Tuesday, November 16, 2021

इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है,आपमें 

से कितनों ने ऐसी मूर्खताओं का प्रतिवाद किया है? 

 

चिंतक-आलोचक प्रो. अग्रवाल भिलाई में

प्रसिद्ध आलोचक-चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल मूलत: ग्वालियर के रहने वाले हैं और कभी अपना छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश संयुक्त हुआ करते थे,लिहाजा प्रो. अग्रवाल की छत्तीसगढ़ के प्रति आत्मीयता स्वाभाविक रही है। 

10 नवंबर 2021 बुधवार को कांग्रेस पार्टी की ओर से भिलाई में जवाहरलाल नेहरू पर केंद्रित कार्यक्रम में प्रो. अग्रवाल मुख्य वक्ता थे। आयोजक छत्तीसगढ़ सरकार ने आनन-फानन तैयारी में महात्मा गांधी कला मंदिर जैसे छोटे से सभागार को बुक कर लिया था, नतीजे में सभागार के अंदर जितने खड़े और बैठे थे, उतने ज्यादा बाहर भटक रहे थे। बेहतर होता नेहरू हाउस सेक्टर-1 जैसा बड़ा सभागार बुक किया जाता।

 इस अव्यवस्था के चलते अपनी पत्रकार बिरादरी को बहिष्कार जैसा कदम उठाना पड़ा। हालांकि कार्यक्रम समाप्ति के बाद 'कका' भूपेश बाहर आए और अव्यवस्था के लिए खेद जता दिया, इसके बाद बहिष्कार भी काफूर हो गया।

 आयोजन की जानकारी मिलने के बाद मेरी तैयारी प्रो. अग्रवाल से लंबी बातचीत करने की थी लेकिन वहां अव्यवस्था इतनी थी कि ऐसा हो नहीं पाया। हां, प्रो. अग्रवाल से छोटी सी आत्मीय मुलाकात जरूर हो गई। उन्हें मैनें अपने काम के बारे में बताया और मेरा कुछ तार्रुफ भिलाई विद्यालय में मेरे शिक्षक रहे रवि श्रीवास्तव सर और भिलाई की पहली महापौर नीता लोधी ने भी उनसे करवा दिया। 

प्रो. अग्रवाल से आत्मीय मुलाक़ात

अलग हट कर अकेले में मैनें प्रो. अग्रवाल से कुछ कहा और उन्होंने जवाब में भी कुछ कहा। बस इतनी सी मुलाकात संभव हो पाई, जिसकी गवाह ये फोटोग्राफ है। इंशा अल्लाह, उम्मीद है कभी प्रो. अग्रवाल से तसल्ली से बात हो पाएगी। भिलाई का यह आयोजन खास तौर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से था, लिहाजा इसमें पार्टी के कार्यकर्ता ज्यादा था।
 वैसे बहुत कम लोगों को यह बात मालूम है कि प्रो. अग्रवाल कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा हुआ करते थे। उनके इस संदर्भ में वीडियो भी यूट्यूब पर मौजूद है। संघ का हिस्सा होने की वजह से अंदरखाने की बहुत सी बातें जानते हैं। इसलिए उन्होंने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में तैर रहे कई झूठ की कलई यहां आयोजन में बाकायदा नाम लेकर खोली। 

प्रो. अग्रवाल ने जवाहरलाल नेहरू पर जो भी कहा, उसमें पूरा का पूरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर का था। उम्मीद थी कि भिलाई में नेहरू पर बात करने प्रो. अग्रवाल आ रहे हैं तो वो यहां नेहरू और भिलाई पर भी कुछ बोलेंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने यहां जो कुछ कहा उसे आप भिलाई की प्रथम महापौर नीता लोधी की फेसबुक वॉल पर जाकर वीडियो में सुन सकते हैं। यहां उनकी खास बातें इस तरह से रहीं-

 बड़े लोगों के मतभेद ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते 

प्रचारित तो ऐसे किया जाता है, जैसे सरदार पटेल का हक मारकर नेहरू छल से प्रधानमंत्री बन गए। अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते तो बेहतर साबित होते। दरअसल, कुछ लोगों को लगता है कि वो गांधी और पटेल को उनसे भी ज्यादा जानते हैं। वास्तविकता यह है और कांग्रेस संगठन की परंपरा और ताकत है कि यहां वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत विद्वेष में यथासंभव नहीं बदलने दिया जाता।

 वैसे भी बड़े लोगों के बीच के मतभेद को ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते। यह बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं, इस पर ओछापन नहीं थोपना चाहिए। यह भाव आज का नहीं और कोई दबी ढकी बात नहीं कि नेहरू-पटेल में मतभेद थे। मतभेद तो गांधी-नेहरू में भी थे। 

गांधी-नेहरू में मतभेद थे लेकिन... 

 प्रथम महापौर नीता लोधी और प्रख्यात व्यंगकार रवि श्रीवास्तव  साथ में

1927 में मद्रास कांग्रेस में नेहरू के दबाव में डोमिनियन स्टेट के बजाए पूर्ण स्वराज की बात हुई थी और गांधी जी इससे खुश नहीं थे। बाद में 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर गांधी जी ने बाकायदा आलोचना की कि यह प्रस्ताव हड़बड़ी में पारित किया गया। लेकिन 1930 में आते-आते गांधी जी का मन बदल गया और उन्होंने भी पूर्ण स्वराज की बात कही।
 इन दोनों के बीच में गांधी-इरविन पैक्ट को लेकर मतभेद थे। महात्मा गांधी के साथ हुए तमाम मतभेदों को नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है और इसे प्रकाशित करने से पहले 1937 में नेहरू ने पांडुलिपी महात्मा गांधी को दी थी कि कोई अंश पसंद न हो तो बताइए, हटा देंगे। लेकिन महात्मा गांधी ने कहा-एक शब्द भी नहीं हटेगा और इसे जस का तस प्रकाशित करवाओ। इस दौरान दोनों के बीच तीखा पत्र व्यवहार भी हुआ था। 

पटेल ने खुद माना, कि देश का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए..?

 दरअसल, सरदार पटेल संगठन के व्यक्ति थे और संगठन के लोग चाहते थे कि सरदार पटेल को अहम जिम्मेदारी देते हुए प्रधानमंत्री बनाया जाए लेकिन गांधी केवल संगठन ही नहीं जनता का मिजाज भी जानते थे। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बात को सरदार पटेल ने आगे चल कर माना भी कि इसके दस्तावेज भी उपलब्ध हैं कि एक नवस्वाधीन देश के प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय मामले की गहरी समझ होनी चाहिए और उसकी अंतराष्ट्रीय स्थिति होनी चाहिए। 

महात्मा के निधन के बाद 1949 में सरदार पटेल ने लिखा कि, महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नेहरू को घोषित किया तो आज गांधी जी के जाने के बाद लगता है कि उनका फैसला बिल्कुल सही था। सरदार पटेल स्वीकार भी करते थे कि- हां, मतभेद है हम लोगों के बीच लेकिन एक दूसरे के विचारों को समायोजित कर सकते हैं।

 गांधी ने नेहरू का अपना वारिस इसलिए घोषित किया

 नेहरू-गांधी के रिश्तों को लेकर बात करें तो इसी पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर महात्मा गांधी से कहा गया कि नेहरू ने इस प्रस्ताव में अहिंसा के सिद्धांत को लेकर बहुत तीखी बातें कही हैं और आपकी आलोचना की है। गांधी जी लाहौर अधिवेशन में तो थे नहीं लेकिन इसके बाद 1942 की वर्धा एआईसीसी में उन्होंने भाषण दिया और कहा कि सरदार पटेल नहीं, राजेंद्र प्रसाद नहीं, राजाजी नहीं, मेरा वारिस जवाहर होगा। क्योंकि गांधी जी अपने आप को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इन प्रोफेसरों से ज्यादा जानते थे।

 अंतरराष्ट्रीय धाक जम चुकी थी नेहरू की नेहरू की

 अंतरराष्ट्रीय धाक 1927 से जमना शुरू हो गई थी, जब दुनिया के तमाम औपनिवेशिक देशों की ब्रुसेल्स में हुई कान्फ्रेंस में उन्होंने शिरकत की थी। इसके बाद से नेहरू का अंतरारष्ट्रीय पटल पर सम्मान बढऩे लगा था। अंतरराष्ट्रीय पटल पर लोग उनको अच्छी तरह जानते थे और नेहरू इस बात को बार-बार रेखांकित करते थे जो आज तक रेखांकित करने की जरूरत है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल भारत की अपनी स्वाधीनता का आंदोलन नहीं था बल्कि उपनिवेशवाद के अंत का आरंभ भी था। 

आप देखिए, 1947 में हिंदुस्तान आजाद हुआ और सन 1955 तक लगभग सारा ब्रिटिश फ्रेंच और पुर्तगाली उपनिवेश आजाद होता गया। इंडोनेशिया से लेकर ब्राजील तक सारे उपनिवेश ताश के महल की तरह ढहते गए। 

 

 उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत 

याद कीजिए कि जब तक भारत औपचारिक रूप से आजाद नहीं हुआ था और नेहरू अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष थे। उस समय नेहरू ने दिल्ली में 15 दिन की एशियन पीपुल्स कांग्रेस आयोजित की थी। जिसे गांधी जी ने आशीर्वाद दिया था और इस कान्फ्रेंस के बारे ब्रिटिश जर्नलिस्ट फिलिप्स टालबोट ने लिखा था कि ये कान्फ्रेंस कुछ लोगों को केवल एक तमाशा लग सकती है लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत है।

 सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री ली कुआन यू जो हमारे दक्षिणपंथी मित्रों के बड़े अजीज है और इनके आदर्श पुरुष कहलाते हैं। उन्होंने कहा था एशिया और अफ्रीका के सिरमौर तो नेहरू थे।

 ..तो सुभाष बाबू ने एक ब्रिगेड उनके नाम पर भी क्यों नहीं रखी?

 व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के मुताबिक सुभाष बोस के साथ गांधी-नेहरू ने ज्यादती की और मौलाना आजाद तो फिर मुसलमान भी थे। अब फैलाया जा रहा है कि सावरकर ने सुभाष चंद्र बोस को प्रेरणा दी थी अपनी सेना बनाने। 

मुझे हैरानी होती है कि अगर ऐसा था तो सुभाष बाबू ने आजाद हिंद फौज के बजाए अपने संगठन का नाम स्वाधीन भारत सेना क्यों नहीं रखा, फिर उनका तराना कदम-कदम बढ़ाए जा भी पूरी तरह उर्दू में है। फिर सुभाष बोस ने अपनी फौज में गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और रानी झांसी ब्रिगेड बनाई। क्या उनमें इतनी कृतज्ञता भी नहीं थी कि कथित प्रेरणा देने वाले सावरकर के नाम पर भी एक ब्रिगेड बना देते? 

नेहरू पर यह झूठ चिपकाया गया

 एक और झूठ फैलाया जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने एक्सीडेंटल हिंदू और कल्चर से मुस्लिम बताया है। दरअसल ये शब्दावली नेहरू पर हिंदू महासभाई नेता खरे ने चिपका दिया था और साफ कहूं तो यह कांग्रेस पार्टी की कमजोरी है कि इसका प्रतिवाद नहीं कर पाए। ऐसे कई झूठ आज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए बच्चे-बच्चे तक पहुंचाए जा रहे हैं। 

नेहरू, जिन्ना और एडविना पर ऐसा झूठ 

एक सज्जन राजीव दीक्षित, जो आज के एक बाबाजी के बड़े प्रिय थे। उनके हर वीडियो में मूर्खतापूर्ण बातें हैं। सही बात है कि मूर्खों का आत्मविश्वास भी गजब का होता है। अपने एक वीडियो में राजीव दीक्षित कहते हैं जिन्ना, एडविना और नेहरू लंदन के हॉरिस कॉलेज में सहपाठी थे।

 इसलिए जानबूझ कर माउंटबेटन को वायसराय बनवाया गया जिससे उनकी पत्नी एडविना के माध्यम से नेहरू को प्रभावित करवाया जा सके। हकीकत यह है कि लंदन में हॉरिस नाम का कोई कॉलेज ही नहीं है। वहीं जिन्ना तो नेहरू से 15 साल पहले ही लंदन से पढ़ कर लौट चुके थे और एडविना तो हाई स्कूल से उपर पढ़ी भी नहीं है। फिर कहां से तीनों के एक साथ पढऩे की बात आती है।

 कश्मीर पर तो नेहरू को कोसते हैं पाकिस्तानी इतिहासकार

 कश्मीर का सवाल उठाया गया तो मेरा आग्रह है कि तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस को जागृत रखिए। कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति जो उस वक्त की थी, उसमें उसकी सीमा सोवियत संघ, अफगानिस्तान और चीन से मिलती है। नेहरू यह अच्छी तरह जानते थे कि ऐसी रणनीतिक जगह को पाकिस्तान जैसे होस्टाइल देश के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता था। 

यह बात गांधी जी को भी समझ में आई और पटेल को भी मालूम हुई। उसके बाद भारत सरकार की यह आमराय बनीं कि कश्मीर को पाकिस्तान को दिए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। पाकिस्तान के प्रख्यात इतिहासकार बर्क एंड कुरैशी (एसएम बर्क-सलीमुद्दीन कुरैशी) इस बात के लिए नेहरू की निंदा करते हुए पटेल का समर्थन करते हैं कि कश्मीर पर नेहरू ने तो गड़बड़ कर दी पटेल तो ठीक चल रहे थे।

 कश्मीर पर नेहरू गलत थे तो इस्तीफे क्यों नहीं हुए?

 मैं यह जानना चाहता हूं कि अगर कश्मीर के सवाल पर नेहरू की सोच इतनी गड़बड़ थी और कश्मीर के सवाल पर नेहरू मनमानी कर रहे थे। किसी की नहीं सुन रहे थे और सारी जिम्मेदारी उनकी ही थी तो कैबिनेट से सरदार पटेल ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? अंबेडकर ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? स्वयं हिंदू महासभा के हिंदू राष्ट्रवादी नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? 

इन लोगों ने इस्तीफा इसलिए नहीं दिया क्योंकि जो भी फैसले थे वो सर्वसम्मत थे किसी मतभेद की गुंजाइश नहीं थी। इन पर सरकार की पूरी सहमति थी। मुखर्जी ने इस्तीफा इसलिए दिया था.. वैसे, श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के सवाल पर कैबिनेट से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उस नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में दिया जिसमें यह संकल्प लिया गया कि दोनों देश अपने अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे।

 मुखर्जी चाहते थे कि दोनों कौम का शत-प्रतिशत अदला-बदली हो। ऐसे बहुत से उदाहरण है, जब मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया। 2002 में गुजरात में हिंसा के बाद कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार से इस्तीफा दिया था, यह कहते हुए कि बाजपेयी ने नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध कड़े कदम नहीं उठाए। इसी तरह हिंदू कोड बिल को कैसे पास किया जाए, इस बात पर नेहरू कैबिनेट से अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया था।

 लियाकत दिल्ली आए तो दोनों देश के राष्ट्रध्वज के साथ...

 क्योंकि तब पाकिस्तान जानता था कि सर्जिकल स्ट्राइक कह कर नहीं की जाती। समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान तुरंत राजी हो गए और जब लियाकत पाकिस्तान के जहाज पर दिल्ली आए तो इस जहाज पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों देशों के झंडे लगे थे। दिल्ली में नेहरू-लियाकत पैक्ट हुआ।

 जिसमें दोनों देशों ने अपने यहां अपने-अपने अल्पसंख्यक आबादी की पूरी सुरक्षा करने का संकल्प दिलाया। इधर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अड़े हुए थे कि दोनों देशों की अल्पसंख्यक आबादी का पूरी तरह तबादला होना चाहिए। जबकि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होता क्योंकि भारत ने हिंदू राष्ट्र बनाने का इरादा नही किया था।

 ...तो बाबा की जगह पितामह बोलिए 

भारत ने हर आने वाली सभ्यता से कुछ सीखा और सिखाया है। समोसा भारत में तुर्को के साथ आया है। वैदिक व्यंजन नहीं है। आप इसे कैसे अलग कर सकते हैं? बाबा तो मूलरूप से तुर्की का शब्द है। जिन्हें अरबी-उर्दू करण से परहेज है, उन्हें बाबा की जगह पितामह शब्द इस्तेमाल कहने की आदत डाल लेना चाहिए।

 इसलिए होता है दुष्प्रचार 

सांप्रदायिक राजनीति के लोगों द्वारा नेहरू का बहिष्कार और नेहरू के प्रति दुष्प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि नेहरू भारतीय परंपरा, भारतीय चिंतन की जो गतिशीलता है जो डायनामिज्म है, नेहरू उसके सबसे शानदार प्रतिनिधि हैं। लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय संरचना के सबसे प्रबल प्रवक्ता हैं। विविधता में एकता कोई खोखला नारा नहीं है। वहीं सांप्रदायिकता  तो फासिज्म का भारतीय रूप है जो भारतीयता के विरुद्ध है।

देश को आधुनिक राष्ट्र में तब्दील कर रहे थे  नेहरू

 नेहरू पर हमला इसलिए भी होता है क्योंकि नेहरू अपने देश को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वह जानते थे कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है और इसे एक आधुनिक नेशन में तब्दील करना है। अब दुनिया में मुगल, आटोमन साम्राज्य नहीं बचे हैं अब आधुनिक राज्य बचे हैं। तो साम्राज्यवाद के बाद दुनिया आधुनिक राज्य की दुनिया होगी। नेशन स्टेट की दुनिया होगी। प्राचीन सभ्यता को हमे एक नेशन स्टेट में तब्दील करना है। नेहरू इस प्रयास में आजीवन लगे रहे।

 आलोचनाओं के बावजूद मुझे नहीं कहा देशद्रोही 

मैं कांग्रेसी नहीं हूं और कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाता हूं। कांग्रेस के मंचों से सार्वजनिक या व्यक्तिगत रूप से बड़े नेताओं से बातचीत में और लोगों से कड़वी बातें करता रहा हूं। इस तरह की आलोचनाओं के बावजूद कांग्रेसियों ने मुझे कभी एंटीनेशनल नहीं कहा और मुझ पर देशद्रोह का आरोप कभी नहीं लगाया।

 खुद को पैदाइशी विश्वगुरू बताने वाले वस्तुत: मूर्ख 

जो लोग पैदाइशी विश्वगुरू होने का दावा करते हैं वो वस्तुत: मूर्ख होते हैं। आज इनके पास अपना कोई प्रतीक या नेता नहीं है। इसलिए इनके प्रचार तंत्र को देखने पर लगता है कि लाल बहादुर ने अपनी राजनीति जनसंघ से शुरू की थी और सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबंध नहीं लगाया बल्कि संघ के स्वयंसेवक थे। इनके फर्जी दावों से तो ऐसा लगता है कि खुद महात्मा गांधी या सरदार पटेल अपने आप को नहीं जानते होंगे, जितना ये लोग जानते हैं। इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है। 

आपके कॉमन सेंस को ध्वस्त कर रही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी 

तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस (सहजबोध) को जागृत रखिए। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी जो सबसे खतरनाक काम करती है, वह यह है कि वह आपके कामन सेंस को ध्वस्त करती है टेलीविजन भी ही करता है। सब चीजे आपको मूर्ख बनाने का हिस्सा है। सहजबोध का मतलब आपका ज्ञान व अनुभव है। आज तमाम फर्जी दावे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के माध्यम में समाज में फैलाए जा रहे हैं। आपमें से कितनों ने ऐसी मूर्खता का प्रतिवाद किया है?

Monday, May 24, 2021

 भिलाई में मां गुजरी, सरहद पार 
का एक गांव डूब गया मातम में 


 भिलाई में जब अखंड पाठ की समाप्ति हुई तो उसी
 रोज पाकिस्तान के एक गांव में भी की गईं दुआएं

 सरदार हरमिंदर सिंघ-प्रीतपाल कौर 
छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले की पहचान छह दशक पहले बने भिलाई स्टील प्लांट की वजह से पूरी दुनिया में है। यहां के सेक्टर-2 भिलाई निवासी वयोवृद्ध मां प्रीतपाल कौर भाटिया की 20 मई 2021 को हुई मृत्यु के बाद परिजनों को भी नहीं मालूम था कि उनकी मां के लिए सरहद पार पाकिस्तान का एक गांव भी मातम मना रहा है। 

तीन दिन बाद रविवार 23 मई को सोशल मीडिया में इस संबंध में आई कुछ पोस्ट की खबर मिलने के बाद स्व. प्रीतपाल कौर के परिजन बेहद भावुक हैं। दरअसल स्व. प्रीतपाल कौर मूल रूप से मौजूदा पाकिस्तान के सूबा पंजाब के जिला मंडी बहाउद्दीन (पूर्व में गुजरात जिला) तहसील फालिया के गांव जोकालियां की रहने वाली थीं। 

बंटवारे की त्रासदी झेल कर उस गांव से हिंदुस्तान चले आए परिवारों को खोजने और संपर्क साधने का काम वहां पाकिस्तान की नई पीढ़ी कर रही है और बाकायदा सोशल मीडिया पर इसकी पूरी जानकारी भी शेयर कर रही है।

ऐसे में भिलाई की इस वयोवृद्ध मां के गुजरने की खबर पाकिस्तान के जोकालियां गांव के लिए भी सदमे से कम नहीं थी। यहां भाटिया परिवार ने अपनी मां की याद में अखंड पाठ की शुरूआत बाबा दीप सिंह गुरुद्वारा सुपेला भिलाई में 22 मई को करवाई थी, जिसका समापन 24 मई को लंगर के साथ हुआ।  

जब सरहद पार जोकालियां गांव के लोगों को पता चला तो वहां भी गांव की मस्जिद और घरों में 24 मई को ही स्व. प्रीतपाल के हक में दुआ करने का ऐलान कर दिया। 

स्व. प्रीतपाल के पुत्र और पेशे से फोटो जर्नलिस्ट अजीत सिंह भाटिया ने बताया कि डोंगरगढ़ निवासी उनके मामा मनजीत सिंह भाटिया के माध्यम से जोकालियां गांव के लोगों से संपर्क हुआ था और मां के गुजरने की खबर भी उन्हीं के जरिए वहां पहुंची। 

अजीत ने बताया कि उनके दिवंगत पिता हरमिंदर सिंघ भाटिया जोकालियां गांव से 16 किमी दूर मानो चक के रहने वाले थे। दोनों का तब की परंपरा के अनुसार बाल विवाह हुआ था। बंटवारे की त्रासदी के बाद दोनों परिवार फिर मिले।

इसके बाद उनके पिता रोजी-रोटी के लिहाज से डोंगरगढ़ से भिलाई आए और यहां भिलाई स्टील प्लांट को लकड़ी आपूर्ति करने के पेशे से जुड़ गए। तब से परिवार भिलाई का ही हो कर रह गया। यहां परिवार सेक्टर-2 मार्केट में रहता है।  


फेसबुक पर गांव वालों ने लिखा…सरहद पार से अफसोसनाक खबर 

स्व. प्रीतपाल कौर के गुजरने की खबर मिलने पर फेसबुक पेज जोकालियां ऑन लाइन में एडमिन आमिर शहजाद लिखते हैं- कयाम पाकिस्तान से कब्ल (पहले) हमारे गांव जोकालियां की रिहाइश (रहनेवाली) माता जी प्रीतपाल कौर जी जुमेरात 20 मई 2021 को बमुकाम भिलाई जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) में दुनिया-ए-फानी से कूच कर गईं हैं। 

माता जी 1936 में जोकालियां में पैदा हुईं और कयाम-ए-पाकिस्तान के कब्ल जोकालियां गुरद्वारे वाली गली में रिहाइश पज़ीर (निवासरत) थीं। आप मानो चक के सरदार हरमिंदर सिंघ जी के साथ रिश्ता-ए-अज़दवाज़ (विवाह) मेें मुंसलिक थीं। 

कयाम-ए-पाकिस्तान व हिंदुस्तान के क़यामत खेज दिनों में अनगिनत सोग़वार यादों के साथ खानदान के साथ पड़ोसी मुल्क भारत हिजरत कर गईं। ग्रुप टीम और अहले (निवासी) जोकालियां दुआ गो हैं के अल्लाह तआला दुख की इस घड़ी में ग़मज़दा खानदान को सब्र व हिम्मत दें… आमीन। 

उर्दू में मूल पोस्ट-

سرحد پار سے افسوس ناک خبر

قیامِ پاکستان سے قبل ہمارے گاؤں جوکالیاں کی رہائشی ماتا جی پریت پال کور جی جمعرات 20 مئی 2021ء کو بمقام بِھلائی ضلع درگ (چھتیس گڑھ) میں دنیائے فانی سے کُوچ کر گئی ہیں۔ ماتا جی 1936ء میں جوکالیاں میں پیدا ہوئیں اور قیامِ پاکستان سے قبل جوکالیاں گردوارے والی گلی میں رہائش پذیر تھیں۔ آپ سردار ہرمہیندر سنگھ جی آف مانو چک کے ساتھ رشتہ ازدواج میں منسلک تھیں۔ قیامِ پاکستان و ہندوستان کے قیامت خیز دنوں میں ان گنت سوگوار یادوں کے ساتھ خاندان کے ساتھ پڑوسی ملک بھارت ہجرت کر گئیں اور پرسوں اس فانی دنیا سے ہمیشہ کے لئے پردہ کر گئیں۔ گروپ ٹیم اور اہلِ جوکالیاں دُعاگو ہیں کہ اللہ تعالٰی دکھ کی اس گھڑی میں غمزدہ خاندان کو صبر و ہمت دیں۔ آمین

मां ने बताई थी बंटवारे की त्रासदी, वीडियो शेयर हो रहा पाकिस्तान में 

अजीत सिंह भाटिया ने अपनी मां के अंतिम दिनों में कुछ वीडियो बनाए थे, जिसमें स्व. प्रीतपाल कौर 11 साल की उम्र में अपनी जमीन छोड़ कर डोंगरगढ़ में अपने मामा हरदयाल सिंह भाटिया के घर तक पहुंचने की त्रासदी का किस्सा बयान कर रही हैं। 

यह वीडियो अजीत के मामा मनजीत सिंह भाटिया के माध्यम से पाकिस्तान के जोकालियां गांव तक पहुंच गया और अब जोकालिया ऑनलाइन के नाम से बने फेसबुक पेज पर पोस्ट होने के बाद से यह वीडियो खूब शेयर हो रहा है।

इस वीडियो पर अपनी टिप्पणी करते हुए शाह मीर लिखते है-''यह एक कयामतखेज दिन था। गुरुद्वारा वाली गली के साथ नूर की गली में नूर के परिवार ने सारे सिख परिवारों को पनाह दे रखी थी और लोग डट कर बलवाइयों का मुकाबला कर रहे थे कि अचानक सब खत्म हो गया। यहां के मुस्लिम परिवारों ने बरसों तक इसका सोग मनाया।'' 

इस वीडियो में स्व. प्रीतपाल बंटवारे की त्रासदी बयान करते हुए बताती हैं कि- ''ब्रिटिश भारत के अन्य हिस्सों की तरह गुजरात जिला (वर्तमान मंडी बहाउद्दीन) भी दंगो की आग में झुलस रहा था। जब हालात बेकाबू होने लगे तो सभी सिख परिवारों की महिलाओं और बच्चों को गांव के चौधरी गुलाम रसूल तरार के घर में पनाह दी गई। वहीं तमाम पुरुष सदस्य गांव के गुरुद्वारे में इकट्ठा होकर बलवाइयों से मुकाबले की तैयारी करने लगे। इसी बीच दूसरे गांव से आए बलवाइयों का हमला हुआ और पूरा गुरुद्वारा खून से लाल हो गया।'' 

 स्व. प्रीतपाल कौर के पिता, चाचा और दूसरे तमाम पुरुष सदस्य मारे गए। किसी तरह चौधरी परिवार ने सभी महिला व बच्चों को आर्मी के ट्रक बुलवा कर सुरक्षित निकलवाया। इसके बाद दो-दिन भूखे-प्यासे रहते हुए वह अमृतसर पहुंची। फिर रिफ्यूजी कैम्प और वहां से डोंगरगढ़ में अपने मामा के घर डोंगरगढ़ पहुंची थीं।

जब सदियों से रिवाज पाने वाला रवादारी का
 बेमिसाल कल्चर रातों-रात खत्म हो गया.....

जोकालियां ऑनलाइन फेसबुक पेज 
फेसबुक पेज जोकालियां ऑन लाइन बेहद दिलचस्प पेज है। इसमें मरहूम प्रीतपाल कौर पर दूसरी पोस्ट में उनके वीडियो के साथ तफसील से लिखा है। वैसे इस फेसबुक पेज की कवर फोटो भी काबिले गौर है। इसमें गांव जोकालियां की फोटो के साथ उर्दू में लिखा है-सुख के मौसम तेरी गलियों में सदा रक्स करें,शहर जोकालियां...तेरी रौनकें ता हश्र (कयामत तक) रहें। इस पेज पर दूसरी पोस्ट में कुछ यूं लिखा है-

हिस्टोरियन मनजीत सिंघ बबला साहब बयान करते हैं कि ब्रिटिश हिंदुस्तान के दीगर इलाकों की तरह जिला गुजरात (मौजूदा मंडी बहाउद्दीन) भी तकसीम-ए-हिंद के वक्त फसादात की लपेट में आ गया।

फसादात की आग ने गुजरात को भी बुरी तरह मुतास्सिर (प्रभावित) किया। सदियों से रिवाज पाने वाला रवादारी का कल्चर (सहिष्णुता की संस्कृति) रातों-रात तहलील (खत्म) हो गया। हिंदु, सिख और मुसलमान जो एक दूसरे के पड़ोस में सदियों से पुरअमन जिंदगी गुजार रहे थे, एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

हमारे गांव जोकालियां में रवादारी के कल्चर की जड़ें बहुत मजबूत थीं। ये माताजी जिनका नाम प्रीतपाल कौर जी है, 1936 में पैदा हुईं और 20 मई 2021 को इस फानी दुनिया को खैरबाद कह गईं। उनके वालदैन, चचा और बहुत से दूसरे रिश्तेदार इन फसादात की नजर हुए और जिंदगी की बाजी हार गए। उन के वालिद साहब (पिता) और चचा जोकालियां गुरुद्वारे में ही जान की बाजी हार गए। 

फसादात में बच जाने वालों में बहुत से लोगों ने (जिन में ये मां जी भी शामिल थीं) जान बचाने के लिए हमारे गांव की इंसान दोस्त शख्सियत मरहूम हाजी गुलाम रसूल तरार साहब के यहां पनाह ली। 

मनजीत सिंह बबला साहब बताते हैं कि हाजी साहब और उनके अहले खाना (परिवार) ने इन लोगों के लिए खुले दिल के साथ खुफिया तौर पर कयाम व तआम का बंदोबस्त कर के इंसान दोस्ती और रवादारी की आला मिसाल कायम की।

ये लोग तीन-चार रोज तक तरार साहब के यहां मेहमान रहे और मुतास्सुब (कट्‌टरपंथी) बलवाइयों का जोर कम होने पर अपना सब कुछ यहीं छोड़ कर खाली हाथ पैदल पहाड़ियों वाली पहुंचे, जहां से मंडी बहाउद्दीन और गुजरात में लगे मुहाजरिन कैम्प तक पहुंचे और अपनों को खो देने का दुख और बेशुमार दिलसोज यादें ले के साथ हिंदुस्तान चले गए। इस वीडियो में माताजी प्रीतपाल कौर जी उन्हीं कयामतखेज दिनों की दास्तान बयान कर रही हैं। 

मूल उर्दू की पोस्ट इस तरह से है-

भाटिया परिवार 
ہسٹورین منجیت سنگھ ببلہ صاحب بیان کرتے ہیں کہ برٹش ہندوستان کے دیگر
علاقوں کی طرح ضلع گجرات (موجودہ منڈی بہاؤالدین) بھی تقسیمِ ہند کے وقت فسادات کی لپیٹ میں آ گیا۔ فسادات کی آگ نے گجرات کو بھی بُری طرح متاثر کیا۔ صدیوں سے رواج پانے والا رواداری کا کلچر راتوں رات تحلیل ہو گیا۔ ہندو، سکھ اور مسلمان جو ایک دوسرے کے پڑوس میں صدیوں سے پُرامن زندگی گزا ر رہے تھے ایک دوسرے کے خون کے پیاسے ہو گئے۔

 ہمارے گاؤں جوکالیاں میں رواداری کے کلچر کی جڑیں بہت مضبوط تھیں۔ لوگ ایک دوسرے کا احترام کرتے تھے جس میں مذہب و نسل کی تفریق نہیں تھی۔ یہ ماتا جی جن کا نام پریتپال کورجی ہے 1936ء میں پیدا ہوئیں اور 20 مئی 2021ء کو اس فانی دنیا کو خیرباد کہہ گئیں۔ ان کے والدین، چچا اور بہت سے دوسرے رشتہ دار ان فسادات کی نذر ہوئے اور زندگی کی بازی ہار گئے۔

 ان کے والد صاحب اور چچا جوکالیاں گردوارے میں ہی جان کی بازی ہار گئے۔ فسادات میں بچ جانے والوں میں سے بہت سے لوگوں نے (جن میں یہ ماں جی بھی شامل تھیں) جان بچانے کے لئے ہمارے گاؤں کی انسان دوست شخصیت مرحوم حاجی غلام رسول تارڑ صاحب کے ہاں پناہ لی۔ 

منجیت سنگھ ببلہ صاحب بتاتے ہیں کہ حاجی صاحب اور کے اہلِ خانہ نے ان لوگوں کے لئے کھلے دل کے ساتھ خفیہ طور پر قیام و طعام کا بندوبست کر کے انسان دوستی اور رواداری کی اعلٰی مثال قائم کی۔

 یہ لوگ تین چار روز تک تارڑ صاحب کے ہاں مہمان رہے اور متعصب بلوائیوں کا زور کم ہونے پر اپنا سب کچھ یہیں چھوڑ کر خالی ہاتھ پیدل پاہڑیانوالی پہنچے، جہاں سے منڈی بہاؤالدین اور گجرات میں لگے مہاجرین کیمپس تک پہنچے اور اپنوں کو کھو دینے کا دکھ اور بے شمار دلسوز یادیں لے کے ساتھ ہندوستان چلے گئے۔ اس وڈیو میں ماتاجی پریتپال کورجی انہیں قیامت خیز دنوں کی داستان بیان کر رہیں ہیں


पाकिस्तान में जिक्र हुआ 'हरिभूमि' का, वहां लिखी गई खास पोस्ट 

फेसबुक पर शेयर की गई जोकालियां के एतिहासिक गुरुद्वारे की फोटो 

इस पूरे वाकये पर 'हरिभूमि' में मैनें जो कुछ भी लिखा था, उसकी खबर जोकालियां ऑन लाइन पेज के मआरफत सरहद पार के लोगों को मिली। वहां इस खबर की चर्चा हुई तो उनके फेसबुक पेज पर जोकालियां गांव के उस गुरुद्वारे की फोटो भी पोस्ट की गई,जिसका जिक्र मरहूम प्रीतपाल कौर ने किया था। वहां के बहुत से लोगों ने अपने खयालात का इजहार भी किया।  इसी बीच मैसेंजर पर इस फेसबुक पेज के एक एडमिन फैसल वसीम की एक गुजारिश आई कि-''हम हिंदी पढ़ नहीं सकते,लिहाजा मुमकिन हो तो उर्दू में भेज दीजिए।''

इसके बाद मैनें अपनी पूरी खबर को उर्दू में टाइप कर उन्हें टैक्स्ट भेज दिया। नतीजतन, 31 मई 2021 की शाम उन्होंने मेरे भेजे हुए उर्दू के टैक्स्ट के साथ अपने खयालात का इजहार करते हुए 'जोकालियां ऑनलाइन' में एक पोस्ट लिखी। इस पोस्ट में फैसल वसीम का अंदाजे़ बयां यहां देखिए-


हमारे प्यारे गांव जोकालियां और उसके फेसबुक पेज
‘जोकालियां ऑनलाइन’ का जिक्र हिंदुस्तानी अखबार में

एडमिन फैसल वसीम की टिप्पणी
इंटरनेट की आमद से इत्तेलाअत और बाहमी राब्ता की दुनिया ने ऐसा पलटा खाया है कि दुनिया अब ग्लोबल विलेज के बजाए लोकल विलेज की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। चंद मिनट पहले गुजरा हुआ वाकया फौरी तौर पर दुनिया के हर कोने में देखा जाता है। सोशल मीडिया फिलवक्त तेजतरीन जरिया इत्तेलाअत है। 

इस मीडिया की रिसाई बैनल अक्वामी सतह पर फौरी और लाज़िमी है क्योंकि जिस शख्स ने भी इसको बतौर मेंबर ज्वाइन किया है, वो चाहते और ना चाहते हुए भी इसको एक नजर से देखने पर मजबूर हैं। सोशल मीडिया अब हमारी जिंदगियों में दाखिल हो चुका है, इसको देस निकाला देना मुमकिन नहीं जबकि इसके बहुत से मुफीद पहलू भी मौजूद हैं। वो अफराद, इदारे और मकामात जहां आम आदमी की पहुंच मुमकिन ना थी वहां अपनी आवाज को पहुंचाना अपने पैगाम को दस्तरस में लाना और उन्हें रद्दे अमल देने पर रागिब करने का काम सोशल मीडिया से अब बहुत आसान हो गया है। 

एक ऐसा ही मामला हमार पेज जोकालियां ऑन लाइन की एक पोस्ट के साथ पेश आया जो यहां 22 मई 2021 को हिंदुस्तान के कस्बे भिलाई जिला दुर्ग में मुकीम सिख कम्युनिटी के भाटिया खानदान की एक मां मोहतरमा प्रीतपाल कौर जी की वफात के हवाले से की गई थी। 

जो कयामे पाकिस्तान से कब्ल यहीं हमारे गांव जोकालियां में रहा करती थीं। और तकसीमें हिंद के बाद खानदान के हमराह भारत हिजरत कर गईं। काफी दोस्तों ने इसे शेयर किया। हमारी ये पोस्ट जब हिंदुस्तान की चार अलग-अलग रियासतों से यक वक्त शाया होने वाले अखबार ‘हरिभूमि’ के जर्नलिस्ट मुहम्मद जाकिर हुसैन साहब की नजर से गुजरी तो उन्होंने उसे अखबार में अपने तब्सरे के साथ शाया किया। रोजनामा ‘हरिभूमि’ के जर्नलिस्ट मुहम्मद जाकिर हुसैन साहब लिखते हैं। (इसके बाद फैसल वसीम ने हरिभूमि में प्रकाशित खबर का उर्दू टैक्स्ट पूरा का पूरा दिया है और आखिर में उन्होंने मेरे इस ब्लॉग का लिंक भी दिया है।) 

फेसबुक पर जारी उर्दू की मूल पोस्ट यहां पढ़ सकते हैं-

ہمارے پیارے گاؤں جوکالیاں اور اس کے گاؤں کے پیج "جوکالیاں آن لائن" کا ذکر ہندوستانی اخبار میں
💕
انٹرنیٹ کی آمد سے اطلاعات اور باہمی رابطہ کی دُنیا نے ایسا پلٹا کھایا ہے کہ دنیا اب گلوبل ویلج کی بجائے لوکل ویلج کی شکل اختیار کرتی جا رہی ہے ۔ چند منٹ پہلے گزرا ہوا واقعہ فوری طور پر دنیا کے ہر کونے میں دیکھا جاتا ہے۔ سوشل میڈیا فی الوقت تیز ترین ذریعہ اطلاعات ہے۔ اس میڈیا کی رسائی بین الاقوامی سطح پر فوری اور لازمی ہے کیونکہ جس شخص نے بھی اس کو بطور ممبر جوائن کیا ہوا ہے۔ وہ چاہتے اور نہ چاہتے ہوئے بھی اس کو ایک نظر دیکھنے پر مجبور ہے۔ سوشل میڈیا اب ہماری زندگیوں میں داخل ہو چکا ہے اس کو دیس نکالا دینا ممکن نہیں جبکہ اس کے بہت سے مفید پہلو بھی موجود ہیں۔ وہ افراد، ادارے اور مقامات جہاں عام آدمی کی پہنچ ممکن نہ تھی وہاں اپنی آواز کو پہنچانا، اپنے پیغام کی دسترس میں لانا اور انہیں ردِ عمل دینے پر راغب کرنے کا کام سوشل میڈیا سے اب بہت آسان ہو گیا ہے۔
ایک ایسا ہی معاملہ ہمارے پیج "جوکالیاں آن لائن" کی ایک پوسٹ کے ساتھ پیش آیا جو یہاں 22 مئی 2021ء کو ہندوستان کے قصبے بھلائی ضلع درگ میں مقیم سکھ کمیونٹی کے بھاٹیہ خاندان کی ایک ماں محترمہ پریت پال کورجی کی وفات کے حوالے سے کی گئی تھی جو قیامِ پاکستان سے قبل یہیں ہمارے گاؤں جوکالیاں میں رہا کرتی تھیں اور تقسیمِ ہند کے بعد خاندان کے ہمراہ بھارت ہجرت کر گئیں۔ کافی دوستوں نے اسے شیئر کیا۔ ہماری یہ پوسٹ جب ہندوستان کی تین الگ الگ ریاستوں سے بیک وقت روزانہ شائع ہونے والے اخبار "ہری بھومی" کے جرنلسٹ محمد ذاکر حسین صاحب کی نظر سے گزری تو انہوں نے اسے اپنے اخبار میں اپنے تبصرے کے ساتھ شائع کیا۔
----------------
روزنامہ "ہری بھومی" کے جرنلسٹ محمد ذاکر حسین صاحب لکھتے ہیں:
"بھلائی (انڈیا) میں ایک ماں کی وفات پر سرحد پار (پاکستان) کا ایک گاؤں بھی سوگوار"
بھلائی میں جب ٭اکھنڈ پا ٹھ٭ کا اختتام ہوا تو اسی روز پاکستان کے ایک گاؤں میں بھی کی گئی دعائیں۔
چھتیس گڑھ کے درگ ضلع کی پہچان 6 دہائی قبل بنے "بھلائی اسٹیل پلانٹ" کی وجہ سے پوری دنیا میں ہے۔ یہاں کے سیکٹر2 بھلائی میں رہنے والی بزرگ ماں پریت پال بھاٹیا کی 20 مئی 2021ء کو ہوئی وفات کے بعد ان کے گھر والوں کو بھی نہیں معلوم تھا کی ان کی ماں کے لیے سرحد پار پاکستان کا ایک گاؤں بھی غمزدہ ہے۔ 23 مئی 2021ء کے دن سوشل میڈیا پر دی گئی اس پوسٹ کی خبر ملنے کے بعد محترمہ پریت پال کورجی کے گھر والے بےحد جذباتی ہو گئے. دراصل پریت پال کورجی بھاٹیا موجودہ پاکستان کے صوبہ پنجاب کے ضلع منڈی بہاؤالدین جو پہلے گجرات ضلع کہلاتا تھا کی تحصیل پھالیہ کے گاؤں جوکالیاں میں رہتی رہی ہیں۔ پاکستان کی نئی نسل اس گاؤں سے جڑے افراد سے متعلق معلومات سوشل میڈیا پر بھی شیئر کرتی رہتی ہے۔ ایسی صورتحال میں بھلائی کی ایک بزرگ ماں کے انتقال کی خبر پاکستان کے جوکالیاں گاؤں کے لئے بھی کسی صدمے سے کم نہیں تھی۔ یہاں بھلائی میں بھاٹیا خاندان نے 22 مئی کو بابا دیپ سنگھ گردوارہ سپیلا بھلائی میں اپنی ماں کی یاد میں اکھنڈ پاٹھ کا آغاز کیا جو 24 مئی کو لنگر کے ساتھ اختتام پذیر ہوا۔ جب سرحد پار جوکالیاں گاؤں کے لوگوں کو پتہ چلا تو گاؤں کے پیج "جوکالیاں آن لائن" پر محترمہ پریت پال کورجی کے لئے بھی تعزیت کی گئی اور ان کے اہلِ خانہ کے لئے صبر کی دعا کی گئی۔.
محترمہ پریت پال کورجی کے بیٹے اور پیشہ سے فوٹو جرنلسٹ اجیت سنگھ بھاٹیہ صاحب نے بتایا کہ ڈونگر گڑھ کے رہنے والے اپنے ماموں منجیت سنگھ بھاٹیا کے ذریعے جوکالیاں گاؤں کے لوگوں سے رابطہ قائم ہوا ہے اور ماں کے انتقال کی خبر بھی انہی کے ذریعے جوکالیاں پہنچی۔ اجیت نے بتایا کہ ان کی ماں جوکالیاں میں پیدا ہوئیں اور ان کے مرحوم والد ہرمندر سنگھ بھاٹیہ جوکالیاں گاؤں سے قریب 16 کلومیٹر دور مانو چک کے رہنے والے تھے۔ دونوں کی اس وقت کی روایت کے مطابق بچپن میں ہی شادیاں طے تھیں۔ دونوں کے گھر والے تقسیم کے سانحے کے بعد پھر سے بمشکل ہی مل پائے تھے۔ ان کے والد معاش کے لحاظ سے ڈونگر گڑھ سے بھلائی آئے اور یہاں بھلائی اسٹیل پلانٹ کو لکڑی کی فراہمی کے پیشے میں منسلک ہو گئے۔ تب سے یہ کنبہ بھلائی میں ہی مقیم ہے۔ یہاں یہ خاندان سیکٹر 2 مارکیٹ میں رہتا ہے۔ اجیت نے بتایا کہ ان کے والد سردار ہرمندر سنگھ کا انتقال 30 دسمبر 2012ء کو ہوا تھا۔
جرنلسٹ محمد ذاکر حسین صاحب "جوکالیاں آن لائن" پیج کے بارے میں اپنے دیش واسیوں کو بتاتے ہوئے لکھتے ہیں:
فیس بک پیج "جوکالیاں آن لائن" ایک بہت ہی دلچسپ پیج ہے۔ اس فیس بک پیج کی کور فوٹو بھی قابلِ غور ہے، جس میں جوکالیاں گاؤں کی ایک خوبصورت تصویر کے ساتھ ایک خوبصورت دُعا بھی لکھی گئی ہے جسے جوکالیاں کے لوگ دن میں کئی بار پڑھتے ہوں گے۔
سُکھ کے موسم تیری گلیوں میں صدا رقص کریں - - - شہرِ جوکالیاں تیری رونقیں تا حشر رہیں (آمین)
----------------
جرنلسٹ محمد ذاکر حسین صاحب نے ہماری دوسری پوسٹ جس میں محترمہ پریت پال کورجی کی وڈیو اپلوڈ کی گئی تھی اس پر بھی تبصرہ تحریر کیا۔ ذاکر صاحب نے نوجوان نسل اور اپنے اخبار کے قارئین کو بتایا کہ کیسے اہلیانِ جوکالیاں بالخصوص مرحوم چوہدری غلام رسول تارڑ صاحب اور جوکالیاں گردوارہ سے ملحقہ محلہ نورکا کی تارڑ برادری نے تقسیمِ ہند کے قیامت خیز ایام میں سکھ کمیونٹی کی مدد کی۔ اخبار میں ذاکر صاحب کی سٹوری پڑھنے کے بعد ہندوستان سے کافی احباب نے ہمیں ایپری شیئیٹ کیا اور دکھ کی اس گھڑی میں ان کے شریکِ غم ہونے پر شکریہ ادا کیا، جن میں محترمہ پریت پال کورجی کے بیٹے سردار اجیت سنگھ بھاٹیا سمیت بھاٹیا فیملی کے دیگر افراد کی کثیر تعداد شامل ہے۔
-------
جرنلسٹ محمد ذاکر حسین صاحب کے بلاگ کا لنک یہاں ہے

Saturday, March 20, 2021

छत्तीसगढ़ी की शुरूआती दो फिल्मों के गीतों व कथानक पर 

मेरा आलेख, सीनाजोरी के साथ चोरी और सम्मान की कथा 


गुरुवार 11 मार्च 2021 सम्मान समारोह भनपुरी रायपुर 

 (एक) 

साल 2009-10 में भाई राजेश चंद्राकर ने वर्ड प्रेस में छत्तीसगढ़ी गीत संगी  के नाम से शानदार ब्लॉग बनाया। जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ी गीतों को रोचक ब्यौरे के साथ अपलोड करना शुरू किया। 

मुझे संस्कृति विभाग के एक प्रमुख अफसर राहुल सिंह जी से पता लगा तो ब्लॉग देखा। बेहद रोचक लगा। ब्लॉग पढ़ते 'कहि देबे संदेस' से जुड़ी कुछ एक गलतियों पर मेरी नजर गई तो मैनें राजेश भाई को ई-मेल (तब व्हाट्सएप नही था) कर दिया। 

राजेश भाई ने जवाब दिया और प्रोत्साहित किया कि मैं इस पर विस्तार से लिखूं। इस तरह मैनें 'कहि देबे संदेस' पर इसके हर गीतों की कहानी और तमाम फोटोग्राफ के साथ विस्तार से लिखा। फिर बारी आई 'घर-द्वार' की। निर्माता स्व. विजय पांडेय के सुपुत्र भाई जयप्रकाश पांडेय का साथ मिला तो भनपुरी रायपुर के अपने घर ले गए। 

जहां उनकी माता व परिवार के अन्य सदस्यों से विस्तार से बात हुई। इस तरह 'घर-द्वार' पर भी गीत और उनके बनने की कहानी से लेकर फिल्म से जुड़ी कई रोचक बातों को लेकर मैनें छत्तीसगढ़ी गीत संगी के लिए लिखा। दोनों आलेख आज भी इस वेबसाइट पर मौजूद हैं और सर्वाधिक पढ़े जाते हैं। 

 (दो)

घर-द्वार से जुड़ी एक रोचक बात यह थी कि इसके गाने तो सदाबहार थे लेकिन फिल्म का मूल प्रिंट खत्म हो चुका था। जब मेरी मुलाकात भाई जयप्रकाश पांडेय से हुई तो वो अपने पिता की धरोहर घर-द्वार फिल्म का प्रिंट खोजने अथक परिश्रम कर रहे थे। 

अंतत: उन्हें सफलता मिली और महाराष्ट्र में किसी मराठी फिल्म संग्रहालय में फिल्म का एक प्रिंट मिल गया। इस स्टोरी को मैं ब्रेक करना चाहता था लिहाजा भिलाई में, जिस अखबार में सेवारत था, वहां मैनें स्टोरी सारे तथ्यों और फोटोग्राफ के साथ बनाई। 

उम्मीद थी कि यह स्टोरी ऑल एडिशन फ्रंट पेज पर मेरे नाम सहित लगेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दफ्तर की अंदरूनी राजनीति कहिए या तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख का उस स्टोरी को जानबूझ कर महत्व नहीं देने का फैसला, जो भी स्टोरी भिलाई एडिशन में लगी, बिना नाम के और बहुत छोटी सी काट-पीट कर। इतनी मेहनत के बाद जान बूझकर कोई आपकी मेहनत को यूं ही जाया कर दे तो हैरान-परेशान होना स्वाभाविक है। 

लेकिन तब तक दफ्तर की राजनीति का थोड़ा बहुत ज्ञान हो गया था इसलिए बिना विचलित हुए मैनें रायपुर में इसी अखबार में अपने एक सहयोगी से बात की। 

तय हुआ कि यह स्टोरी वह रायपुर से बनाएगा। दो दिन बाद मेरी वही स्टोरी मेरे सहयोगी ने अपने नाम से बनाई और वहां से वह सारे एडिशन में प्रकाशित हुई। तब जाकर मुझे तसल्ली हुई कि चलो कहीं तो मेहनत रंग लाई। 

 (तीन) 

छत्तीसगढ़ी गीत संगी  में 'कहि देबे संदेस' और 'घर-द्वार' पर मेरा लिखा आलेख आज भी खूब पढ़ा जाता है लेकिन मेरा यह आलेख भी चोरी-सीना जोरी से नही बच पाया। चूंकि गूगल सर्च में यही आलेख सबसे पहले दिखता है इसलिए बिना मेहनत कॉपी-पेस्ट के खेल में माहिर लोगों को इसमें भी स्कोप दिख गया।

लिहाजा रायपुर से कोई कंप्यूटर इंस्टीट्यूट चलाने वाला शर्मा नाम का एक कारोबारी भिलाई आया। तमाम चिकनी-चुपड़ी बातों के बाद मुद्दे की बात उसने यह की कि वह छत्तीसगढ़ी फिल्मों के इतिहास पर किताब लिख रहा है और मेरा यह आलेख मेरे नाम सहित ससम्मान अपनी किताब में देना चाहता है। तय हुआ कि वह कुछ मानदेय भी देगा। 

इसके कुछ दिन बाद पता चला कि महाशय ने दोनों आलेख अपने नाम से किताब में चिपका दिए हैं और सबसे गंभीर बात कि अपनी राजनीतिक पहुंच का लाभ उठा कर किताब का विमोचन तब के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हाथों करवा लिया है। शायद मुख्यमंत्री कार्यालय भी साहित्यिक चोरी को लेकर इतना गंभीर नहीं होता, इसलिए डा. रमन ने बिना देखे-परखे किताब का विमोचन कर दिया।

 (चार) 

कंप्यूटर कारोबारी शर्मा की चोरी तो तत्काल दिख गई थी लेकिन इसके बाद तो जो हो रहा है वो और भी गजब है। इन 10-11 साल में ऐसे कई आलेख मेरी नजरों से गुजरे हैं, जिनमें सीधे-सीधे कॉपी पेस्ट कर मेरे मूल आलेख को चिपका दिया गया है। कुछ महानुभवों ने नकल में अकल सिर्फ इतनी लगाई है कि हिंदी में लिखे मेरे आलेख को छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर लगा दिया है।

कापी-पेस्ट का धंधा जोरों पर है। इन दोनों फिल्मों से जुड़े मेरे आलेख देखिए और इसके बाद गूगल पर सर्च कीजिए, ऐसे बहुत से आलेख हिंदी और छत्तीसगढ़ी में आपको मिल जाएंगे। ऐसे लोगों का क्या किया जाए…? 

 (5)

इस महीने की शुरूआत में इन तमाम मुद्दों को लेकर भाई जयप्रकाश पांडेय से मेरी फोन पर बात हुई। उन्होंने भी स्वीकारा कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों पर लिखने वालों ने जम कर कॉपी-पेस्ट का खेल खेला है।
इसके बाद उन्होंने बताया कि 11 मार्च को उनके पिता की पुण्यतिथि है। भाई जयप्रकाश पांडेय ने मुझे ससम्मान आमंत्रित किया। आयोजन की खबर आप वेबसाइट सीजी न्यूज ऑनलाइन  स्टील सिटी ऑनलाइन  द रफ्तार  द सीजी न्यूज  छत्तीसगढ़ आसपास प्रभात टीवी  अपनी सरकार पर क्लिक कर  पढ़ सकते हैं। पूरी खबर यह रही-


 'घर-द्वार' पर शोधपरक लेखन के लिए जाकिर का सम्मान 

रायपुर में आयोजित समारोह में विधायक व पूर्व मंत्री ने किया सम्मानित

मुख्य आयोजक जयप्रकाश पांडेय स्वागत करते हुए, सांस्कृतिक कार्यक्रम और उमड़ा जनसमूह

छत्तीसगढ़ी सिनेमा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले विजय कुमार पांडेय की पुण्यतिथि पर इस्पात नगरी भिलाई के लेखक/पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन का सम्मान किया गया।

 उन्हें यह सम्मान दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार' पर शोधपरक लेखन के लिए दिया गया। रायपुर के भनपुरी स्थित विजय चौक में 11 मार्च 2021 गुरुवार की शाम हुए भव्य आयोजन में मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री व वर्तमान में रायपुर ग्रामीण विधायक सत्यनारायण शर्मा और विशिष्ट अतिथि फिल्म निर्माता मोहन सुंदरानी ने उन्हें सम्मान स्वरूप प्रशस्ति पत्र, शॉल व श्रीफल प्रदान किया गया। 

आयोजक जयशंकर तिवारी व इरशाद अली ने बताया कि वेबसाइट छत्तीसगढ़ी गीत-संगी के लिए लेखक/पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन ने दिसंबर 2010 में फिल्म 'घर-द्वार' पर विस्तार से शोधपरक आलेख लिखा था। 
इसके साथ ही इस फिल्म का मूल प्रिंट के गुम होने और महाराष्ट्र के आंचलिक संग्रहालय में इसकी एक प्रति मिलने के संदर्भ में भी उन्होंने जानकारी दी थी। आयोजकों ने बताया कि वर्ष 1964 में प्रथम छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस के बाद रायपुर भनपुरी के मालगुजार विजय पांडेय ने दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म घर-द्वार का निर्माण वर्ष 1971 में किया था। 
जिसमें मोहम्मद रफी-सुमन कल्याणपुर का गाया गीत 'सुन-सुन मोर मया पीरा के' और मोहम्मद रफी का गाया 'गोंदा फुल गे मोर राजा' गीत आज भी लोकप्रियता के चरम पर हैं।

समारोह में मुख्य अतिथि विधायक सत्यनारायण शर्मा ने कहा कि स्व. विजय पांडेय छत्तीसगढ़ की शान थे। उन्होंने अपनी बोली-भाषा और संस्कृति को घर-घर पहुंचाने का काम किया। 
आयोजन में छत्तीसगढ़ के फिल्म पीआरओ दिलीप नामपल्लीवार, रायपुर शहर कांग्रेस के अध्यक्ष गिरीश दुबे, जयबाला तिवारी, जयप्रकाश पांडेय, प्रेम चौधरी, गीता सिंह, ध्रुव प्रसाद, नागभूषण यादव, टेसू नंदकिशोर साहू, लक्ष्मीकांत तिवारी और तारकेश्वर शर्मा सहित अन्य लोग मौजूद थे।