Monday, May 24, 2021

 भिलाई में मां गुजरी, सरहद पार 
का एक गांव डूब गया मातम में 


 भिलाई में जब अखंड पाठ की समाप्ति हुई तो उसी
 रोज पाकिस्तान के एक गांव में भी की गईं दुआएं

 सरदार हरमिंदर सिंघ-प्रीतपाल कौर 
छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले की पहचान छह दशक पहले बने भिलाई स्टील प्लांट की वजह से पूरी दुनिया में है। यहां के सेक्टर-2 भिलाई निवासी वयोवृद्ध मां प्रीतपाल कौर भाटिया की 20 मई 2021 को हुई मृत्यु के बाद परिजनों को भी नहीं मालूम था कि उनकी मां के लिए सरहद पार पाकिस्तान का एक गांव भी मातम मना रहा है। 

तीन दिन बाद रविवार 23 मई को सोशल मीडिया में इस संबंध में आई कुछ पोस्ट की खबर मिलने के बाद स्व. प्रीतपाल कौर के परिजन बेहद भावुक हैं। दरअसल स्व. प्रीतपाल कौर मूल रूप से मौजूदा पाकिस्तान के सूबा पंजाब के जिला मंडी बहाउद्दीन (पूर्व में गुजरात जिला) तहसील फालिया के गांव जोकालियां की रहने वाली थीं। 

बंटवारे की त्रासदी झेल कर उस गांव से हिंदुस्तान चले आए परिवारों को खोजने और संपर्क साधने का काम वहां पाकिस्तान की नई पीढ़ी कर रही है और बाकायदा सोशल मीडिया पर इसकी पूरी जानकारी भी शेयर कर रही है।

ऐसे में भिलाई की इस वयोवृद्ध मां के गुजरने की खबर पाकिस्तान के जोकालियां गांव के लिए भी सदमे से कम नहीं थी। यहां भाटिया परिवार ने अपनी मां की याद में अखंड पाठ की शुरूआत बाबा दीप सिंह गुरुद्वारा सुपेला भिलाई में 22 मई को करवाई थी, जिसका समापन 24 मई को लंगर के साथ हुआ।  

जब सरहद पार जोकालियां गांव के लोगों को पता चला तो वहां भी गांव की मस्जिद और घरों में 24 मई को ही स्व. प्रीतपाल के हक में दुआ करने का ऐलान कर दिया। 

स्व. प्रीतपाल के पुत्र और पेशे से फोटो जर्नलिस्ट अजीत सिंह भाटिया ने बताया कि डोंगरगढ़ निवासी उनके मामा मनजीत सिंह भाटिया के माध्यम से जोकालियां गांव के लोगों से संपर्क हुआ था और मां के गुजरने की खबर भी उन्हीं के जरिए वहां पहुंची। 

अजीत ने बताया कि उनके दिवंगत पिता हरमिंदर सिंघ भाटिया जोकालियां गांव से 16 किमी दूर मानो चक के रहने वाले थे। दोनों का तब की परंपरा के अनुसार बाल विवाह हुआ था। बंटवारे की त्रासदी के बाद दोनों परिवार फिर मिले।

इसके बाद उनके पिता रोजी-रोटी के लिहाज से डोंगरगढ़ से भिलाई आए और यहां भिलाई स्टील प्लांट को लकड़ी आपूर्ति करने के पेशे से जुड़ गए। तब से परिवार भिलाई का ही हो कर रह गया। यहां परिवार सेक्टर-2 मार्केट में रहता है।  


फेसबुक पर गांव वालों ने लिखा…सरहद पार से अफसोसनाक खबर 

स्व. प्रीतपाल कौर के गुजरने की खबर मिलने पर फेसबुक पेज जोकालियां ऑन लाइन में एडमिन आमिर शहजाद लिखते हैं- कयाम पाकिस्तान से कब्ल (पहले) हमारे गांव जोकालियां की रिहाइश (रहनेवाली) माता जी प्रीतपाल कौर जी जुमेरात 20 मई 2021 को बमुकाम भिलाई जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) में दुनिया-ए-फानी से कूच कर गईं हैं। 

माता जी 1936 में जोकालियां में पैदा हुईं और कयाम-ए-पाकिस्तान के कब्ल जोकालियां गुरद्वारे वाली गली में रिहाइश पज़ीर (निवासरत) थीं। आप मानो चक के सरदार हरमिंदर सिंघ जी के साथ रिश्ता-ए-अज़दवाज़ (विवाह) मेें मुंसलिक थीं। 

कयाम-ए-पाकिस्तान व हिंदुस्तान के क़यामत खेज दिनों में अनगिनत सोग़वार यादों के साथ खानदान के साथ पड़ोसी मुल्क भारत हिजरत कर गईं। ग्रुप टीम और अहले (निवासी) जोकालियां दुआ गो हैं के अल्लाह तआला दुख की इस घड़ी में ग़मज़दा खानदान को सब्र व हिम्मत दें… आमीन। 

उर्दू में मूल पोस्ट-

سرحد پار سے افسوس ناک خبر

قیامِ پاکستان سے قبل ہمارے گاؤں جوکالیاں کی رہائشی ماتا جی پریت پال کور جی جمعرات 20 مئی 2021ء کو بمقام بِھلائی ضلع درگ (چھتیس گڑھ) میں دنیائے فانی سے کُوچ کر گئی ہیں۔ ماتا جی 1936ء میں جوکالیاں میں پیدا ہوئیں اور قیامِ پاکستان سے قبل جوکالیاں گردوارے والی گلی میں رہائش پذیر تھیں۔ آپ سردار ہرمہیندر سنگھ جی آف مانو چک کے ساتھ رشتہ ازدواج میں منسلک تھیں۔ قیامِ پاکستان و ہندوستان کے قیامت خیز دنوں میں ان گنت سوگوار یادوں کے ساتھ خاندان کے ساتھ پڑوسی ملک بھارت ہجرت کر گئیں اور پرسوں اس فانی دنیا سے ہمیشہ کے لئے پردہ کر گئیں۔ گروپ ٹیم اور اہلِ جوکالیاں دُعاگو ہیں کہ اللہ تعالٰی دکھ کی اس گھڑی میں غمزدہ خاندان کو صبر و ہمت دیں۔ آمین

मां ने बताई थी बंटवारे की त्रासदी, वीडियो शेयर हो रहा पाकिस्तान में 

अजीत सिंह भाटिया ने अपनी मां के अंतिम दिनों में कुछ वीडियो बनाए थे, जिसमें स्व. प्रीतपाल कौर 11 साल की उम्र में अपनी जमीन छोड़ कर डोंगरगढ़ में अपने मामा हरदयाल सिंह भाटिया के घर तक पहुंचने की त्रासदी का किस्सा बयान कर रही हैं। 

यह वीडियो अजीत के मामा मनजीत सिंह भाटिया के माध्यम से पाकिस्तान के जोकालियां गांव तक पहुंच गया और अब जोकालिया ऑनलाइन के नाम से बने फेसबुक पेज पर पोस्ट होने के बाद से यह वीडियो खूब शेयर हो रहा है।

इस वीडियो पर अपनी टिप्पणी करते हुए शाह मीर लिखते है-''यह एक कयामतखेज दिन था। गुरुद्वारा वाली गली के साथ नूर की गली में नूर के परिवार ने सारे सिख परिवारों को पनाह दे रखी थी और लोग डट कर बलवाइयों का मुकाबला कर रहे थे कि अचानक सब खत्म हो गया। यहां के मुस्लिम परिवारों ने बरसों तक इसका सोग मनाया।'' 

इस वीडियो में स्व. प्रीतपाल बंटवारे की त्रासदी बयान करते हुए बताती हैं कि- ''ब्रिटिश भारत के अन्य हिस्सों की तरह गुजरात जिला (वर्तमान मंडी बहाउद्दीन) भी दंगो की आग में झुलस रहा था। जब हालात बेकाबू होने लगे तो सभी सिख परिवारों की महिलाओं और बच्चों को गांव के चौधरी गुलाम रसूल तरार के घर में पनाह दी गई। वहीं तमाम पुरुष सदस्य गांव के गुरुद्वारे में इकट्ठा होकर बलवाइयों से मुकाबले की तैयारी करने लगे। इसी बीच दूसरे गांव से आए बलवाइयों का हमला हुआ और पूरा गुरुद्वारा खून से लाल हो गया।'' 

 स्व. प्रीतपाल कौर के पिता, चाचा और दूसरे तमाम पुरुष सदस्य मारे गए। किसी तरह चौधरी परिवार ने सभी महिला व बच्चों को आर्मी के ट्रक बुलवा कर सुरक्षित निकलवाया। इसके बाद दो-दिन भूखे-प्यासे रहते हुए वह अमृतसर पहुंची। फिर रिफ्यूजी कैम्प और वहां से डोंगरगढ़ में अपने मामा के घर डोंगरगढ़ पहुंची थीं।

जब सदियों से रिवाज पाने वाला रवादारी का
 बेमिसाल कल्चर रातों-रात खत्म हो गया.....

जोकालियां ऑनलाइन फेसबुक पेज 
फेसबुक पेज जोकालियां ऑन लाइन बेहद दिलचस्प पेज है। इसमें मरहूम प्रीतपाल कौर पर दूसरी पोस्ट में उनके वीडियो के साथ तफसील से लिखा है। वैसे इस फेसबुक पेज की कवर फोटो भी काबिले गौर है। इसमें गांव जोकालियां की फोटो के साथ उर्दू में लिखा है-सुख के मौसम तेरी गलियों में सदा रक्स करें,शहर जोकालियां...तेरी रौनकें ता हश्र (कयामत तक) रहें। इस पेज पर दूसरी पोस्ट में कुछ यूं लिखा है-

हिस्टोरियन मनजीत सिंघ बबला साहब बयान करते हैं कि ब्रिटिश हिंदुस्तान के दीगर इलाकों की तरह जिला गुजरात (मौजूदा मंडी बहाउद्दीन) भी तकसीम-ए-हिंद के वक्त फसादात की लपेट में आ गया।

फसादात की आग ने गुजरात को भी बुरी तरह मुतास्सिर (प्रभावित) किया। सदियों से रिवाज पाने वाला रवादारी का कल्चर (सहिष्णुता की संस्कृति) रातों-रात तहलील (खत्म) हो गया। हिंदु, सिख और मुसलमान जो एक दूसरे के पड़ोस में सदियों से पुरअमन जिंदगी गुजार रहे थे, एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

हमारे गांव जोकालियां में रवादारी के कल्चर की जड़ें बहुत मजबूत थीं। ये माताजी जिनका नाम प्रीतपाल कौर जी है, 1936 में पैदा हुईं और 20 मई 2021 को इस फानी दुनिया को खैरबाद कह गईं। उनके वालदैन, चचा और बहुत से दूसरे रिश्तेदार इन फसादात की नजर हुए और जिंदगी की बाजी हार गए। उन के वालिद साहब (पिता) और चचा जोकालियां गुरुद्वारे में ही जान की बाजी हार गए। 

फसादात में बच जाने वालों में बहुत से लोगों ने (जिन में ये मां जी भी शामिल थीं) जान बचाने के लिए हमारे गांव की इंसान दोस्त शख्सियत मरहूम हाजी गुलाम रसूल तरार साहब के यहां पनाह ली। 

मनजीत सिंह बबला साहब बताते हैं कि हाजी साहब और उनके अहले खाना (परिवार) ने इन लोगों के लिए खुले दिल के साथ खुफिया तौर पर कयाम व तआम का बंदोबस्त कर के इंसान दोस्ती और रवादारी की आला मिसाल कायम की।

ये लोग तीन-चार रोज तक तरार साहब के यहां मेहमान रहे और मुतास्सुब (कट्‌टरपंथी) बलवाइयों का जोर कम होने पर अपना सब कुछ यहीं छोड़ कर खाली हाथ पैदल पहाड़ियों वाली पहुंचे, जहां से मंडी बहाउद्दीन और गुजरात में लगे मुहाजरिन कैम्प तक पहुंचे और अपनों को खो देने का दुख और बेशुमार दिलसोज यादें ले के साथ हिंदुस्तान चले गए। इस वीडियो में माताजी प्रीतपाल कौर जी उन्हीं कयामतखेज दिनों की दास्तान बयान कर रही हैं। 

मूल उर्दू की पोस्ट इस तरह से है-

भाटिया परिवार 
ہسٹورین منجیت سنگھ ببلہ صاحب بیان کرتے ہیں کہ برٹش ہندوستان کے دیگر
علاقوں کی طرح ضلع گجرات (موجودہ منڈی بہاؤالدین) بھی تقسیمِ ہند کے وقت فسادات کی لپیٹ میں آ گیا۔ فسادات کی آگ نے گجرات کو بھی بُری طرح متاثر کیا۔ صدیوں سے رواج پانے والا رواداری کا کلچر راتوں رات تحلیل ہو گیا۔ ہندو، سکھ اور مسلمان جو ایک دوسرے کے پڑوس میں صدیوں سے پُرامن زندگی گزا ر رہے تھے ایک دوسرے کے خون کے پیاسے ہو گئے۔

 ہمارے گاؤں جوکالیاں میں رواداری کے کلچر کی جڑیں بہت مضبوط تھیں۔ لوگ ایک دوسرے کا احترام کرتے تھے جس میں مذہب و نسل کی تفریق نہیں تھی۔ یہ ماتا جی جن کا نام پریتپال کورجی ہے 1936ء میں پیدا ہوئیں اور 20 مئی 2021ء کو اس فانی دنیا کو خیرباد کہہ گئیں۔ ان کے والدین، چچا اور بہت سے دوسرے رشتہ دار ان فسادات کی نذر ہوئے اور زندگی کی بازی ہار گئے۔

 ان کے والد صاحب اور چچا جوکالیاں گردوارے میں ہی جان کی بازی ہار گئے۔ فسادات میں بچ جانے والوں میں سے بہت سے لوگوں نے (جن میں یہ ماں جی بھی شامل تھیں) جان بچانے کے لئے ہمارے گاؤں کی انسان دوست شخصیت مرحوم حاجی غلام رسول تارڑ صاحب کے ہاں پناہ لی۔ 

منجیت سنگھ ببلہ صاحب بتاتے ہیں کہ حاجی صاحب اور کے اہلِ خانہ نے ان لوگوں کے لئے کھلے دل کے ساتھ خفیہ طور پر قیام و طعام کا بندوبست کر کے انسان دوستی اور رواداری کی اعلٰی مثال قائم کی۔

 یہ لوگ تین چار روز تک تارڑ صاحب کے ہاں مہمان رہے اور متعصب بلوائیوں کا زور کم ہونے پر اپنا سب کچھ یہیں چھوڑ کر خالی ہاتھ پیدل پاہڑیانوالی پہنچے، جہاں سے منڈی بہاؤالدین اور گجرات میں لگے مہاجرین کیمپس تک پہنچے اور اپنوں کو کھو دینے کا دکھ اور بے شمار دلسوز یادیں لے کے ساتھ ہندوستان چلے گئے۔ اس وڈیو میں ماتاجی پریتپال کورجی انہیں قیامت خیز دنوں کی داستان بیان کر رہیں ہیں


Saturday, March 20, 2021

छत्तीसगढ़ी की शुरूआती दो फिल्मों के गीतों व कथानक पर 

मेरा आलेख, सीनाजोरी के साथ चोरी और सम्मान की कथा 


गुरुवार 11 मार्च 2021 सम्मान समारोह भनपुरी रायपुर 

 (एक) 

साल 2009-10 में भाई राजेश चंद्राकर ने वर्ड प्रेस में छत्तीसगढ़ी गीत संगी  के नाम से शानदार ब्लॉग बनाया। जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ी गीतों को रोचक ब्यौरे के साथ अपलोड करना शुरू किया। 

मुझे संस्कृति विभाग के एक प्रमुख अफसर राहुल सिंह जी से पता लगा तो ब्लॉग देखा। बेहद रोचक लगा। ब्लॉग पढ़ते 'कहि देबे संदेस' से जुड़ी कुछ एक गलतियों पर मेरी नजर गई तो मैनें राजेश भाई को ई-मेल (तब व्हाट्सएप नही था) कर दिया। 

राजेश भाई ने जवाब दिया और प्रोत्साहित किया कि मैं इस पर विस्तार से लिखूं। इस तरह मैनें 'कहि देबे संदेस' पर इसके हर गीतों की कहानी और तमाम फोटोग्राफ के साथ विस्तार से लिखा। फिर बारी आई 'घर-द्वार' की। निर्माता स्व. विजय पांडेय के सुपुत्र भाई जयप्रकाश पांडेय का साथ मिला तो भनपुरी रायपुर के अपने घर ले गए। 

जहां उनकी माता व परिवार के अन्य सदस्यों से विस्तार से बात हुई। इस तरह 'घर-द्वार' पर भी गीत और उनके बनने की कहानी से लेकर फिल्म से जुड़ी कई रोचक बातों को लेकर मैनें छत्तीसगढ़ी गीत संगी के लिए लिखा। दोनों आलेख आज भी इस वेबसाइट पर मौजूद हैं और सर्वाधिक पढ़े जाते हैं। 

 (दो)

घर-द्वार से जुड़ी एक रोचक बात यह थी कि इसके गाने तो सदाबहार थे लेकिन फिल्म का मूल प्रिंट खत्म हो चुका था। जब मेरी मुलाकात भाई जयप्रकाश पांडेय से हुई तो वो अपने पिता की धरोहर घर-द्वार फिल्म का प्रिंट खोजने अथक परिश्रम कर रहे थे। 

अंतत: उन्हें सफलता मिली और महाराष्ट्र में किसी मराठी फिल्म संग्रहालय में फिल्म का एक प्रिंट मिल गया। इस स्टोरी को मैं ब्रेक करना चाहता था लिहाजा भिलाई में, जिस अखबार में सेवारत था, वहां मैनें स्टोरी सारे तथ्यों और फोटोग्राफ के साथ बनाई। 

उम्मीद थी कि यह स्टोरी ऑल एडिशन फ्रंट पेज पर मेरे नाम सहित लगेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दफ्तर की अंदरूनी राजनीति कहिए या तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख का उस स्टोरी को जानबूझ कर महत्व नहीं देने का फैसला, जो भी स्टोरी भिलाई एडिशन में लगी, बिना नाम के और बहुत छोटी सी काट-पीट कर। इतनी मेहनत के बाद जान बूझकर कोई आपकी मेहनत को यूं ही जाया कर दे तो हैरान-परेशान होना स्वाभाविक है। 

लेकिन तब तक दफ्तर की राजनीति का थोड़ा बहुत ज्ञान हो गया था इसलिए बिना विचलित हुए मैनें रायपुर में इसी अखबार में अपने एक सहयोगी से बात की। 

तय हुआ कि यह स्टोरी वह रायपुर से बनाएगा। दो दिन बाद मेरी वही स्टोरी मेरे सहयोगी ने अपने नाम से बनाई और वहां से वह सारे एडिशन में प्रकाशित हुई। तब जाकर मुझे तसल्ली हुई कि चलो कहीं तो मेहनत रंग लाई। 

 (तीन) 

छत्तीसगढ़ी गीत संगी  में 'कहि देबे संदेस' और 'घर-द्वार' पर मेरा लिखा आलेख आज भी खूब पढ़ा जाता है लेकिन मेरा यह आलेख भी चोरी-सीना जोरी से नही बच पाया। चूंकि गूगल सर्च में यही आलेख सबसे पहले दिखता है इसलिए बिना मेहनत कॉपी-पेस्ट के खेल में माहिर लोगों को इसमें भी स्कोप दिख गया।

लिहाजा रायपुर से कोई कंप्यूटर इंस्टीट्यूट चलाने वाला शर्मा नाम का एक कारोबारी भिलाई आया। तमाम चिकनी-चुपड़ी बातों के बाद मुद्दे की बात उसने यह की कि वह छत्तीसगढ़ी फिल्मों के इतिहास पर किताब लिख रहा है और मेरा यह आलेख मेरे नाम सहित ससम्मान अपनी किताब में देना चाहता है। तय हुआ कि वह कुछ मानदेय भी देगा। 

इसके कुछ दिन बाद पता चला कि महाशय ने दोनों आलेख अपने नाम से किताब में चिपका दिए हैं और सबसे गंभीर बात कि अपनी राजनीतिक पहुंच का लाभ उठा कर किताब का विमोचन तब के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हाथों करवा लिया है। शायद मुख्यमंत्री कार्यालय भी साहित्यिक चोरी को लेकर इतना गंभीर नहीं होता, इसलिए डा. रमन ने बिना देखे-परखे किताब का विमोचन कर दिया।

 (चार) 

कंप्यूटर कारोबारी शर्मा की चोरी तो तत्काल दिख गई थी लेकिन इसके बाद तो जो हो रहा है वो और भी गजब है। इन 10-11 साल में ऐसे कई आलेख मेरी नजरों से गुजरे हैं, जिनमें सीधे-सीधे कॉपी पेस्ट कर मेरे मूल आलेख को चिपका दिया गया है। कुछ महानुभवों ने नकल में अकल सिर्फ इतनी लगाई है कि हिंदी में लिखे मेरे आलेख को छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर लगा दिया है।

कापी-पेस्ट का धंधा जोरों पर है। इन दोनों फिल्मों से जुड़े मेरे आलेख देखिए और इसके बाद गूगल पर सर्च कीजिए, ऐसे बहुत से आलेख हिंदी और छत्तीसगढ़ी में आपको मिल जाएंगे। ऐसे लोगों का क्या किया जाए…? 

 (5)

इस महीने की शुरूआत में इन तमाम मुद्दों को लेकर भाई जयप्रकाश पांडेय से मेरी फोन पर बात हुई। उन्होंने भी स्वीकारा कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों पर लिखने वालों ने जम कर कॉपी-पेस्ट का खेल खेला है।
इसके बाद उन्होंने बताया कि 11 मार्च को उनके पिता की पुण्यतिथि है। भाई जयप्रकाश पांडेय ने मुझे ससम्मान आमंत्रित किया। आयोजन की खबर आप वेबसाइट सीजी न्यूज ऑनलाइन  स्टील सिटी ऑनलाइन  द रफ्तार  द सीजी न्यूज  छत्तीसगढ़ आसपास प्रभात टीवी  अपनी सरकार पर क्लिक कर  पढ़ सकते हैं। पूरी खबर यह रही-


 'घर-द्वार' पर शोधपरक लेखन के लिए जाकिर का सम्मान 

रायपुर में आयोजित समारोह में विधायक व पूर्व मंत्री ने किया सम्मानित

मुख्य आयोजक जयप्रकाश पांडेय स्वागत करते हुए, सांस्कृतिक कार्यक्रम और उमड़ा जनसमूह

छत्तीसगढ़ी सिनेमा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले विजय कुमार पांडेय की पुण्यतिथि पर इस्पात नगरी भिलाई के लेखक/पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन का सम्मान किया गया।

 उन्हें यह सम्मान दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार' पर शोधपरक लेखन के लिए दिया गया। रायपुर के भनपुरी स्थित विजय चौक में 11 मार्च 2021 गुरुवार की शाम हुए भव्य आयोजन में मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री व वर्तमान में रायपुर ग्रामीण विधायक सत्यनारायण शर्मा और विशिष्ट अतिथि फिल्म निर्माता मोहन सुंदरानी ने उन्हें सम्मान स्वरूप प्रशस्ति पत्र, शॉल व श्रीफल प्रदान किया गया। 

आयोजक जयशंकर तिवारी व इरशाद अली ने बताया कि वेबसाइट छत्तीसगढ़ी गीत-संगी के लिए लेखक/पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन ने दिसंबर 2010 में फिल्म 'घर-द्वार' पर विस्तार से शोधपरक आलेख लिखा था। 
इसके साथ ही इस फिल्म का मूल प्रिंट के गुम होने और महाराष्ट्र के आंचलिक संग्रहालय में इसकी एक प्रति मिलने के संदर्भ में भी उन्होंने जानकारी दी थी। आयोजकों ने बताया कि वर्ष 1964 में प्रथम छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस के बाद रायपुर भनपुरी के मालगुजार विजय पांडेय ने दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म घर-द्वार का निर्माण वर्ष 1971 में किया था। 
जिसमें मोहम्मद रफी-सुमन कल्याणपुर का गाया गीत 'सुन-सुन मोर मया पीरा के' और मोहम्मद रफी का गाया 'गोंदा फुल गे मोर राजा' गीत आज भी लोकप्रियता के चरम पर हैं।

समारोह में मुख्य अतिथि विधायक सत्यनारायण शर्मा ने कहा कि स्व. विजय पांडेय छत्तीसगढ़ की शान थे। उन्होंने अपनी बोली-भाषा और संस्कृति को घर-घर पहुंचाने का काम किया। 
आयोजन में छत्तीसगढ़ के फिल्म पीआरओ दिलीप नामपल्लीवार, रायपुर शहर कांग्रेस के अध्यक्ष गिरीश दुबे, जयबाला तिवारी, जयप्रकाश पांडेय, प्रेम चौधरी, गीता सिंह, ध्रुव प्रसाद, नागभूषण यादव, टेसू नंदकिशोर साहू, लक्ष्मीकांत तिवारी और तारकेश्वर शर्मा सहित अन्य लोग मौजूद थे।

Thursday, December 31, 2020

तब 1930 में शुक्ल परिवार भिलाई में बनाने 
जा रहा था टाटा की तरह निजी स्टील प्लांट


भिलाई में स्टील प्लांट की दमदारी से पैरवी कर 
रविशंकर ने पूरा किया था अपने भांजे का सपना



बूढ़ापारा रायपुर स्थित निवास में रमेशचंद्र शुक्ल के साथ 
भिलाई में स्टील प्लांट लगाने के लिए तत्कालीन सेंट्रल प्राविंस एंड बरार प्रांत के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने जो दृढ़ता दिखाई थी, उसके पीछे एक मजबूत आधार उनके दिवंगत भांजे की एक अध्ययन रिपोर्ट थी। 

दरअसल भिलाई में निजी स्टील प्लांट लगाने की योजना शुक्ल के भांजे बालाप्रसाद तिवारी की थी लेकिन इस भांजे की असमय मौत के चलते योजना पर 1920-30 के दौर में अमल नहीं हो पाया, फिर स्वतंत्र भारत में शुक्ल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समक्ष दृढ़ता से भिलाई के दावे को रखा और तब कहीं भिलाई में स्टील प्लांट की स्थापना हो पाई।

31 दिसंबर को रविशंकर शुक्ल की पुण्यतिथि के मौके पर उनके पौत्र रमेशचंद्र शुक्ल ने यह रोचक जानकारी एक मुलाकात के दौरान दी। रविशंकर शुक्ल के बड़े बेटे अंबिकाचरण शुक्ल के सुपुत्र रमेशचंद्र शुक्ल अपने बूढ़ापारा रायपुर स्थित पैतृक निवास में रहते हैं। 

आज भी उनके निवास में स्व. रविशंकर शुक्ल के दौर की कई दुर्लभ निशानी मौजूद है। यहां 12 दिसंबर 2020 की दोपहर मेरी उनसे उनके निवास पर मुलाकात हुई। उनके कमरे में दीवार पर स्व. शुक्ल की बड़ी सी तस्वीर लगी है।

वहीं बीते दौर का रेडियो, रिकार्ड प्लेयर, बेल रिकार्डर से लेकर बाद के दौर के टेप रिकार्ड और वीसीआर भी मौजूद हैं। इन दुर्लभ निशानियों के बीच 85 वर्षीय रमेशचंद्र शुक्ल ने अपने दादा (जिन्हें वह 'बाबा' कहते हैं) पर विस्तार से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने जो कुछ कहा, सब उन्हीं के शब्दों में- 


टाटा की रिपोर्ट के आधार पर योजना बनाई थी बालाप्रसाद ने 

एक जुलाई 1956 को भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण स्थल सोंठ गांव में रविशंकर शुक्ल 

तब भिलाई में टाटा के स्तर का विशाल निजी स्टील प्लांट लगाने की तैयारी हमारे परिवार की थी। हमारे बाबा के भांजे बालाप्रसाद तिवारी तब टाटा स्टील में इंजीनियर थे और उनके पास 1888 से 1905 की अवधि में दल्ली राजहरा से रावघाट तक भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) व टाटा स्टील द्वारा कराए गए सर्वे की पूरी रिपोर्ट थी। 

तब 1905 तक टाटा स्टील ने यहां स्टील प्लांट इसलिए नहीं लगाया था क्योंकि यहां आसपास पानी का कोई बड़ा बांध जैसा स्त्रोत नहीं था। हालांकि इसके बाद 1920 आते-आते तांदुला बांध बना।

इस दौर में बालाप्रसाद तिवारी टाटा स्टील से छुट्टी लेकर अक्सर रायपुर आते थे। यहां से उन्होंने दल्ली राजहरा तक पूरा सर्वे किया था और भिलाई गांव के आस-पास निजी स्टील प्लांट स्थापित करने रिपोर्ट तैयार की थी।


हो चुकी थी वित्तीय व्यवस्था और दूसरी तैयारी भी 

शुक्ल निवास में पुराना रेडियो और बेल टेप रिकार्डर 

तब तक हमारे बाबा भी देश के राजनीतिक परिदृश्य में स्थापित हो चुके थे। ऐसे में हमारा परिवार इस स्टील प्लांट को लेकर बेहद उत्साहित था। 
सब कुछ टाटा के स्तर का होने जा रहा था। वित्तीय व्यवस्था और दूसरी तैयारी भी हो चुकी थी लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।1930 में बेहद कम उम्र में नौजवान बाला प्रसाद तिवारी की आकस्मिक मृत्यु हो गई।
हमनें अपने पिता अंबिकाचरण शुक्ल से कई बार सुना था कि बाबा अपने सभी बच्चों से भी ज्यादा अपने भांजे बालाप्रसाद को चाहते थे। बालाप्रसाद की शख्सियत बिल्कुल अंग्रेजों जैसी थी। बाबा जहां 6 फीट 1 इंच ऊंचे थे तो उनके भांजे उनसे भी 2 इंच ऊंचे थे। 

भांजे की मौत ने कर दिया था दुखी, मेहता ने निभाई अहम भूमिका 

शुक्ल को भिलाई का ब्ल्यूप्रिंट दिखाते श्रीनाथ मेहता

जब बालाप्रसाद तिवारी की आकस्मिक मौत हुई तो हमारे बाबा इतने ज्यादा दुखी हुए कि उन्होंने अपना सिर दीवार पर दे मारा था। 

बालाप्रसाद तिवारी की वह सर्वे रिपोर्ट यहीं बूढ़ापारा रायपुर के निवास में सुरक्षित थी लेकिन बाद के दौर में हमारे चाचा विद्याचरण शुक्ल के लोगों ने इस रिपोर्ट का महत्व नहीं समझा और उसे रद्दी में फिंकवा दिया।

वैसे इसी रिपोर्ट के आधार पर हमारे बाबा ने अपने विश्वस्त आईसीएस आफिसर श्रीनाथ मेहता से विस्तृत सर्वे करवा कर तीन वाल्यूम में रिपोर्ट तैयार करवाई थी।

जिसके आधार पर उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समक्ष भिलाई के दावे को मजबूती से रखा था। मेहता को उनके इसी उल्लेखनीय कार्य की वजह से भिलाई स्टील प्रोजेक्ट का पहला जनरल मैनेजर बनाया गया।


बाबा ने कहा था-'भिलाई' लेकर लौटूंगा नहीं तो मेरी लाश आएगी

हमारे बाबा मध्य भारत में लगने वाले स्टील प्लांट के लिए भिलाई के दावे को लेकर इस कदर आश्वस्त थे कि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने भी जिद पकड़ ली। 

सीपी एंड बरार के मुख्यमंत्री बनते ही बाबा ने भिलाई के पक्ष में श्रीनाथ मेहता से नए सिरे से दावा रिपोर्ट तैयार करवाई। इस बीच प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मध्य भारत का स्टील प्लांट विभिन्न वजहों से कुछ माह टालने की मन:स्थिति में थे। वह दुर्गापुर का काम पहले शुरू करवाना चाहते थे।

तब मध्यभारत में अलग-अलग जगह से स्टील प्लांट लगाने की मांग भी उठ रही थी और कुछ लोग इसे विवादित करवा कर पूरी योजना ही ठंडे बस्ते में डलवाना चाह रहे थे। बाबा को यह सब पता लगा तो अपने सेक्रेट्री श्रीनाथ मेहता बुलाया और रातों-रात टेलीप्रिंटर पर अपने प्लान को फिर से तैयार करवा कर दिल्ली भिजवाया। इसके बाद मेहता को लेकर वह दिल्ली गए। 

जाने से पहले बाबा अपने परिवार और विधायकों के बीच बोलकर गए थे कि-''मैं भिलाई स्टील प्रोजेक्ट मंजूर करवा कर लौटूंगा नहीं तो दिल्ली से मेरी लाश आएगी।'' दिल्ली में वह प्रधानमंत्री से मिले और उन्हें बताया कि-मध्य भारत सबसे पिछड़ा इलाका है और यहां के विकास के लिए सबसे पहले भिलाई गांव के पास ही प्लांट लगना चाहिए। नेहरू उनकी दलीलों से सहमत हुए और इस तरह भिलाई स्टील प्रोजेक्ट को सबसे पहले मंजूरी मिली।

बाबा हमेशा पक्षधर थे माटीपुत्रों के 

भिलाई निर्माण स्थल में शुक्ल, साथ में हैं पुरतेज सिंह

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट मंजूर होने के बाद नए मध्यप्रदेश का गठन एक नवंबर 1956 को हुआ तो बाबा इसके पहले मुख्यमंत्री हुए और वे भिलाई के काम को लेकर बेहद उत्साहित थे।
उन्होंने श्रीनाथ मेहता और पुरतेज सिंह समेत अपने सर्वश्रेष्ठ अफसरों को यहां डेप्युटेशन पर पहले ही भेज दिया था। जिससे कि भिलाई का काम पूरी गति से हो।

सीपी एंड बरार के मुख्यमंत्री रहते हुए बाबा 1 जुलाई 1956 को निर्माण कार्य का जायजा लेने भिलाई आए थे। बाबा हमेशा कहते थे कि भिलाई कारखाने में रोजगार का पहला हक मध्यप्रदेश के माटीपुत्रों का है। इसके लिए उन्होंने नियम भी बनवाने की कोशिश की कि 80 प्रतिशत माटीपुत्र और 20 प्रतिशत अन्य राज्य के लोगों को नौकरी मिलेगी।

लेकिन तब के अफसरों की लॉबी ऐसा नियम बनने नहीं देना चाहती थी। वहीं भिलाई में बैठे कुछ अफसर जानबूझ कर स्थानीय लोगों को सरप्लस बताते हुए उनकी छंटनी भी कर देते थे।

इसी बीच 31 दिसंबर 1956 को बाबा का निधन भी हो गया। तब हम लोग सुनते थे कि इसी मुद्दे पर भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के पहले जनरल मैनेजर श्रीनाथ मेहता ने इस्तीफा दे दिया था।

श्रीनाथ मेहता एक बहुत ही सुलझे हुए काबिल अफसर थे। मुझे याद है उन्हें कुत्ते पालने का बड़ा शौक था। एक दफा भिलाई में 32 बंगले में उनसे मिलने विद्याचरण शुक्ल के साथ मैं भी गया था। तब उनके बंगले के बरामदे 6-7 कुत्ते घूम रहे थे। 

नौजवानों से भी ज्यादा फुर्तीले थे रविशंकर शुक्ल 

नए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए शुक्ल

एक बार ऐसा हुआ कि बाबा, हम, हमारे चाचा गिरिजा चरण नागपुर से रायपुर आ रहे थे।

 तब हम नागपुर में लॉ कॉलेज में पढ़ रहे थे। बाबा सुबह ४ बजे से उठ जाते थे और नहा धो कर पूजा व ध्यान के साथ चंदन टीका लगाकर अपनी छड़ी और दुपट्टा लेकर निकलते थे।

तब बाबा मुख्यमंत्री के  तौर पर अमरावती-अकोला का दौरा करके नागपुर आए और हम चाचा- भतीजा को साथ लेकर रायपुर के लिए सड़क से रवाना हुए। मुझे याद है तब  हम लोग रात २ बजे राजनांदगांव पहुंचे।

 वहां बाबा की प्रशासनिक बैठक थी और जनसामान्य से भी उन्हें मिलना था। रास्ते भर बाबा ड्राइवर को टोकते  जा रहे थे कि-तुम हमको देर कराओगे जरा जल्दी चलाओ। हम लोग जब रात को 2 बजे पहुंचे तो रेस्ट हाउस में आराम कुर्सी दिख गई।

हम और हमारे चाचा जवान होने के बावजूद थक के चूर हो चुके थे। इसलिए दोनों आराम कुर्सी में निढाल होकर गिर गए। जबकि दूसरी तरफ हमारे बाबा एकदम तरोताजा दिखाई दे रहे थे।

हम लोगों को झपकी आ रही थी तो उन्होंने ताड़ लिया और पुलिस वालों को बोले कि ये लड़के थोड़ा आराम कर लें। जब तक मैं मीटिंग में हूं, मुझे इतनी सिक्योरिटी की जरूरत नहीं है, तुम इन्हें लेकर आ जाना, मैं अपनी गाड़ी में चलता हूं। इसके बाद बाबा चले गए।

अपने आलोचक के लिए सह्रदयता थी उनके दिल में 

भिलाई में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के हाथों प्रतिमा अनावरण 28 जनवरी 2002

बाबा जब मुख्यमंत्री थे तो उन दिनों राजनांदगांव में एक बड़े वामपंथी नेता रूइकर हुआ करते थे। रूइकर यहां बंगाल नागपुर कॉटन (बीएनसी) मिल में श्रमिक राजनीति करते थे लेकिन मध्यप्रदेश और पूर्ववर्ती सीपी-बरार की राजनीति में भी उनका अच्छा खासा दखल था।
उनकी राजनीतिक शैली ऐसी थी कि वह हमेशा बाबा को खूब बुरा कहते थे। हर बात पर वह बाबा को कटघरे में खड़ा करते थे। उस रात जब हम लोग राजनांदगांव सर्किट हाउस से बाबा की बैठक की जगह पहुंचे तो वहां मैनें देखा कि रूइकर की पत्नी आई हुई है। वह बाबा से मिली और बेहद दुखी होकर बताया कि उनके पति की राजनीति की वजह से घर में फाके पड़ रहे हैं।

सब कुछ सुन कर बाबा बेहद दुखी हो गए और अपने सेक्रेट्री से बोले लाओ मेरी चेक बुक। तुरंत उन्होंने 5 हजार रूपए का चेक काटकर रूईकर की पत्नी को दिया और बोले-बेटी, तुम घबराओ मत मैं अभी हूं और जरूरत पड़े तो मुझे संपर्क करना। तब हम लोग बड़े हैरान थे कि जो आदमी उनको हमेशा गाली बकता रहता है, उसके परिवार के साथ बाबा इतनी उदारता का व्यवहार कर रहे हैं।

बाबा के आदर्श अनुकरणीय थे। भिलाई की स्थापना में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। 28 जनवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री  अटल बिहारी बाजपेयी ने भिलाई के सेक्टर-9 में बाबा की प्रतिमा का अनावरण किया था। यह बाबा के योगदान को नमन करने का एक स्तुत्य प्रयास था। 

विद्याचरण और मिनीमाता ने भी स्थानीयता की आवाज उठाई

विद्याचरण शुक्ल-मिनी माता

बाबा रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद के दिनों में विद्याचरण शुक्ल और मिनीमाता संसद में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तब इन दोनों सांसदों ने भिलाई सहित तमाम उद्योगों में स्थानीय लोगों की नौकरी सुरक्षित रखने आवाज उठाई थी।

दोनों सांसद भी चाहते थे कि सार्वजनिक उपक्रमों में 80 प्रतिशत भर्ती स्थानीय हो। इसके विपरीत भिलाई मेें तो स्थानीय लोगों की उपेक्षा हो रही रही थी वहीं 1966 में कोरबा में शुरू हुई भारत एल्युमिनियम कंपनी (बाल्को) में तो अफसरों ने मिल कर इस नियम को ही उल्टा कर दिया। वहां 20 प्रतिशत स्थानीय और 80 प्रतिशत अन्य राज्यों से भर्ती होने लगी।

तब मिनीमाता ने इसका पुरजोर विरोध किया था। हालांकि बाल्को में उत्पादन शुरू होने के दौर में मिनीमाता स्थानीय लोगों को नौकरी दिलाने आवाज उठा रही थीं। 

 इसी बीच 1972 में मिनीमाता का एक प्लेन क्रैश में निधन हो गया। बाद के दिनों में मैनें भी रेलवे में स्थानीय भर्ती की मांग को लेकर आंदोलन किया था। हमारा आंदोलन डब्ल्यूआरएस कालोनी में चला था।

हरिभूमि में प्रकाशित मेरी स्टोरी