1927 को महान अक्टूबर क्रांति दिवस की 10 वीं सालगिरह के आयोजनों में भाग लेने पहुंचे थे। उनके साथ उनके पिता मोतीलाल नेहरू, छोटी बहन कृष्णा व पत्नी कमला नेहरू भी साथ थे। 

इसके बाद सोवियत संघ का उनका दूसरा दौरा 7 जून से 23 जून 1955 में हुआ। तब उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी भी थी। उन्होंने अपनी यात्रा याकेतरिनबर्ग से शुरू की थी। वह रूस के औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क भी पहुंचे थे और यहां का विशाल स्टील प्लांट देखा था। 'रशिया बियॉन्ड' नाम की एक वेबसाइट के अनुसार '1955 में जब नेहरू और इंदिरा गांधी नदी किनारे बसे औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क पहुँचे थे तो स्टील प्लांट में काम करने वाले कामगार और शहर के स्थानीय लोग उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े थे। 

अपने इस दौरे में नेहरू मास्को से लेनिनग्राद की वृहद यात्रा पर निकले, इस दौरान उन्होंने स्टालिनग्राद, क्रीमिया, जॉर्जिया, अस्काबाद, ताशकंद, समरकंद, अल्टाई क्षेत्र, मग्निागोस्र्क और सवर्दलोव्स्क (याकेतरिनबर्ग)  शहरों का दौरा किया। 

जवाहरलाल नेहरू का तीसरा और अंतिम दौरा 8 सितंबर 1961 को हुआ था। जिसमें नेहरू ने तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री के साथ मॉस्को में इंडो-सोवियत फ्रैंडशिप रैली को संबोधित किया था। जवाहरलाल नेहरू अपने पहले दौरे में रूस की औद्योगिक प्रगति को करीब से देखा था। फिर जब हमारा देश आजाद हुआ तो उन्होंने 10 लाख टन सालाना क्षमता वाले एक स्टील प्लांट के लिए रूस को राजी कर लिया।

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर 'हरिभूमि' के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी 

 

 ऐतिहासिक समझौते के बाद मंजूरी मिली भिलाई को 

2 फरवरी 1955 को भारत-सोवियत संघ के बीच नई दिल्ली में करार

2 फरवरी 1955 को नई दिल्ली में सोवियत संघ के साथ भारत का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस समझौते के फलस्वरूप ही हफ्ते भर के भीतर नए स्टील प्लांट के लिए भिलाई के नाम पर भारत सरकार की मंजूरी मिली थी। 

इसके बाद भिलाई स्टील प्रोजेक्ट कंपनी, इस्पात मंत्रालय और हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (सेल की पूर्ववर्ती कंपनी) अस्तित्व में आए।

इन तमाम प्रक्रियाओं के बीच 6 जून 1955 को पायनियर टीम नागपुर होते हुए भिलाई पहुंची। जिसमें सोवियत संघ और भारत के इंजीनियर सहित 11 प्रतिनिधि थे। यह टीम दुर्ग के सर्किट हाउस पहुंची और भिलाई परियोजना पर जमीनी स्तर का काम शुरू हुआ। इसके अगले दिन नई दिल्ली से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मास्को के लिए उड़ान भरी थी। 

 ' वोल्ग से शिवनाथ तक' पर स्कूली छात्रा परी पुरोहित का एक वीडियो

 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के काम में आई तेजी 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण प्रथम चरण

प्रधानमंत्री नेहरू के जून 1955 के दौरे के बाद सोवियत संघ से इंजीनियर बड़ी तादाद में भिलाई पहुंचे और देश के पहले आधुनिक सरकारी स्टील प्लांट के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। 

बाद के दौर में सोवियत संघ ने न सिर्फ स्टील बल्कि दूसरे भारतीय उद्योगों को स्थापित करने में भी अपनी भागीदारी दी। भारत का यह औद्योगिकीकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि का परिणाम थी। वजह इसके पीछे की यह है कि भारत के साथ जिस सोवियत संघ का करार हुआ उसमें रूस और यूक्रेन एक विशाल देश सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे। 

जब भिलाई का निर्माण शुरू हुआ और 40 लाख टन की क्षमता तक कारखाना निर्माण चलता रहा, तब तक हमारे इन्हीं यूक्रेनियन इंजीनियरों ने हम भारतीयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया।

बीएसपी स्कूल सेक्टर-1 भिलाई 1988 बैच का यादगार आयोजन 'गुरुदक्षिणा' 

 

 इंजीनियरिंग शिक्षा में भिलाई के बच्चों को प्राथमिकता मिली यूक्रेन में

वह सोवियत संघ (यूएसएसआर) का दौर था, जब इस विशाल संघ (देश) का हिस्सा रहते हुए रूस, यूक्रेन, जार्जिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, लिथुआनिया, मॉल्दोविया, लातविया, आर्मीनिया, तुर्कमेनिया व एस्टोनिया अलग-अलग गणराज्य के तौर पर अस्तित्व रखते थे। उस दौर में सोवियत संघ का 80 फीसदी इस्पात उद्योग यूक्रेन में था।

यही वजह है कि जब 2 फरवरी 1955 को भारत के साथ सोवियत संघ करार हुआ तो इसके बाद भिलाई में स्थापित होने वाले स्टील प्लांट के भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए ज्यादातर यूक्रेन के ही स्टील प्लांट में भेजा गया। हालत तो यह थी कि आज जिस तरह से यूक्रेन में सस्ती मेडिकल पढ़ाई का क्रेज है, उन दिनों भिलाई के संपन्न अफसरों के पास अपने बच्चों को यूक्रेन के विभिन्न संस्थानों में कम दर पर उच्च शिक्षा के लिए भेजने का विकल्प था और इसका लाभ भी भिलाई के बच्चों को खूब मिला। ऐसे बच्चे 1990 तक रूस और यूक्रेन के विभिन्न कॉलेजों/तकनीकी संस्थानों में पढऩे जाते रहे।

भिलाई स्टील प्लांट शिक्षा विभाग का सफरनामा 1955 से

 

यूक्रेन-रूस के स्टील प्लांट, जिनके इंजीनियरों ने बनाया भिलाई

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में थे। भिलाई में 10 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने हुए समझौते के बाद तमाम इंजीनियर इन्हीं स्टील प्लांट से आए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को भी इन्हीं स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इनमें यूक्रेन के मरियोपोल (पूर्व नाम ज्दानोव) में अज्वस्ताल स्टील प्लांट और इलिच  स्टील एंड आयरन वर्क्स है। यूक्रेन के मेकेयेवका (पूर्व नाम दमित्रविस्क या दमित्रविस्की) में दोनेत्स्क प्रांत से 15 किमी दूर स्थापित मेकेयेवका मेटलर्जिकल प्लांट है। 

दोनेत्स बेसिन (डोनबास) की मशहूर आयरन ओर खदानें भी यहीं है। निपर नदी के किनारे यूक्रेन में ज्पारोशिया दक्षिण-पूर्वी शहर है। यहां क्रिवयी रीह (रोग) आयरन ओर माइंस है। यहीं ज्पारोशिया स्टील प्लांट ज्पारोस्ताल में है, जो 1933 में शुरू हुआ था। क्रिवा रोग स्टील प्लांट पहले सरकारी था, जिसे अब आर्सेलर-मित्तल ले चुका है। 

इनके अलावा रूस में भी स्टील प्लांट हैं, जिनका भिलाई से सीधा रिश्ता रहा है। इनमें रूस के दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया में केमेरोवो परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) स्थित नोवोकुजनेत्स है। जहां नोवोकुजनेत्स आयरन एंड स्टील प्लांट है। रूस के चेलियाबिन्स्क परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) में यूराल पर्वत श्रृंखला के साए तले मग्नितागोर्सके शहर है, जहां मग्नितागोर्सके आयरन एंड स्टील वर्क्स है। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' प्रथम संस्करण का विमोचन 

 

ज्यादातर शीर्ष पदों तक पहुंचे शुरूआती बैच के इंजीनियर

मरियोवपोल में भिलाई के इंजीनियर-1957

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के लिए युवा इंजीनियरों का पहला बैच 10 सितंबर 1956 को भिलाई से रवाना हुआ था। तब से 90 के दौर तक भिलाई के इंजीनियरों के कई बैच उच्च तकनीकी प्रशिक्षण के लिए जाते रहे। इनमें से ज्यादातर इंजीनियर भारतीय स्टील सेक्टर के शीर्ष पदों पर रहे।

 इनमें बहुत से लोगों ने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) को नेतृत्व दिया तो बहुत से इंजीनियर सेल के विभिन्न स्टील प्लांट में शीर्ष पदों पर पहुंचे। इन इंजीनियरों के पहले बैच से केसी खन्ना, एस. नारायण, एएस मूर्ति, एचसी धारवाड़, ईआरसी शेखर, एचएस अश्वत्थ, निमाई कुमार मित्र, केपी रामचंद्रन, बीएमजी रमन, एबी माथुर, ईएएस मूर्ति, एनसी रामासुब्बु, एस. नारायण, कैलाश बिहारी गोयल, केआर संगमेश्वरन, तेरे देसाई, आर. कृष्णामूर्ति, एस. समरपुंगवन में आधे ज्पारोशिया और आधे ज्दानोव में तकनीकी प्रशिक्षण हेतु भेजे गए थे। 

ज्पारोशे में एस. समरपुंगवन, ईआरसी शेखर, केआर संगमेश्वरन और एके फोतेदार ने प्रशिक्षण लिया, वहीं दिलबाग राय आहूजा, गोपीनाथ पुरी, रघुवीर व पीएच सचदेवा सहित अन्य ने मेकेयवका स्टील प्लांट भेजा गया। तब भिलाई स्टील प्लांट में नियुक्त होने वाले सोवियत चीफ इंजीनियर मेें भी ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आते थे। 

शुरूआती दौर के चीफ इंजीनियर वीई दिमशित्स ने यूक्रेन की प्रसिद्ध डोनबास की खदानों में भी काम किया था और मरियोवपुल व अज्वस्ताल स्टील प्लांट में सेवाएं दी थी। वहीं शुरूआती दौर के युवा इंजीनियरों में केआर संगमेश्वरन, एस. रामासुब्बुु, ईआरसी शेखर और केबी गोयल को रूस के मग्नितागर्सके में भी प्रशिक्षण का अवसर मिला। बाद के दौर में देखें तो ईडी प्रभारी रहे विनोद अरोरा को रूस मेें साइबेरिया के नोवे कुजनेत्स स्टील प्लांट मेें प्रशिक्षण का अवसर मिला था। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के दूसरे संस्करण का विमोचन 

 

 तब भिलाई के इंजीनियरों को मिलता था स्पेशल ट्रीटमेंट 

ज्पारोशे में नए साल की पार्टी में भिलाई के इंजीनियर-1958

भिलाई से यूक्रेन और रूस के स्टील प्लांट में उच्च तकनीकी प्रशिक्षण लेने वाले कई वरिष्ठ इंजीनियर आज भी यह बताते नहीं थकते कि उन्हें उस दौर में सोवियत रूस में कैसा वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था।

 भिलाई स्टील प्लांट की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल के सुप्रिंटेंडेंट रहे नरेंद्र सिंह छत्री बताते हैं-जब सितंबर 1956 को भिलाई के इंजीनियरों का समूह सोवियत रूस के लिए रवाना हो रहा था तो सांसद व महात्मा गांधी के सचिव रहे सुधीर घोष को खास तौर पर इस्पात मंत्रालय में विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) नियुक्त किया गया था और पत्राचार व पासपोर्ट सहित हमारी यात्रा का तमाम औपचारिकताएं सुधीर घोष के मार्गदर्शन में हुई। घोष हम लोगोें को खास तौर पर विदा करने एयरपोर्ट भी आए थे। 

छत्री बताते हैं-मास्को उतरने के बाद से अज्वस्ताल, ज्दानोव, ज्पारोशे, मरियोपोल और मग्नितागोर्सके जैसे स्टील प्लांट में समूह को बांट दिया गया। यहां हर शहर में भारतीय को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता था। शहर में भारतीय युवा यदि सर्कस या मूवी देखने तो वहां के स्थानीय लोग हमें पहले टिकट लेने का मौका देते।

 इसी तरह शहर में होने वाली क्रिसमस व न्यू ईयर सहित तमाम पार्टियों में भी भारतीय युवा खास तौर पर आमंत्रित किए जाते थे। वह ऐसा दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से सोवियत रूस उबर रहा था और जनजीवन सामान्य हो रहा था। ऐसे में भारतीय इंजीनियर भी वहां की जीवनशैली में घुलमिल गए। 

जब भिलाई स्टील प्लांट से निकला पहला 'हीरा'

 

दिल का रिश्ता भी जुड़ता गया यूक्रेन से 

मल्होत्रा-मजुमदार और बलराम सिंह दंपति

जिन दिनों भिलाई स्टील प्रोजेक्ट अपना रूप ले रहा था, उन्हीं दिनों सुदूर यूक्रेन में तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करने गए भिलाई के ज्यादातर नौजवानों ने वहां दिल का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

1956 से 1985 तक भिलाई में लगभग हर साल ऐसे कई जोड़े आते गए, जिनकी नई जिंदगी की शुरूआत यूक्रेन से हुई। भिलाई के एक युवा इंजीनियर काशीनाथ 1957 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात आना मलाया से हुई। बातें-मुलाकातें हुई और लुदमिला को काशीनाथ इतना भा गए कि उन्होंने साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। 

1959 में भिलाई के इंजीनियर एलआर भटनागर यूक्रेन के मकेयेवका स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात एक युवा टेलीफोन ऑपरेटर गलीना से  हुई और दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया।

1960 में मेकेयेवका के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे भिलाई के युवा इंजीनियर मोती सागर मल्होत्रा का वहीं के अस्पताल में पदस्थ 21 साल की नर्स जीना पर आ गया और जब मल्होत्रा हिंदुस्तान लौटे तो उनके साथ उनकी हमसफर जीना भी थी। 

1962 में यूक्रेन के ज्पारोशे में स्कूली पढ़ाई कर रही क्लेरा और भिलाई से गए युवा इंजीनियर बलराम सिंह की कहानी में भी ऐसी ही रूमानियत थी। क्लेरा और बलराम ने बाद में शादी कर ली और भिलाई में नई जिंदगी की शुरूआत की। सेल के निदेशक प्रोजेक्ट पद से रिटायर हुए बलराम सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन क्लेरा उम्र के 8 वें दशक में भी बेहद सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर रोजाना अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। 

 यूक्रेन के ज्दानोव (अब मरियोपोल) के एक आर्थोडोक्स क्रिश्चियन परिवार की बेटी लुद्मिला और भिलाई से वहां स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए युवा इंजीनियर विश्वनाथ नागेश मजुमदार की भी नजरें मिली और प्यार हो गया। हालांकि उनकी शादी में कुछ दिक्कतें आईं लेकिन दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम कर 1963 में शादी के बाद भिलाई में नहीं जिंदगी की शुरूआत की। 

बाद के दौर में 1985 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में फैशन डिजाइनर लुद्मिला अरेफयेवा और भिलाई से वहां प्रशिक्षण लेने गए सुब्रत मुखर्जी ने 1985 में एक दूसरे को दिल दे दिया और शादी के बाद भिलाई में नई जिंदगी शुरू की। पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर विवेक चतुर्वेदी 1986 में यूक्रेन के मशीन बिल्डिंग इंस्टीटॅयूट ज्पारोशिया में पढ़ रहे थे। वहीं इना लुब्रोनेंको भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की तालीम ले रही थीं। दोनों के दिल मिले और रूमानियत का एक नया रिश्ता शुरू हुआ जो आज भी हंसी-खुशी चल रहा है। 


नए दौर में भिलाई को जरूरत नहीं रही रूसी इंजीनियरों की 

भिलाई स्टील प्लांट का 40 लाख टन सालाना हॉट मेटल उत्पादन क्षमता तक का विस्तारीकरण अकेले सोवियत रूस के दम पर हुआ था। जाहिर है, इसमें रूसी तकनीक और मशीनरी इस्तेमाल हुई। इस वजह से एक दौर ऐसा भी रहा जब रशियन टेक्नीकल एक्सपर्ट बड़ी तादाद में भिलाई में हुआ करते थे। 

इनमें से 90 फीसदी एक्सपर्ट यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आया करते थे। इन सभी एक्सपर्ट को उपलब्ध कराने की जवाबदारी रूसी फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) की हुआ करती थी। लेकिन देखते ही देखते दौर बदलने लगा। 


टीपीई का दफ्तर बंद, इस्माइल स्वदेश लौटे और यनोद का निधन 

टीपीई के दफ्तर में मेरी दाईं ओर इस्माइल और बाईं ओर यनोद

सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत सरकार के फैसले के अनुरूप भिलाई सहित तमाम सरकारी स्टील प्लांट के विस्तारीकरण में ग्लोबल टेंडर के जरिए अलग-अलग देशों की तकनीक अपनाने  की शुरूआत हुई। 

तब जर्मन, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, चीन और इटली सहित विभिन्न देशों की तकनीक का भिलाई में प्रवेश हुआ। ऐसे में रशियन एक्सपर्ट की संख्या लगातार घटने लगी। 

2018 में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने एक अहम फैसला लेते हुए 2020 तक रशियन एक्सपर्ट की तादाद को घटाते हुए शून्य करने का फैसला लिया। इसके अनुरूप ही अब भिलाई सहित सेल के किसी भी स्टील प्लांट में रशियन एक्सपर्ट की जरूरत नहीं रही। 

भिलाई में एक्सपांशन बिल्डंग स्थित टीपीई का दफ्तर अब बंद हो चुका है। टीपीई के भारत प्रमुख इस्माइल मजयानेव ने बीएसपी मैनेजमेंट की ओर से सेक्टर-7 रशियन काम्पलेक्स में आवंटित सभी बंगले लौटा कर पिछले ही साल अपने देश रवाना हो चुके हैं। वहीं टीपीई दफ्तर की पहचान रहे यहां के केयर टेकर यनोद कुमार का भी कैंसर से देहांत हो चुका है। 


अब भारतीय स्टूडेंट से हो रहा व्यवहार चिंताजनक 

पोलैंड सीमा पर परेशान हाल भारतीय स्टूडेंट-28 फरवरी 2022

एक तरफ जिस यूक्रेन में शांतिकाल के दौरान भिलाई से गए इंजीनियरों को उन दिनों वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था तो दूसरी तरफ अब युद्धकाल में उसी यूक्रेन में भारतीय नौजवान स्टूडेंट के साथ दुव्र्यवहार की चिंताजनक खबरें आ रही हैं। 

आज भारतीय स्टूडेंट अपनी जान बचाने बंकरों में किसी तरह रह रहे हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकलना सबसे बड़ी चुनौती है। 

ऐसे में यूक्रेनी लोग भारतीय स्टूडेंट को ट्रेन में चढऩे नहीं दे रहे हैं। वहीं पोलैंड सीमा पर भारतीय स्टूडेंट से वहां की सेना द्वारा मारपीट करने के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। भारत सरकार के सारे इंतजाम शांति वाले देशों में हैं। स्टूडेंट से कहा जा रहा है कि किसी तरह युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकल जाएं। हालांकि संकटग्रस्त इलाके से बाहर निकालने के लिए किसी तरह का कोई इंतजाम भारत सरकार की तरफ से नहीं हो रहा है। ऐसे में भारतीय स्टूडेंट बेहद चुनौतीपूर्ण हालात का सामना कर रहे हैं। 

अब तो भारतीय स्टूडेंट की मौत की खबरें भी आ रही हैं। कर्नाटक के नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर की यूक्रेन के खारकीव में मंगलवार 1 मार्च को हमले में मौत हो गई। पंजाब के बरनाला का रहने वाले चंदन कुमार की बुधवार 2 मार्च को को मौत हो गई। चंदन की मौत की वजह बीमारी बताई गई है और वह लंबे समय से अस्पताल में भर्ती थे। वहीं 4 मार्च को पंजाब के रहने वाले हरजोत सिंह को क्रास फायर में गोली लगी है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

Wednesday, February 16, 2022



संघर्ष के दिन भिलाई में गुजारे थे बप्पी दा ने, यहीं रहते

ख्वाब देखा फिर मुंबई गए और छा गए संगीत जगत में 

 

बप्पी दा के साथ भिलाई में इंटरव्यू 08-04-13
करीब महीने भर की तकलीफ के बाद अब संगीतकार बप्पी लाहिरी (मूल नाम-आलोकेश लाहिरी) भी नहीं रहे। मंगलवार 15 फरवरी 2022 मंगलवार की रात उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में 69 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 80-90 का दौर बप्पी दा के ऊर्जा से भरपूर संगीत का दौर था।

 तब बप्पी दा एक तरफ डिस्को की धूम मचा रहे थे तो दूसरी तरफ दक्षिण की फिल्मों की खास शैली का संगीत देकर पूरे देश का मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन एक बप्पी लाहिरी वह भी थे, जो बेहद गंभीर किस्म का भी संगीत दे रहे थे। बप्पी दा के संगीत को इन तीन खांचें में महसूस किया जा सकता है। यही उनके संगीत की पहचान भी थी। 

यकीन कीजिए कि जिसने "आई एम ए डिस्को डांसर" रचा, उसी ने "सैंय्या बिना घर सूना" या फिर "चंदा देखे चंदा" भी रचा। खैर, बप्पी दा एनर्जी के पर्याय थे। उनके लिए हल्के-फुल्के संगीत के अलावा शास्त्रीयता का पुट लिए गंभीर संगीत का सृजन करना सहज था। 

17 साल की उम्र में गवा रहे थे लता-मन्ना डे और किशोर को

अपने माता-पिता के साथ बप्पी दा बालपन में

बप्पी दा जिस दौर में दक्षिण में व्यस्त थे और उनकी इंदीवर के साथ जोड़ी जो गीत-संगीत रच रही थी, तब उसकी खूब आलोचना हुई और उन पर फूहड़ता और नकल के आरोप लगे।

इसके बावजूद "जो चल गया वो चल गया" वाला मामला था। बप्पी दा चूंकि संगीत के समृद्ध परिवार से थे। इसलिए बचपन से ही उनके संस्कार में ही संगीत बसा था। 

महज 17 साल की उम्र में उन्होंंने बांग्ला फिल्म "दादू" में संगीत दिया। जिसमें लता मंगेशकर,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों ने पार्श्वगायन किया। 

बाद में बप्पी दा ने मुंबई का रुख किया और फिर जो इतिहास बना वह दुनिया के सामने है। बप्पी दा के लिए स्वर्णकाल था। उस दौर में हर बड़े बैनर के साथ बप्पी दा ने काम किया और सुपरहिट संगीत दिया। 

बप्पी दा का संगीत आलोचना और लोकप्रियता के द्वंद के बीच बेहद लोकप्रिय होता रहा। इस तथ्य को उनके आलोचकों ने भी स्वीकार किया।

शिखर के दौर का संगीत ही लोकप्रिय रहा

तमाम इतिहास रचते हुए अपने करियर के शिखर के दौर में बप्पी लाहिरी ने फिल्म संगीत का जो माधुर्य रचा वह बाद के दौर में कायम नहीं रह पाया। इसलिए आज भी बप्पी दा का वही संगीत लोकप्रिय है, जो उन्हें अपने शिखर के दौर में रचा था। 

दशक भर पहले आई फिल्म "द डर्टी पिक्चर" में उसी लोकप्रियता को भुनाने के लिहाज से "उई अम्मा-उई अम्मा" के मीटर पर "ऊ ला ला ऊ ला ला" रच दिया गया। बप्पी दा के माधुर्य से सजी "हिम्मतवाला" की रिमेक बनी तो संगीत जस का तस रख दिया गया।  

राजनीति में भी किस्मत आजमाई, लता को पुकारा था मां

बप्पी दा ने शेयर की थी 'मां' की याद में अपनी यह फोटो
बप्पी दा  का अपना संसार था जिन दिनों बप्पी दा का करियर चरम पर था तब अपने संगीत के लिए उन्होंने खूब आलोचनाएं झेली लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। 

करियर के ढलान के बाद बप्पी दा ने राजनीति का रास्ता भी चुना। जिसमें उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और पश्चिम बंगाल की श्रीरामपुर सीट से किस्मत आजमाई लेकिन तृणमूल कांग्रेस के हाथों उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने राजनीति से तौबा कर ली। हाल के दिनों में बप्पी दा सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। वह विभिन्न मुद्दों पर ट्विट किया करते थे।

सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के निधन पर बप्पी दा ने अपनी बचपन की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए मां के संबोधन के साथ श्रद्धांजलि दी थी। हालांकि तब खुद बप्पी दा भी बेहद बीमार थे। अब उनके जाने की खबर आई है।

बप्पी दा भिलाई पहुंचे, घिरे रहे रिश्तेदारों से

संगीतकार बप्पी लाहिरी 8 अप्रैल 2013 सोमवार को भिलाई क्लब में अपना शो करने भिलाई स्टील प्लांट के बुलावे पर आए थे। तब शो से ठीक पहले मुझे बप्पी दा से छोटी सी मुलाकात और बात करने का मौका मिला। 

हालांकि थोड़ा अफरा-तफरी का माहौल था और बप्पी दा की टीम भिलाई निवास से भिलाई क्लब रवाना होने के लिए खड़ी थी। वहीं बप्पी दा के परिजन भी उन्हें घेरे खड़े थे। ऐसे माहौल में बप्पी दा ने छोटे से इंटरव्यू के लिए मुझे वक्त दिया। इस दौरान खुद बप्पी दा ने भिलाई से अपने 40 साल पुराने रिश्तों पर रोशनी डाली।

बप्पी दा ने बताया उनके पिता और प्रख्यात संगीतकार अपरेश लाहिरी और शास्त्रीय गायिका मां बंसरी लाहिरी ने 1960-70 के दौर में भिलाई में बंगाली समाज के बीच कई कार्यक्रम दिए थे। उस दौर में मेरे माता-पिता अक्सर भिलाई आते रहते थे। तब मेरी बहन शुक्ला चौधरी (सगी बुआ की बेटी) यहां भिलाई में क्वार्टर नं. 2 डी, स्ट्रीट-46, सेक्टर-8 में रहती थी। 

मुंबई जाते वक्त अक्सर भिलाई पहुंच जाता था

बप्पी दा का आटोग्राफ
बप्पी दा ने बताया कि पहली बांग्ला फिल्म 17 साल की उम्र में तो मिल गई और उसका संगीत भी खूब चला। लेकिन आगे मेरा ख्वाब मुंबई में पैर जमाने का था।

 वह मेरे संघर्ष की शुरूआत थी। कोलकाता से मुंबई जाते वक्त अक्सर मैं तब भिलाई उतर जाता और बहन के घर 1-2 दिन रह कर जाता था। फिर कुछ 2-3 महीने का एक दौर ऐसा भी रहा जब मुझे 1971 में भिलाई में अपनी बहन के इसी सेक्टर-8 वाले घर में रहना पड़ा। 

तब यहां रह कर मैं अपना संगीत तैयार करता रहता था और खाली वक्त में भिलाई घूमता था। बप्पी दा कहते हैं-तब मेरा ख्वाब मुंबई फिल्मी दुनिया में पहचान बनाना था और इसी ख्वाब को पूरा करने मैं भिलाई में रहते हुए कोशिश कर रहा था। 

तब मैं अपने संपर्कों को चिटि्ठयां लिखता था और इंतजार करता था जवाब आने का। तब टेलीफोन तो मुश्किल से लगता था इसलिए घर में भी चिट्‌ठी लिख कर ही अपनी खैर, खैरियत देता रहता था। 

ऐसे भिलाई से पहुंचा मुंबई

बप्पी दा बोले-फिर एक दिन ऐसा आया कि मुंबई में कुछ उम्मीदें दिखाई दी। मैनें तुरंत भिलाई से मुंबई की टिकट कटाई और यहां से सीधे जा पहुंचा मुंबई। वहां मुझे एक छोटे बजट की फिल्म "नन्हा शिकारी" मिली। इसके बाद नासिर हुसैन प्रोडक्शन की फिल्म "मदहोश" में बैकग्राउंड म्यूजिक करने का मौका मिला, जिसमें संगीतकार आरडी बर्मन थे।

 इसके बाद पहली बड़ी सुपरहिट फिल्म नासिर हुसैन की ही "जख्मी" मिली । उसके बाद "चलते-चलते", "आप की खातिर", "टूटे खिलौने" और फिर सफल फिल्मों के धूम की कतार लग गई।

इस बातचीत के दौरान बप्पी दा के भिलाई में रहने वाले भांजे शांतनु चौधरी ने बताया कि परिवार अब सेक्टर-8 छोड़ सिंधिया नगर में रह रहा है। 

अपने संगीत की आलोचना पर बप्पी दा ने कहा था...

संगीत की आलोचना के सवाल पर बप्पी दा ने कहा था-उनके संगीत की कई बार आलोचना हुई लेकिन यही हिट भी रहा। बप्पी दा ने इस तथ्य को गलत बताया कि दक्षिण की फिल्मों के हिंदी संस्करण में संगीत जस का तस रख दिया गया। 

बप्पी दा बोले-नहीं ऐसा नहीं है जिन दिनों "हिम्मतवाला", "मवाली", "मकसद","तोहफा" और "पाताल भैरवी" से लेकर "सिंघासन" तक दक्षिण की फिल्मों की कतार लगी हुई थी तो मैनें उनके दक्षिण के संगीत को एक तरफ रख कर अपना संगीत रचा। 

कहीं भी कॉपी नहीं किया,इन फिल्मों में जितना भी संगीत रचा मेरा मौलिक रहा। उन्होंने बातचीत के दौरान अपने किशोर कुमार मामा को भी याद किया। बप्पी दा ने बताया कि किशोर कुमार उनके रिश्ते के मामा लगते थे और उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया।

तब सिविक सेंटर खूब घूमता था, फिर आउंगा भिलाई

दैनिक भास्कर में तब प्रकाशित मेरा इंटरव्यू
बप्पी दा ने फिल्मी धुनों की नकल के सवाल पर कहा कि दुनिया भर का संगीत हम ही क्या सभी सुनते हैं और यह सब हमारे कानों में रचा-बसा रहता है। इसलिए स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं किसी धुन से हम प्रभावित हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम नकल कर रहे हैं।

 मैं तो अक्सर कहता हूं अगर मैनें धुन चोरी की है तो फिर मुझसे पहले के भी संगीतकार भी धुन चोरी के दोषी हैं। बप्पी दा ने भिलाई की यादों को टटोलते हुए कहा-उन दिनों तो भिलाई में काफी कम हरियाली दिखती थी।

 मैं सिविक सेंटर खूब जाता था। बप्पी दा ने कहा कि एक बार फिर वह 2-3 दिन के लिए भिलाई आकर रहना चाहते हैं, आखिर मेरे स्ट्रगल के दिनों का गवाह भिलाई भी रहा है।

माता-पिता के बाद अब मामा के जाने से हम अकेले रह गए

बाम्बे और भिलाई में बप्पी दा-शुक्ला परिवार

बप्पी दा के गुजरने पर उनकी बहन स्व. शुक्ला चौधरी के निवास पर भी शोक का माहौल है। स्व. शुक्ला चौधरी के सुपुत्र शांतनु चौधरी ने अपने मामा को याद करते हुए कुछ फोटोग्राफ्स शेयर किए हैं। ब्लैक एंड वाइट फोटो बप्पी के बाम्बे स्थित निवास की है।

इस फोटो में शांतनु अपने माता-पिता व छोटी बहन के साथ हैं, वहीं बप्पी दा के साथ उनके माता-पिता हैं। वहीं कलर फोटो शांतनु के दुर्ग सिंधिया नगर स्थित निवास की है।

 1995 में दुर्ग में फिल्म स्टार नाइट में शामिल होने आए बप्पी दा अपनी बहन के घर भी पहुंचे थे। तब बप्पी दा के साथ इस फोटो में शांतनु व उनके माता-पिता भी नजर आ रहे हैं। 

शांतनु बताते हैं- शुरूआती दौर में जब मामा हमारे सेक्टर-8 वाले घर आते थे तो मैं बहुत छोटा था। कुछ हल्की सी यादें हैं। मामा हमारे साथ कई बार रहते थे। फिर बाम्बे या कलकत्ता जाते थे। जब भी भिलाई रुकते तो सिविक सेंटर और सेक्टर-6 कालीबाड़ी जरूर जाते थे।

 जब फिल्मों में मामा व्यस्त होते गए तो उनका यहां आना कम होता गया। इसके बाद तो वह कभी-कभार किसी स्टेज परफार्मेंस के नाम पर रायपुर या भिलाई-दुर्ग आने पर ही घर आते थे। 

परिवार के सभी सदस्यों के प्रति बप्पी दा हमेशा बेहद स्नेही रहे। वह सभी का हालचाल पूछते रहते थे। शांतनु कहते हैं-अब मेरे माता-पिता नहीं रहे और बप्पी मामा ने भी हमारा साथ छोड़ दिया। ऐसे में हम परिवार के लोग अपने-आप को बहुत ही अकेला महसूस कर रहे हैं।